Sunday, June 21, 2009

सरकारी उपेक्षा और पिछड़ेपन की कोख से जन्मा लालगढ़


पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर के लालगढ़ और आसपास के गांवों में माओवाद की समस्या कोई एक दिन में पैदा नहीं हुई। दरअसल, लालगढ़ सरकारी उपेक्षा,गरीबी और पिछड़ेपन की कोख से पैदा हुआ है। वाममोर्चा सरकार की अनदेखी के चलते आदिवासियों में सरकार के खिलाफ नाराजगी तो लंबे अरसे से पनप रही थी। इसी नाराजगी का फायदा उठा कर माओवादियों ने ग्रामीणों की सहानुभूति हासिल करते हुए धीरे-धीरे इलाके में अपनी गहरी पैठ बना ली है। लालगढ़ गरीबों की हितैषी होने का दावा करने वाली वाममोर्चा सरकार की नाकामी की सबसे बड़ी मिसाल के तौर पर उभरा है। ध्यान रहे कि लालगढ़ से कुछ दूरी पर ही वह आमलासोल गांव है जहां कुछ साल पहले भुखमरी से आदिवासियों की मौतों की खबरें आई थीं। सरकार ने उसके बाद भी इलाके में विकास का काम शुरू करने की बजाय उन मौतों को भूख नहीं, बल्कि बीमारी से होने वाली मौतें करार दे कर मामले को रफा-दफा कर दिया।
वैसे, लालगढ़ में सरकार फेल नहीं हुई है। सरकार तो वहां थी ही नहीं। जिले के बीनपुर-दो ब्लाक के कई गांवों को मिला कर बसे लालगढ़ में नक्सली बरसों से हथियार और गोला-बारूद जुटा रहे थे। नक्सलियों ने पिछड़ेपन और बेरोजगारी से आदिवासी युवकों में उपजी हताशा का फायदा उठाते हुए धीरे-धीरे उनको भी साथ कर लिया। यह कहना ज्यादा सही होगा कि लालगढ़ लंबे अरसे से बारूद के ढेर पर बैठा था।
बीते 30-32 वर्षों के शासनकाल में वाममोर्चा ने बाकी मूलभूत सुविधाएं जुटाना तो दूर, इलाके में गांवों को एक-दूसरे जोड़ने के लिए सड़क तक नहीं बनवाई। बेलपहाड़ी और आसपास के गांवों में नरेगा के तहत आदिवासियों को रोजगार तो मिले तो लेकिन उससे हफ्ते भर का खर्च निकलना भी मुश्किल है। बेलपाहड़ी के ज्ञानेश्वर मुर्मू को तीन साल पहले नरेगा के तहत जाब कार्ड मिला था। बरसों से उनका आवोदन ग्राम पंचायत के पास फाइलों में दबा था। बीते महीने पहली बार उनको सड़क पर मिट्टी डालने का काम मिला। लेकिन पैसा अब तक नहीं मिला है। नरेगा के तहत मिली रकम भी वापस चली गई है। अब इलाके में कोई नहीं जानता कि काम दोबारा शुरू भी होगा या नहीं।
ज्ञानेश्वर, उसके बेटे और बहू को चार दिन काम करने के एवज में एक हजार 70 रुपए मिले थे। अब अगर आगे काम नहीं मिला तो उनको साल के बाकी 361 दिन इसी रकम में गुजर-बसर करना होगा। ज्ञानेश्वर कहते हैं कि इस योजना के तहत सौ दिन काम मिलने पर हमारा जीवन आसान हो जाता। लेकिन यहां न काम है और न ही उसकी कोई उम्मीद।
इलाके में माओवादियों का असर बढ़ने की एक और वजह है। वहां एक ओर तो आदिवासी बेरोजगारी की हताशा से जूझते और भूख से मरते रहे और दूसरी ओर माकपा के नेताओं और काडरों की संपत्ति दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती रही। अयोध्या पहाड़ी से सटे एक गांव में रहने वाले दिनेश महतो कहते हैं कि आखिर पार्टी से गुजर-बसर के लिए मामूली रकम पाने वाले माकपाई इतनी जल्दी करोड़पति कैसे बन गए। जाहिर है उन्होंने इलाके में विकास परियोजनाओं के नाम पर आने वाली पूरी रकम डकार ली है। माकपा काडरों में लगातार बढ़ते इस भ्रष्टाचार ने माओवादियों को अपने पांव जमाने में सहायता दी। बारूद के ढेर पर बैठा लालगढ़ उबल तो बरसों से रहा था, इसे पलीता दिखाया पुलिस के अत्याचारों ने।
मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को इलाके के विकास और पिछड़ेपन की हकीकत मालूम है। लेकिन शायद पार्टी काडरों पर नियंत्रण नहीं होने या किसी नामालूम वजह से वे इसकी अनदेखी करते रहे। अब पानी सिर से ऊपर गुजरने के बाद वे बीते दो-तीन दिनों दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृह मंत्री पी. चिदंबरम को यह समझाने का प्रयास करते रहे कि नक्सलवाद की समस्या महज कानून व व्यवस्था की नहीं बल्कि देशव्यापी समस्या है और केंद्र व राज्य सरकारों को साझा तौर पर इसका मुकाबला करना चाहिए।
लालगढ़ की समस्या न तो एक दिन में पैदा हुई है और न ही इतनी जल्दी इसके सुलझने के आसार हैं। इलाके के लोगों में असंतोष और हताशा की जड़ें इतनी गहरी हैं कि परिस्थिति सुधरने में लंबा वक्त लगेगा। लेकिन इसबीच, इस मामले में राजनीतिक खेल भी शुरू हो गया है। माकपा के नेता लगातार तृणमूल कांग्रेस पर माओवादियों की सहायता का आरोप लगा रहे हैं। दूसरी ओर, ममता ने कहा है कि माओवादी माकपा की ही उपज हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर माकपा ने अपने आरोप वापस नहीं लिए तो पार्टी राज्य में आंदोलन छेड़ेंगी। ममता ने सवाल किया है कि आखिर सरकार ने अब तक माओवादियों पर पाबंदी क्यों नहीं लगाई है और लालगढ़ अभियान शुरू करने में उसने इतनी देरी क्यों की?
यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि पुलिस और सुरक्षा बलों के अभियान का चाहे जो भी नतीजा हो, लालगढ़ के कई सवाल अब भी अनसुलझे हैं। इन सवालों का जवाब नहीं मिलने तक लालगढ़ और आसपास के इलाकों में पसरते जा रही इस समस्या का स्थाई समाधान तो मुश्किल ही है।

