Thursday, July 2, 2009

गांव की ओर-(2)

गांव सचमुच बदल रहे हैं. तमाम आधुनिक सुविधाएं पांव पसारने लगी हैं. कल तक ताल में गाय-भैंस चराने वालों के हाथों में भी मोबाइल सेट आ गए हैं. सलेमपुर से गांव की ओर से बढ़ते हुए यही सोच रहा था. पिछली बार गया था तो सड़कें इतनी टूटी-फूटी थीं कि समझना मुश्किल था कि सड़कों पर गड्ढे हैं या फिर गड्ढों के बीच कहीं-कहीं सड़क बनी है. लेकिन अबकी तस्वीर बदली हुई थी. चमचमाती सड़कें—ठीक वैसे ही जैसे कभी लालू प्रसाद कहा करते थे कि फलां हीरोइन के गाल की तरह.... साधन व सवारियां भी बढ़ी हैं. अबकी नई सवारी के तौर पर जगह-जगह तिपहिया, जिनको यहां टेम्पो कहा जाता है, दौड़ते नजर आए.किराया भी कम एक से दूसरी जगह जाने का महज पांच रुपया. गुठनी से मेरे गांव तक जाने वाली सड़क को होश संभालने के बाद मैंने हमेशा टूटी हालत में ही देखा है. कभी बहुत हुआ तो ईंटें बिछा दी. बाद में वह और टूट जाती थी.
इतना बड़ा साझा परिवार था कि नब्बे के दशक के शुरूआती वर्षों में हर साल गर्मी में गांव जाना किसी तीर्थयात्रा से कम नहीं होता था. हर साल किसी न किसी की शादी होती थी और उसमें दूर-दराज के शहरों में बसे चाचा और भैया लोग आते थे. पूरे कुनबे में साठ से ज्यादा लोग थे. अब चूल्हा अलग होने के बाद लोगों में वह प्यार भी नहीं बचा कि शादियों में सब जुटें. इसके अलावा समय के साथ कई लोग भगवान को प्यारे हो गए. दिलों की दूरियां इतनी बढ़ गई हैं कि मुंह में राम बगल में छूरी वाली कहावत अब गांव में सही अर्थों में चरितार्थ होती नजर आती है.
गांव में अब या तो बूढ़े बचे हैं जो मरने का इंतजार कर रहे हैं या फिर वे नौजवान जिनको कहीं नौकरी नहीं मिल रही. बूढ़े लोगों के बच्चे दूसरे शहरों में रहते हैं. वहां से हर महीने आने वाला मनीआर्डर या फिर बैंकों के जरिए भेजी जाने वाली रकम के सहारे दवाएं खरीदी जाती हैं और खाने का सामान. इसबीच, गांव के कई युवक खाड़ी देशों में चले गए हैं. वहां मेहनत-मजदूरी कर पैसे भेजते हैं और गांव में खर्च चलता है. अरब से लौटा एक युवक बताता है कि वहां उनलोगों को वही काम करना होता जिसे गांव में करते शर्म आती है. जो युवक बेरोजगार हैं वे नशे और पाउच में मिलने वाली शराब के सहारे बेरोजगारी का दुख भुलाने का प्रयास कर रहे हैं.
एक नई चीज और देखी. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीते दिनों गांव से सटी एक सड़क का शिलान्यास किया था. मुझे याद नहीं कि इससे पहले कभी कोई मुख्यमंत्री मेरे गांव के इतने करीब तक आया हो. गांव में बिजली के खंभे गड़े हैं, ट्रांसफार्मर भी आ गया है. कोई बीस साल पहले भी यह सब आया था. लेकिन अब वे खंभे और ट्रांसफार्मर ऐसे गायब हो गए हैं जैसे गदहे के सिर से सींग. गांव में मेरे चाचा के लड़के दुर्गा बताते हैं कि बिजली नहीं आएगी. खंभा तो दो साल पहले ही लगा था, अब तार भी खींचने वाला है लेकिन बिजली कभी आती ही नहीं है.
गांव में मोबाइल घर-घर पहुंच गया है. लाइफटाइम स्कीम ने काम आसान कर दिया है. लेकिन समस्या है उसे चार्ज करने की. सो, जगह-जगह तीन से पांच रुपए लेकर बड़ी बैटरी से इनको चार्ज करने का धंधा भी खूब फल-फूल रहा है. मैंने भी तीन रुपए देकर एक दिन अपना मोबाइल चार्ज कराया.जहां तक सवारियों की बात है गांव के दो-तीन लोगों ने टेम्पो खरीद ली है. लेकिन इससे भी सुलभ एक और साधन है. गांव में कई दर्जन मोटरसाइकिलें हैं. वो ज्यादा चलती नहीं. वजह तेल के लिए पैसे नहीं होते. या फिर उनको चलाने वाला विदेशों में ईंट-गारे का काम कर रहा है. दरअसल, देहात में मोटरसाइकिलों की भरमार हो गई है. यह वो मोटरसाइकिलें हैं जो दहेज में मिलती हैं. बेरोजगार युवक के पास जब तक ससुराल से मिले पैसे होते हैं तब तक वह इन पर बैठ कर पान खाने के लिए तीन-तीन किलोमीटर चले जाते हैं. लेकिन उसके बाद मोटरसाइकिल घर की शोभा बढ़ाती है. ऐसे युवकों को तेल के पैसे देने पर वे किसी को कहीं तक पहुंचाने के लिए तैयार रहते हैं. तेल के सौ रुपए लेकर वे पचास का तेल भरवाते हैं और बाकी रकम का पाउच खरीद कर पी जाते हैं. यह साधन बीते चार-पांच सालों में सुलभ हुआ है. मेरे पिता जी कई बार इसका लाभ उठा चुके हैं.
हां, गांव में हर कोई सलाह देता है कि कोई भी दवा सिवान जिले से मत खरीदो. सलेमपुर जाओ, देवरिया जाओ, लेकिन यहां से नहीं. वजह, पूरे जिले में नकली दवाएं धड़ल्ले से बनती और बिकती हैं. ऊपर से नीचे तक तमाम लोग इस धंधे में शामिल हैं. इसलिए मां-पिताजी गांव जाने पर हर मर्ज की दवा सिलीगुड़ी से ही साथ ले जाते हैं.

2 comments:

  1. वास्तव में गाँव बहुत तेजी से बदले है....यदि भ्रष्टाचार नहीं होता तो शायद ये बहुत पहले हो चूका होता..अछि पोस्ट...

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