Friday, May 29, 2009

इतिहास में सिमटती टोटो जनजाति



एक सींग वाले गैंडों के लिए दुनिया भर में मशहूर पश्चिम बंगाल के जलदापाड़ा अभयारण्य का नाम तो आपने सुना ही होगा। यहां से अगर आप साइकिल या ट्रक से सफर करते हुए तितर, बांगर व इसके जैसी कुल सात नदियों को पार करते हुए 23 किलोमीटर की दूरी तय कर सकते हों तो टोटोपाड़ा में आपका स्वागत है। यहां तय कर सकते हों इसलिए लिखा गया है कि केंद्र और राज्य सरकार और उनकी ओर से बनी विकास परियोजनाएं आजादी के 62 वर्षों बाद भी यह दूरी नहीं तय कर सकी हैं। जलपाईगुड़ी जिले में भूटान की सीमा से लगे इस गांव,जिसे बस्ती कहना ज्यादा मुफीद होगा, में टोटो जनजाति के लोग रहते हैं। टोटो जनजाति दुनिया की सबसे दुर्लभ व लुप्तप्राय जनजातियों में से एक है। यह भारत की सबसे कम आबादी वाली जनजाति है और देश में सिर्फ इसी बस्ती में इस जनजाति के लोग रहते हैं।
पश्चिम बंगाल को असम से जोड़ने वाले नेशनल हाइवे से 21 किलोमीटर दूर बसे इस गांव तक न तो कोई सड़क जाती है और न ही कोई सवारी। रास्ते में पड़ने वाली नदियों को पार करने के लिए कोई ब्रिज भी नहीं है। बरसात के दिनों में जब यह पहाड़ी नदियां उफनने लगती हैं तो अपने रोजमर्रा के कामकाज के लिए गांव के लोगों को नजदीकी कस्बे मदारीहाट तक पहुंचने के लिए सिर्फ जान ही नहीं बल्कि अपनी साइकिलें भी हथेली पर रख कर नदियों को पार करना पड़ता है। इस गांव में पहुंच कर लगता है समय अचानक पांच दशक पीछे चला गया है॥ केंद्र व राज्य सरकार के विकास कार्यक्रम तो दूर यहां उनकी छाया तक नहीं पहुंच सकी है।
वर्ष 1889 में सैंडर्स नामक एक गोरे साहब ने इस जनजाति का पता लगाया था। उस समय वहां 60 टोटो परिवार रहते थे। सैंडर्स ने उनको 19.76 एकड़ जमीन पट्टे पर दी थी ताकि वे लोग रोजी-रोटी का जुगाड़ कर सकें। उन्होंने जमीन को टोटो तबके के लिए ही संरक्षित कर दिया था ताकि कोई और उसे नहीं हथिया सके। लेकिन 1969 में सरकार ने यह संरक्षण खत्म कर दिया। नतीजतन अब इसमें से ज्यादातर जमीन बाहर से आकर इस बस्ती में बसने वाले नेपालियों के कब्जे में चली गई है और टोटो लोग अपने ही घर में बेगाने हो गए हैं। इस जनजाति के लोगों में बच्चों की जन्मदर बहुत कम है।
वर्ष 1901 की जनगणना के मुताबिक गांव की कुल आबादी 171 थी जो 1991 में बढ़ कर 936 तक पहुंची थी। पहुंची थी। फिलहाल इनकी आबादी लगभग 1300 है। इनकी आबादी बढ़ाने के लिए ही सरकार ने इस तबके के लोगों की नसबंदी पर पाबंदी लगा दी है। लेकि टोटो महिलाएं दूर-दराज के इलाकों में जाकर अपनी नसबंदी करा रही हैं। मुक्ति टोटो नामक एक महिला सवाल करती है कि जब रोजगार का कोई साधन ही नहीं है तो बच्चों को क्या खिलाएंगे? इसलिए उन्होंने भी बीते साल अपनी नसबंदी करा ली। यहां रोजगार का कोई साधन नहीं है। पहले भूटानी संतरों को टोटोपाड़ा होकर ही बांग्लादेश भेजा था। तब लोगों को ढुलाई का काम मिल जाता था। लेकिन अब वह भी बंद है।