Wednesday, June 17, 2009

.....तो नहीं बिगड़ते लालगढ़ में हालात


पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने अगर समय रहते समुचित कार्रवाई की होती तो पश्चिम मेदिनीपुर जिले के लालगढ़ में आज हालात इतने बेकाबू नहीं होते। सरकार की नीतियों ने इस समस्या को बेतरह उलझा दिया है। लालगढ़ में यह हालात कोई एक दिन में नहीं बने हैं। वहां पुलिस और माकपा काडरों के खिलाफ स्थानीय लोगों का गुस्सा तो बीते नवंबर में ही भड़क उठा था। लेकिन नंदीग्राम में हाथ जला चुकी सरकार ने महीनों चुप्पी साधे रखी। और तो और उसने राज्य में माओवादियों पर पाबंदी भी नहीं लगाई है। मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य बार-बार कहते रहे हैं कि सरकार इस समस्या को राजनीतिक स्तर पर सुलझाने की पक्षधर है।
बीते साल दो नवंबर को तत्कालीन केंद्रीय इस्पात मंत्री राम विलास पासवान और मुख्यमंत्री के काफिले के सालबनी में एक शिलान्यास समारोह से लौटने के दौरान माओवादियों ने बारूदी सुरंग का विस्फोट किया था। उसके बाद स्थानीय पुलिस ने लोगों पर जम कर जुल्म ढाए और इस हमले के आरोप में तीन छात्रों समेत कोई आधा दर्जन लोगों को गिरफ्तार कर लिया। उसके बाद ही स्थानीय लोगों की नाराजगी भड़की। बाद में बहती गंगा में हाथ धोने के लिए माओवादी भी इस आंदोलन में कूद पड़े। पंद्रह नवंबर के बाद पुलिस अत्याचार विरोधी जनसाधारण समिति और माओवादियों ने महीनों लालगढ़ का संपर्क राज्य के बाकी हिस्सों से काट दिया। तमाम सड़कें काट दी गईं और जगह-जगह जांच चौकियां बना दी गईं। लोगों ने पुलिस वालों को गांव में नहीं घुसने देने का एलान कर रखा था। इस दौरान माकपा काडरों की हत्याएं होती रहीं। लेकिन राज्य सरकार इस नक्सली हिंसा के लिए झारखंड को जिम्मेवार ठहराते हुए केंद्र सरकार से अर्धैनिक बलों की मांग करती रही। यह बात अलग है कि वर्षों से झारखंड से सटे तीनों जिलों-पश्चिम मेदिनीपुर, पुरुलिया और बांकुड़ा में माओवादियों की लगातार बढ़ती सक्रियता के बावजूद सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए किसी खास बल का गठन नहीं किया।
सरकार की इस चुप्पी की भी वजह थी। नंदीग्राम में पुलिस को जबरन घुसाने का अंजाम वह देख चुकी थी। ऐसे में लालगढ़ को एक और नंदीग्राम बनाने का खतरा वह कम से कम चुनावों के पहले मोल नहीं ले सकती थी। इसलिए वह चुनाव बीतने का इंतजार करती रही। चुनावों के दौरान भी सरकार को समिति के साथ उसकी शर्तों पर समझौता करना पड़ा। इसमें तय हुआ था कि लालगढ़ इलाके के गांवों में मतदान केंद्र नहीं बनेंगे और मतदान के दिन भी पुलिस गांवों में नहीं घुसेगी। सरकार ने वह शर्त मान कर बाहर कुछ मतदान केंद्र बनाए थे। लेकिन वहां बहुत कम वोट पड़े। चुनावी नतीजों के बाद सरकार में शामिल दल अपनी हार की वजहें तलाशने में जुटे रहे। तब तक यह समस्या काफी गंभीर हो गई। माओवादियों और आदिवासियों ने चुनाव से पहले न सिर्फ लालगढ़ की नाकेबंदी कर दी थी, बल्कि कोलकाता में सरकार की नाक के नीचे रैली कर उन्होंने सरकार को खून-खराबे की भी चेतावनी दी थी। लेकिन सरकार बार-बार वहां बल प्रयोग नहीं करने की बात करते हुए इस समस्या के खुद-ब-खुद सुलझने का इंतजार करती रही।
गृह सचिव अर्द्धेंदु सेन की दलील है कि लालगढ़ के मामले में सरकार ने जरूरत और परिस्थितियों के हिसाब से समुचित कार्रवाई की है। लेकिन हकीकत तो यह है कि सरकार ने वहां कोई कार्रवाई ही नहीं की। अब समस्या के विकराल होने के बाद उसने दो दिन पहले केंद्र से इस समस्या से निपटने के लिए अर्धसैनिक बल मांगे हैं। लेकिन पर्यवेक्षकों का कहना है कि सरकार ने अगर पहले ही यह फैसला किया होता तो हालात बेकाबू नहीं होते। पर्यवेक्षकों का कहना है कि राज्य पुलिस के जवानों के गुरिल्ला लड़ाई का प्रशिक्षण हासिल नहीं है। उन इलाकों में तैनात पुलिसवालों के पास आधुनिकतम हथियारों का भी अभाव है। इसबीच, माओवादियों ने इलाके में भारी तादाद में गोला-बारूद जमा कर लिया है। लालगढ़ की ओर जाने वाले तमाम रास्तों पर भी बारूदी सुरंग बिछा दी गई हैं। ऐसे में केंद्रीय बलों के लिए भी सीधी लड़ाई में माओवादियों से निपटना आसान नहीं है। माओवादियों ने केंद्रीय बलों को भी लालगढ़ तक पहुंचने से पहले ही रोक दिया है। यही वजह है कि इस आंदोलन के खिलाफ अभियान चलाने के बारे में अभी कोई फैसला नहीं हो सका है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि सरकार की लंबी चुप्पी में इस आंदोलन को मजबूत होने में मदद दी। छह महीने पहले पुलिस के अत्याचारों के खिलाफ शुरू होने वाला यह आंदोलन अब सरकार के साथ सीधी लड़ाई में बदल गया है। और सरकार ने लालगढ़ को नंदीग्राम बनने से बचाने के लिए जो चुप्पी साध रखी थी, वह भी उसके काम नहीं आई। माओवादियों की तैयारी को देखते हुए देर-सबेर लालगढ़ में भी नंदीग्राम दुहराया जाना अब लगभग तय है।

