एक बहुत पुरानी कहावत है कि मुसीबत कभी अकेली नहीं आती। पश्चिम बंगाल में माकपा और उसकी अगुवाई वाली वाममोर्चा सरकार को शायद पहली बार इस कहावत की हकीकत का अहसास हो रहा है। पहले लोकसभा चुनाव में भारी दुर्गति हुई। राज्य में औद्योगिकीकरण की जबरदस्त मुहिम चला रहे मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के लिए यह अभियान भारी पड़ा। जमीन के मुद्दे ने वामपंथियों के पैरों तले की जमीन तो खिसकाई ही, मुसलमानों ने भी उनसे किनारा कर लिया। ऊपर से चुनावी नतीजों के एक सप्ताह बाद आए चक्रवाती तूफान आइला ने लोगों की नाराजगी और भड़का दी है।
लोकसभा चुनाव में मुंहकी क्या खानी पड़ी, लोगों की निगाहें भी बदल गईं। अगर ऐसा नहीं होता तो आइला पीड़ित इलाके के दौरे पर गए मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को लोगों की भारी नाराजगी का सामना नहीं करना पड़ता। लोगों ने उनको घेर लिया और सवाल करने लगे कि अब तक आप कहां थे। और तूफान के एक सप्ताह बाद भी राहत क्यों नहीं पहुंची है। सुंदरबन इलाके में लोगों ने साफ पूछा कि इलाके के विकास कगे लिए आपकी सरकार ने किया क्या है? बुद्धदेव ने कहा कि वे इसकी विस्तृत जानकारी बाद में भिजवा देंगे।
हिंगलगंज में चक्रवात प्रभावितों का हाल लेने गए बुद्धदेव को भीड़ ने अक्षम मुख्यमंत्री करार दिया। एवीएस मदनमोहन विद्यापीठ परिसर में चल रहे राहत शिविर में रहने वालों ने मुख्यमंत्री से कहा कि आप जूते की माला पहनने के हकदार हैं। बीते पांच सालों में सुंदरवन के विकास के लिए आपने कुछ नही किया है।

चक्रवात 'आइला' से तबाही और राहत-बचाव का जायजा लेने के लिए मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को राहत कार्यो में कोताही को लेकर मुख्यमंत्री को जमकर खरी-खोटी सुननी पड़ी। उन्हें घेरने की भी कोशिश की गई।
बासंती गांव में मुख्यमंत्री को सबसे ज्यादा आक्रोश का सामना करना पड़ा। लोगों ने मुख्यमंत्री से पूछा-'इतनी देर से क्यों आए।' इस सवाल का जवाब बुद्धदेव के पास नहीं था। पुलिस सुरक्षा में किसी तरह उन्हें कार तक पहुंचाया गया।
इसके बाद मुख्यमंत्री सुंदरवन जंगल से पहले पड़ने वाले गोसाबा क्षेत्र में विजयनगर के एक स्कूल में ठहरे पीड़ितों से मिलने पहुंचे। मुख्यमंत्री के स्कूल पहुंचते ही पीड़ितों का गुस्सा फूट पड़ा। पीड़ितों के शोरगुल मचाते देख मुख्यमंत्री ने उन्हें शांत किया। पीड़ितों की शिकायत थी कि उनको खाना, पानी और दवाएं नहीं मिली हैं। महिलाओं की शिकायत थी कि उनके बच्चों को दूध व खाना नहीं मिल रहा है। उस स्कूल का निचला हिस्सा पानी में डूबा था। दूसरी मंजिल पर पीड़ितों को ठहराया गया था। लगभग एक सप्ताह से वहां ठहरे 600-700 लोग राहत सामग्री से वंचित थे।
दरअसल, तूफानपीड़ितों का साथ देने के मामले में भी तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने बुद्धदेव को पीछे छोड़ दिया है। वे और उनके नेता पहले दिन से ही इलाके के दौरे पर थे, लेकिन मुख्यमंत्री छह दिनों बाद इलाके में पहुंचे थे। बुद्धदेव को जहां लोगों के ताने सहने पड़े वहीं अगले ही दिन तूफान प्रभावित इलाकों के दौरे पर गए राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी का स्वागत फूलों से किया गया। माकपा का प्रदेश नेतृत्व शायद लोगों का मूड भांपने में एक बार फिर फेल हो गया है।
ise hee kehte hain na ghar ke rahe na ghaat ke...ye to honaa hee tha ek na ek din....
ReplyDeleteअच्छी चर्चा है।सचमुच वामपंथियों के लिए यह आत्म निरीक्षण का समय है।
ReplyDeleteसादर
श्यामल सुमन
09955373288
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shyamalsuman@gmail.com
आखिर, ये दिन भी देखना था।
ReplyDelete-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
जनता से दूर चले जाने का नतीजा यही होता है। अपने किए का दंड सब को भुगतना पड़ता है।
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