जन्मदर ही नहीं इलाके में साक्षरता की दर भी राज्य सरकार के दावों को मुंह चिढ़ाती नजर आती है। अब तक इस जनजाति के सिर्फ 24 लोगों ने दसवीं तक की पढ़ाई की है। इनमें से दो लोग बी.ए. कर चुके हैं। इनमें से दो साल पहले संजीव टोटो को आदिवासी कल्याण विभाग में नौकरी टोटो लोग बल्लियों पर बांस व बेत से झोपड़े बना कर उसी में रहते हैं। यहां बुनियादी सुविधाओं की बेहद कमी है। न तो सड़कें हैं और न ही पीने के पानी की कोई व्यवस्था। गांव के इकलौते स्वास्थ्य केंद्र में भी अक्सर या तो डाक्टर नहीं रहता या फिर दवाएं। यहां काम कर रहे गैर-सरकारी संगठन टोटो सांस्कृतिक संघ के अध्यक्ष व दसवीं पास करने वाले पहले व्यक्ति भक्त टोटो कहते हैं कि सरकार को हमारी कोई चिंता ही नहीं है। यहां मंत्री व अधिकारी अव्वल तो आते ही नहीं। अगर भूले-भटके आ भी गए तो हमें कोरे आश्वसानों के सिवा कुछ भी हासिल नहीं होता। वे सवाल करते हैं कि क्या आजादी के इतने वर्षों बाद भी किसी को यहां तक सड़क बनावाने का ख्याल नहीं आया? गंभीर रूप से बीमार किसी व्यक्ति को किमी दूर मदारीहाट अस्पताल तक ले जाने के लिए कंधों का ही सहारा लेना पड़ता है। परिवहन के नाम पर नदियों से बालू निकालने के लिए आने वाले ट्रक ही एकमात्र साधन हैं। कहने के लिए तो मदारीहाट से टोटोपाड़ा तक उत्तर बंगाल राज्य परिवहन निगम की एक बस सेवा भी है। लेकिन वह अक्सर ठप ही रहती है। ऐसे में लोगों को इलाज के लिए ओझा,जिसे स्थानीय भाषा में पाव कहते हैं, का ही सहारा लेना पड़ता है। यहां रोजगार का कोई साधन नहीं है। कई लोग बीमारियों की चपेट में आ कर दम तोड़ देते हैं। लेकिन इलाके के आरएसपी पंचायत प्रधान मुक्ताराम कहते हैं कि सरकार इलाके के विकास के लिए विभिन्न योजनाओं पर काम कर रही है।
यह इलाका वाममोर्चा के घटक आरएसपी के असर वाला है। भक्त टोटो आरोप लगाते हैं कि आरएसपी नेता इलाके के विकास की बजाय बाहर से नेपालियों को लाकर गांव में बसाने को ही ज्यादा तरजीह देते हैं। वे कहते हैं कि गोरे साहब (सैंडर्स) की ओर से मिली जमीन का बड़ा हिस्सा तो नेपालियों के कब्जे में चला गया है। सरकार ने अब भी इस ओर ध्यान नहीं दिया तो टोटो समाज भी जल्दी ही इतिहास के पन्नों में सिमट जाएगा।

2 comments:

  1. टोटो जन जाती के बारे में अवगत करने का आभार. जैसा आपने लिखा है, उनकी आबादी १००० के ऊपर है. अभी भी समय है. इन्हें लुप्त होने से बचाया जा सकता है.

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  2. इस जनजाति के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए आभार.....हैरानी होती है कि इस इक्कीसवीं सदी में जहां एक ओर तो इन्डिया शाईनिंग जैसे नारे लगाए जाते हैं, वहीं इन लोगों की सुधबुध लेने वाला भी कोई नहीं.

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