Tuesday, June 16, 2009

वहां भूत खिलाएंगे खाना!


बहुत कम लोग ही ऐसे होंगे जिनको किसी खंडरहरनुमा अंधेरे कमरे में भूतों का नाम सुन कर सिहरन नहीं होने लगे. भूत-प्रेत का इस्तेमाल अब तक डरावने अर्थ में ही होता रहा है. लेकिन अब यह परिभाषा जल्दी ही बदलने वाली है. अब कोलकाता के पास बन रहे एक रेस्तरां में भूत आपसे आपके मनपसंद खाने का आर्डर तो लेंगे ही, आपको खाना भी वही परोसेंगे. यह कमाल करने जा रहे हैं मशहूर जादूगर पी.सी.सरकार जूनियर. वे इस साल के आखिर तक हावड़ा में हाइवे के किनारे एक ऐसा रेस्तरां खोलने जा रहे हैं जहां वेटर से लेकर मैनेजर तक तमाम लोग भूतों और नरकंकालों के मेकअप में ही होंगे.अगर आप दिल के मजबूत है और भूत-प्रेत को अंधविश्वास मानते हैं तो भूतों के इस रेस्तरां में आपका स्वागत है. इसमें आप निडर होकर हर तरह के लजीज व्यंजन का लुत्फ उठा सकते हैं. अगर आप भूत-प्रेत को मानते हैं तो इस रेस्तरां में कुछ समय बिताने के बाद आपकी सोच बदल जाएगी.हां, ग्राहक के तौर पर उस रेस्तरां में जाने के लिए आपका जिगर कुछ मजबूत होना जरूरी है. सरकार कहते हैं कि ‘यह एक नया प्रयोग है. इसका मकसद लोगों में फैला यह अंधविश्वास दूर करना है कि भूत-प्रेत दरअसल हमारे अवचेतन दिमाग की ही उपज है. रेस्तरां में ग्राहकों के लिए रोजाना जादू के हैरतअंगेज करतब भी दिखाए जाएंगे.’ सरकार कहते हैं कि शायद यह देश में अपनी तरह का पहला रेस्तरां होगा। यह सप्ताह में सातों दिन खुला रहेगा.सरकार जूनियर के अलावा उनकी जादूगर पुत्री मानेका सरकार और उनकी मंडली के सदस्य भूत रेस्तरां के कार्यक्रमों पर निगरानी रखेंगे। इस रेस्तरां की इमारत बाहर से खंडहरनुमा होगी. भीतर जाने पर कब्रें भी नजर आएंगी. दीवारों और खिड़कियों पर भुतों की तस्वीरें होंगी. खास तौर पर बने माडलों, लेजर किरणों और प्रकाश के तालमेल से इस माहौल को काफी असरदार बनाने की योजना है.सरकार जूनियर कहते हैं कि ‘कल्पना कीजिए कि आप किसी भूतरूपी वेटर को खाने का आर्डर देकर अपनी मनपसंद डिश आने का इंतजार कर रहे हों, उसी समय दीवार में बनी खिड़की में से कोई भूत या नरकंकाल निकल कर आपके बगल वाली कुर्सी पर बैठ जाए.’ वे कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति डर जाता है तो वह बाहर जा सकता है. भूत ही उसे बाहर का रास्ता दिखा देंगे. लेकिन आखिर तक रुकने की हालत में इस जादू के पीछे के विज्ञान को समझ कर उसका अंधविश्वास काफी कम हो जाएगा.सरकार का कहना है कि मेरा मकसद पैसे कमाना नहीं है. मैं हर उम्र के लोगों बताना चाहता हूं कि आखिर ये जादू है क्या? वे कहते हैं कि ‘जादू और कुछ नहीं बल्कि विज्ञान का ही एक रूप है.’सरकार की पुत्री मानेका भी इस परियोजना के प्रति काफी उत्साहित हैं. वे कहती हैं कि ‘आम लोगों के लिए यह एक दिलचस्पी का विषय होगा.जादू के प्रति लोगों में बहुत पहले से आकर्षण रहा है. अब उस रेस्तरां में हम जादू के जरिए ही आम लोगों खासकर किशोर पीढ़ी के मन से अंधविश्वास दूर करने का प्रयास करेंगे.’

अपनी ही दवा कड़वी लग रही है माकपा को

पश्चिम बंगाल में माकपा को अब अपनी ही दवा कड़वी लग रही है। हथियारों के जोर पर इलाकों पर कब्जे की जिस लड़ाई की शुरूआत उसने की थी वह अब उसे बहुत भारी पड़ रही है। अब जब विपक्ष ने उसे उसी की भाषा में जवाब देना शुरू किया है तो कामरेडों को जान के लाले पड़ गए हैं और अपने सबसे मजबूत गढ़ रहे लालगढ़ और खेजुरी इलाकों से उनका पलायन शुरू हो गया है। लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद पश्चिम बंगाल में शुरू हुई राजनीतिक हिंसा थमने की बजाय लगातार तेज होती जा रही है।
बीते खास कर एक सप्ताह के दौरान पूर्व मेदिनीपुर जिले के खेजुरी और पश्चिम मेदिनीपुर जिले के लालगढ़ में तो हालात बेकाबू नजर आ रहे हैं। हाल तक माकपा के गढ़ रहे इन दोनों इलाकों में इस हिंसा के निशाने पर अबकी माकपाई ही हैं। अब अपने इस गढ़ से माकपाई बोरिया-बिस्तर समेट कर भाग रहे हैं। ठीक उसी तरह जैसे दो साल पहले नंदीग्राम से तृणमूल कांग्रेस समर्थकों को भाग कर अपनी जान बचानी पड़ी थी।
बीते महीने भर से होने वाली हिंसा में माकपा और तृणमूल दोनों दलों के दो दर्जन से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। खेजुरी में यह हिंसा इलाके पर पुनर्दखल की लड़ाई का नतीजा है। खेजुरी में तृणमूल कांग्रेस समर्थकों की गिरफ्तारी के विरोध में स्थानीय लोगों ने पुलिसवालों का सामाजिक बायकाट शुरू कर दिया है तो लालगढ़ में माओवादियों ने पुलिस व प्रशासन को सरेआम चुनौती दे दी है। रविवार को लालगढ़ में माकपा के तीन नेताओं की हत्या हो गई। पुलिस अत्याचार विरोधी समिति के समर्थकों ने माकपा के एक स्थानीय नेता के आलीशान मकान में जम कर तोड़फोड़ की।
माकपा ने नवंबर, 2007 में जब हथियारों के जोर पर नंदीग्राम पर दोबारा कब्जा जमाया था तब उसने कल्पना तक नहीं की होगी कि एक दिन खेजुरी से उसके नेताओं व काडरों को जान बचा कर भागना पड़ेगा। बंदूक के जोर पर इलाके के पुनर्दखल के जिस खेल की शुरूआत माकपा ने की थी अब वही उसे महंगा पड़ रहा है। नंदीग्राम के पुनदर्खल के समय मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य तक ने काडरों की उस कार्रवाई का यह कह बचाव किया था कि उनलोगों (विपक्ष) को उनकी ही भाषा में जवाब दिया गया है। तब उनकी इस टिप्पणी की काफी आलोचना हुई थी। वैसे, बाद में भट्टाचार्य ने यह कहते हुए उस बयान के लिए माफी मांग ली थी कि वे मुख्यमंत्री होने के साथ ही माकपा के नेता भी हैं। यानी उन्होंने वह बयान पार्टी के दबाव में दिया था।
वैसे, बंगाल में लाठी के जोर पर इलाकों पर कब्जे की लड़ाई कोई नई नहीं है। इसकी शुरूआत का सेहरा माकपा के सिर पर ही है। कोई दस साल पहले उसने मेदिनीपुर जिले के केशपुर से इसकी शुरूआत की थी। इसलिए यह महज संयोग नहीं है कि अब उसी मेदिनीपुर (जो अब पूर्व और पश्चिम में बंट गया है), में उसके पैरों तले की जमीन तेजी से खिसक रही है। माकपा को अब अपनी ही दवा कड़वी लग रही है।
नंदीग्राम आंदोलन के दौरान भी खेजुरी माकपा का सबसे मजबूत गढ़ था। तृणमूल के खिलाफ जवाबी हमले वहीं से होते रहे थे। अभी बीते सप्ताह माकपा के तीन नेताओं के घर से भारी तादाद में हतियार बरामद होना अपनी कहानी खुद कहता है। हालांकि माकपा ने उन तीनों से कोई संबंध होने से इंकार कर दिया है। लेकिन इलाके के लोग तो जानते ही हैं कि वहां कौन किस पार्टी का है। अब इस राजनीतिक हिंसा के सवाल पर तृणमूल कांग्रेस और माकपा के बीच शह और मात का खेल चल रहा है। और इसमें कोई शक नहीं है कि इस खेल में अब तक तृणमूल प्रमुख और रेल मंत्री ममता बनर्जी ही भारी पड़ रही हैं।
इसबीच, तृणमूल प्रमुख और रेल मंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र से बंगाल में शांति व सुरक्षा बहाल करने में दखल देने की अपील की है। सोमवार को राज्यपाल डा. गोपाल कृष्ण गांधी से भेंट कर उन्होंने राज्य की कानून व व्यवस्था की स्थिति से उन्हें अवगत कराया। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में सरकार प्रायोजित आतंक जारी है। ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार को हालात सुधारने तथा शांति व व्यवस्था की बहाली की दिशा में कदम उठाना चाहिए। ममता ने राज्यपाल को बताया कि चुनाव के बाद पार्टी के 23 कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई है। बंगाल में लगातार हिंसक वारदातें हो रही हैं और लोग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। सत्तारूढ़ माकपा के समर्थकों का अत्याचार लगातार बढ़ रहा है और हालात को काबू करने में सरकार व प्रशासन नाकाम रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार को अवैध हथियारों को जब्त करने के लिए ठोस कदम उठाना चाहिए। इन हथियारों के बूते ही हिंसा हो रही है। वैसे, राज्यपाल ने बीते सप्ताह ही इस राजनीतिक हिंसा पर गहरी चिंता जताई थी।
दूसरी ओर, सोमवार को वाममोर्चा विधायकों की बैठक में मुख्यमंत्री को भी विधायकों के सवालों का जवाब देना मुश्किल हो गया। विधायकों का कहना था कि माकपा के लोगों की चुन-चुन कर हत्याएँ की जा रही हैं। लेकिन पुलिस दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की बजाय हाथ पर हाथ धरे बैठी है। विधायकों ने भट्टाचार्य से पुलिस को और सक्रिय करने को कहा। मुख्यमंत्री ने विधायकों को कार्रवाई का भरोसा दिया और साथ ही संयम बरतने की सलाह दी। बुद्धदेव का कहना था कि आगामी विधानसभा चुनावों से पहले विपक्ष जानबूझ कर हिंसा व आतंक फैलाने का प्रयास कर रहा है। इसलिए उसकी चाल में फंसने की बजाय हमें संयम से काम लेना चाहिए।
उधर, लालगढ़ में हालात खराब होते जा रहे हैं। माकपा और आदिवासियों के बीच शुरू हुई जंग अब पूरी तरह से हिंसक हो गई है। आदिवासियों ने सोमवार को माकपा के कार्यालय में तोड़फोड़ की और रामगढ़ पुलिस चौकी में आग लगा दी।
वहां आदिवासियों ने माकपा को खुली चुनौती दे दी है। वहीं गुस्साए आदिवासियों के आगे सीपीएम कार्यकर्ता बेबस नजर आ रहे हैं। पुलिस से नाराज आदिवासियों ने एक चौकी को भी फूंक डाला। कभी ये माकपा का गढ़ हुआ करता था लेकिन अब माकपाई यहां से भागने में ही भलाई मान रहे हैं।
बीते तीन दिनों से आदिवासियों और माकपाइयों के बीच इलाके पर कब्जे को लेकर बवाल चल रहा है। पुलिस भी इन आदिवासियों के सामने लाचार नजर आ रही है। माकपा नेताओं व कार्यकर्ताओं की हत्या से आंतकित होकर कामरेडों ने इलाके से पलायन शुरू कर दिया है। बीनपुर माकपा जोनल समिति के सचिव अनुज पांडेय ने कहा कि लालगढ़ इलाके में माकपा नेताओं एवं कार्यकर्ताओं की हत्याओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। इससे आतंकित होकर पार्टी के नेता व कार्यकर्ता सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर रहे है। उन्होंने आरोप लगाया है कि इलाके में आतंक का पर्याय बने माओवादी एवं पुलिस अत्याचार प्रतिरोध समिति के लोगों ने माकपा के स्थानीय नेताओं एवं कार्यकर्ताओं के 11 लाइसेंसी बंदुकें भी छीन ली हैं। दूसरी ओर समिति के नेता छत्रधर महतो ने इस आरोप का खंडन करते हुए कहा है कि समिति नहीं बल्कि माकपाई ही इलाके में आतंक फैला रहे हैं।
माकपा की बेलाटीकरी स्थानीय समिति के सचिव चंडी करण ने रविवार को इलाके में हुई हिंसा में माकपा के तीन लोगों की मौत की पुष्टि की है। उन्होंने आरोप लगाया कि इलाके में माओवादियों के साथ मिलकर पुलिस अत्याचार विरोधी समिति माकपा समर्थकों को चुन-चुनकर मार रही है।
अब माओवादियों ने एक कदम आगे बढकर राज्य स्तर पर पुलिस व प्रशासन के बायकाट का एलान किया है।
यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इलाके में अपना राजनीतिक बर्चस्व बहाल करने की इस लड़ाई में माकपा के पांव उखड़ रहे हैं। अगर सरकार ने खेजुरी व लालगढ़ में सामान्य स्थिति बहाल करने की दिशा में ठोस पहल नहीं की तो यह दोनों इलाके नंदीग्राम में बदल सकते हैं।

Wednesday, June 10, 2009

बंगाल में लालकिला दरकने की आहट से सन्नाटा

कोलकाता, 15 मई। पश्चिम बंगाल में अपना लालकिला दरकने की आहट से वाममोर्चा के खेमे में सन्नाटा है। राज्य की 42 लोकसभा सीटों के नतीजे राज्य में भावी राजनीति की दशा-दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे। इनसे कई सवालों के जवाब तो मिलेंगे ही, यह भी पता चलेगा कि सिंगुर और नंदीग्राम जैसे मुद्दों पर खास कर शहरी मतदाता क्या सोचते हैं। बंगाल में वाममोर्चे के लाल किले में सेंध लगना तो तय ही है। खुद वाममोर्चा के नेता भी अबकी पिछली बार के 35 के मुकाबले 28 से ज्यादा सीटों का दावा करने को तैयार नहीं हैं। अब नतीजों से यह बात सामने आएगी कि तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस गठबंधन इस लालकिले में कितना सेंध लगा पाता है। तृणमूल खेमा उत्साहित तो है, लेकिन पक्के तौर पर उसे भी अपनी अनुमानित सीटों का भरोसा नहीं है।
इस चुनाव में कांग्रेस के यथास्थिति रहने की उम्मीद है। तृणमूल कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ है ही नहीं। इसलिए उसे फायदा मिलना तय है। तृणमूल का फायदा यानी वाममोर्चा का नुकसान। अब यह नुकसान कितना और कहां होगा, इस पर मोर्चे के नेता तमाम माथापच्ची के बावजूद किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सके हैं।
अबकी चुनावों में राज्य में नैनो, खेत और विकास ही मुद्दा रहे हैं। दोनों प्रमुख गठबंधनों ने अपने-अपने तरीके से इनको भुनाने का प्रयास किया है। वाममोर्चा ने जहां टाटा की लखटकिया के राज्य से जाने के लिए ममता बनर्जी को जिम्मेवार ठहराते हुए उन पर विकासविरोधी तमगा लगाने का प्रयास किया है, वहीं ममता ने सरकार पर खेती की कीमत पर उद्योगों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। महीनों लंबे चले चुनाव अभियान के दौरान अपनी-अपनी जीत के भारी-भरकम दावे करने वाले राजनीतिक दल नतीजों के ठीक पहले पक्के तौर पर कुछ भी कहने से परहेज कर रहे हैं। परिसीमन ने सबको ऐसा उलझाया है कि उनको खुद पर भी भरोसा नहीं रहा। दरअसल, तीन दौर में हुए चुनाव के दौरान 75 से 80 फीसद मतदान ने भी तमाम राजनीतिक दलों को असमंजस में डाल दिया है। उनको यह समझ में नहीं आ रहा है कि इतना भारी मतदान आखिर किस बात का संकेत है। वैसे, बीते विधानसभा चुनावों में भी भारी मतदान हुआ था और तब वाममोर्चा ने रिकार्ड सीटें जीती थीं। लेकिन तब से हालात बदले हैं। सिंगुर और नंदीग्राम जैसी घटनाएं उसके बाद हुई हैं और विपक्ष भी काफी हद तक एकजुट नजर आ रहा है।
कांग्रेस ने पिछली बार छह सीटें जीती थीं। इनमें से सभी सीटें उत्तर बंगाल में हैं। वहां दार्जिलिंग सीट पर तो गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का हाथ पकड़ कर मैदान में उतरे भाजपा नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत की जीत तो कमोबेश तय ही है। यानी कांग्रेस की यह सीट तो हाथ से निकली ही है। इस कमी को पार्टी मालदा में पूरा करने का प्रयास कर रही है। पहले मालदा में एक ही सीट थी। लेकिन परिसीमन के बाद वहां दो सीटें बन गई हैं। पार्टी की अंतरकलह और गुटबाजी के बावजूद पार्टी को उन दोनों सीटों पर जीत की उम्मीद है। इसी तरह माकपा को राजधानी कोलकाता में एक सीट का नुकसान होने वाला है। कोलकाता में पहले तीन सीटें थीं। पिछली बार उनमें से एक पर ममता बनर्जी जीती थी और बाकी दो माकपा की झोली में गई थीं। लेकिन परिसीमन के बाद दो ही सीटें रह गई हैं। इनमें से कोलकाता दक्षिण सीट ममता की पारंपरिक सीट रही है। परिसीमन से उलझे समीकरणों के बावजूद कोई वामपंथी नेता ममता की हार का दावा करने का तैयार नहीं है। कोलकाता उत्तर सीट पर कांटे की टक्कर रही। यहां जीत-हार का अंतर काफी कम रहने की उम्मीद है।
लंबे अरसे बाद कांग्रेस व तृणमूल ने इन चुनावों में एक बार फिर एक-दूसरे का हाथ थामा था। अगर नतीजे उसके पक्ष में रहते हैं तो राज्य की भावी राजनीति में इस गठबंधन की अहम भूमिका हो सकती है। अगले साल राज्य में नगरनिगम व नगपालिका चुनाव होने हैं। हर विधानसभा चुनाव के साल भर पहले होने वाले इन चुनावों को राज्य में मिनी चुनाव कहा जाता है। उसके बाद 2011 में विधानसभा चुनाव होने हैं।
वाममोर्चा के पिछली बार बंगाल की 42 में से 35 सीटें मिली थीं। मोर्चे के नेता अबकी केंद्र में तीसरे मोर्चे की सरकार बनवाने और उसमें शामिल होने के लिए सक्रिय हैं। लेकिन यहां अपने किले में लगने वाली कोई भी बड़ी सेंध उसके इस प्रयास पर पानी फेर सकती है। इसलिए नतीजों से पहले मोर्चा खासकर माकपा के नेताओं ने भी अपने ओठ सिल रखे हैं।
(यह रिपोर्ट 16 मई को जनसत्ता में पहले पेज पर बॉटम के तौर पर छपी थी. उसी दिन चुनाव का नतीजा सामने आना था.नतीजों से साफ हो गया कि बंगाल में लाल किले की दीवारें दरक गई हैं.)

अब अंतिम दौर में साख की लड़ाई

कोलकाता, 10 मई। पश्चिम बंगाल में 13 मई को अंतिम दौर में होने वाले मतदान के लिए वाममोर्चा और कांग्रेस-तृणमूल कांग्रेस गठबंध की लड़ाई अब गांवों से निकल कर शहरों तक सिमट आई है। आखिरी दौर में ही ममता बनर्जी और मोहम्मद सलीम समेत कई दिग्गज मैदान में हैं। दोनों प्रमुख गठबंधनों में दलों ने अब शहरी वोटरों को लुभाने की होड़ मच गई है। पहले दो दौर के मतदान में अस्सी फीसद वोट पड़ने से चिंतित माकपा ने ममता को उनके दक्षिण कोलकाता संसदीय क्षेत्र में घेरने के लिए अपने स्टार प्रचारक मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य समेत पोलितब्यूरो के आधा दर्जन सदस्यों को मैदान में उतार दिया है।
इस अंतिम दौर से पहले दोनों गठबंधनों ने एक-दूसरे पर हमले तेज कर दिए हैं। परिसीमन के बाद महानगर में सीटों की तादाद तीन से घट कर दो रह गई है। इनमें से एक यानी दक्षिण कोलकाता ममता की पारंपरिक सीट है तो कोलकाता उत्तर संसदीय सीट पर माकपा के मोहम्मद सलीम जीत का दावा करते फिर रहे हैं। माकपा नेतृत्व तीसरे दौर की इन 11 सीटों पर खास ध्यान दे रहा है। पार्टी का एक तबका पहले दो दौर में अस्सी फीसद मतदान से चिंतित है। उसका मानना है कि इतना भारी मतदान आमतौर पर सत्ताविरोधी रुझान की वजह से ही होता है। हालांकि वर्ष 2006 के विधानसभा चुनावों में भी भारी मतदान हुआ था और तब वाममोर्चा को रिकार्ड सीटें मिली थीं। लेकिन तब और अब की राजनीतिक परिस्थिति में अंतर है। उस समय विपक्ष बिखरा था और अबकी कांग्रेस और तृणमूल एक साथ चुनाव लड़ रहे हैं। यही वजह है कि दमदम और बारासात जैसी सीटों पर माकपा जीत के लिए भाजपा की ओर ताक रही है।
तीसरे दौर में भी किसी दल के पास कोई मुद्दा नहीं है। हकीकत तो यह है कि बंगाल में अबकी लोकसभा चुनाव में कोई ठोस मुद्दा ही नहीं उभरा। खेती और उद्योग जैसे मुद्दे तो बीते विधानसभा चुनावों से ही चल रहे हैं। अबकी भी तमाम दलों के लिए यही मुद्दा रहा। अब नंदीग्राम में चुनाव बाद होने वाली हिंसा को कोलकाता में मुद्दा बनाने का प्रयास हो रहा है। लेकिन कोलकाता के वोटरों पर नंदीग्राम का क्या व कितना असर होगा, यह कहना मुश्किल है।
अंतिम दौर में दोनों गठबंधनों के बीच महज सीटों की ही नहीं, बल्कि साख की लड़ाई भी है। इस दौर के मतदान और उसके नतीजों से ही तय होगा कि शहरी लोग आखिर उद्योग और जमीन अधिग्रहण जैसे मुद्दों पर क्या राय रखते हैं। ममता बनर्जी, मोहम्मद सलीम और मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के इलाके यादवपुर से मैदान में उतरे सुजन चक्रवर्ती के अलावा डायमंड हार्बर संसदीय सीट से किस्मत आजमा रहे प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सोमेन मित्र जैसे दिग्गज इसी दौर में हैं। यादवपुर नामक विधानसभा सीट से ही मुख्यमंत्री जीतते रहे हैं। इसी नाम से संसदीय सीट भी है। वहां तृणमूल ने गायक कबीर सुमन को मैदान में उतारा है। मुख्यमंत्री का इलाका होने की वजह से इस सीट पर माकपा खास जोर दे रही है। लेकिन दक्षिण कोलकाता में तो पार्टी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। इलाके में पार्टी के चुनाव अभियान में पोलितब्यूरो के आधा दर्जन सदस्य मैदान में उतर पड़े हैं। इनमें महासचिव प्रकाश कारत, वृंदा कारत, सीताराम येचुरी, वाममोर्चा अध्यक्ष विमान बसु, मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य और उद्योग मंत्री निरुपम सेन शामिल हैं।
माकपा की इस कवायद से साफ है कि वह शहरी क्षेत्र के मतदाताओं पर अपनी पकड़ मजबूत करने के प्रति काफी गंभीर है। कोलकाता और आसपास के इलाकों पर पहले तृणमूल की पकड़ काफी मजबूत थी। लेकिन बीते विधानसभा चुनावों में माकपा को इन इलाकों में खासी कामयाबी मिली थी। अंतिम दौर में वह जहां अपनी उस पकड़ को और मजबूत बनाने का प्रयास कर रही है, वहीं तृणमूल कांग्रेस शहरी वोटरों को दोबारा अपने खेमे में खींचने का प्रयास कर रही है। इसलिए पार्टी ने बदलाव का नारा दिया है। लेकिन माकपा के एक नेता कहते हैं कि अंतिम दौर में कुछ नहीं बदलेगा। कोलकाता दक्षिण के अलावा बाकी सभी सीटों पर वाममोर्चा उम्मीदवारों की जीत लगभग तय है।

बंगाल में चढ़ते पारे ने गिराया चुनावी तापमान

कोलकाता, 25 अप्रैल। पश्चिम बंगाल में बीते सप्ताह से लगातार चढ़ते पारे ने कोलकाता और दक्षिण बंगाल के विभिन्न जिलों में चुनावी बुखार को काफी हद तक उतार दिया है। लगातार कड़ी धूप और गर्म हवा के थपेड़ों ने उम्मीदवारों और चुनाव प्रचार में जुटे कार्यकर्ताओं का घरों से निकलना मुहाल कर दिया है। पहले जहां सुबह से देर रात तक विभिन्न राजनीतिक दलों के जो उम्मीदवार और कार्यकर्ता चुनावी रैलियों और पदयात्राओं में व्यस्त नजर आ रहे थे, अब सुबह 11 बजते न बजते घरों और चुनावी कार्यालयों तक सिमट जाते हैं। उसके बाद लगभग सूर्यास्त के समय ही चुनाव अभियान का दूसरा दौर शुरू होता है। लगातार बढ़ती गर्मी ने कार्यकर्ताओं से लेकर उम्मीदवारों तक, सबका जोश ठंडा कर दिया है। बीते सप्ताह से अचानक बदले मौसम ने उम्मीदवारों को अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव पर मजबूर कर दिया है। मौसम विभाग की भविष्यवाणी ने इन उम्मीदवारों की दुश्चिता और बढ़ा दी है। विभाग ने अभी दो-तीन दिनों तक हालत में कोई बदलाव नहीं होने की बात कही है।
महानगर कोलकाता में अप्रैल के महीने में बीते एक दशक में कभी इतनी गर्मी नहीं पड़ी थी। यहां पारा लगातार 40 से 42 डिग्री सेंटीग्रेड तक बना हुआ है। दक्षिण बंगाल के बाकी जिलों खासकर बांकुड़ा, पुरुलिया और पूर्व व पश्चिम मेदिनीपुर की हालत तो और बुरी है। वहां तापमान 44 से 45 डिग्री के बीच है। ऐसे में उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार में पसीने छूट रहे हैं। मतदान की तारीख नजदीक आने के साथ चुनाव प्रचार में तेजी आने की बजाय गर्मी के चलते सुस्ती आ गई है। उम्मीदवारों ने गर्मी से बचने के लिए अपने खान-पान और जीवनशैली में बदलाव किए हैं। बावजूद इसके तापमान के 40 या उससे ऊपर पहुंचते ही उनकी हिम्मत जवाब दे रही है। कड़ी धूप के साथ पूरे दिन चलने वाले गर्म हवाओं के थपेड़ों ने टोपी और छाते जैसे धूप से बचने के पारंपरिक उपायों को भी बेअसर कर दिया है।