आर्थिक तंगी के बावजूद वाममोर्चा सरकार ने लोकसभा चुनाव के पहले अपने खजाने का मुंह खोल दिया है। कर्मचारियों के वेतन-भत्तों में बढ़ोतरी, दो रुपए किलो चावल देने और अल्पसंख्यक तबके के छात्रों को करोड़ों की छात्रवृत्ति बांटने के उसके हालिया फैसलों से साफ है कि सरकार ने चुनावों को ध्यान में रख कर ही ऐसा किया है। इसके अलावा आर्थिक मंदी से निपटने व राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए सरकार ने पांच हजार करोड़ रुपए के एक विशेष पैकेज का भी एलान कर दिया है। विपक्षी राजनीतिक दलों ने आरोप लगाया है कि वाममोर्चा सरकार अपने हितों को साधने के लिए ही मंदी के इस दौर के बावजूद दोनों हाथों से सरकारी खजाना लुटा रही है।
आम चुनावों से पहले सरकारी कर्मचारियों को अपने पाले में करने के लिए सरकार ने कर्मचारियों को महंगाई भत्ते की एक और किस्त देने का तो एलान किया ही है, छठे वेतन आयोग की सिफारिशें भी लागू कर दी हैं। यह छह फीसदी महंगाई भत्ता आज से ही लागू हो गया है। इससे राज्य सरकार पर मौजूदा वित्त वर्ष में 63 करोड रूपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। इसके अलावा सरकार ने पांचवें वेतन आयोग की सिफारिशें भी पहली अप्रैल से लागू करने का एलान किया है। इससे 13 लाख सरकारी कर्मचारियों का वेतन लगभग 32 फीसद बढ़ जाएगा। पहली अप्रैल से ही कर्मचारियों को चार फीसद की दर से महंगाई भत्ते की एक और किस्त मिलेगी। इससे राज्य सरकार के कर्मचारियों का वेतन भी केंद्रीय कर्मचारियों के बराबर हो गया है। इस मद में सरकार पर साढ़े पांच हजार करोड़ का बोझ पड़ेगा।
वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता ने कहा है कि वेतन आयोग की सिफारिशों के अध्ययन के लिए गठित समिति की रिपोर्ट मिलने के महज 13 दिनों के भीतर उसे मंजूरी दे दी गई। इससे सरकार की तेजी समझ में आती है।
सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों राशन के जरिए दो रुपए किलो की दर से चावल मुहैया कराने का भी एलान किया है। यह योजना सरकारी एलान के अगले दिन से ही लागू कर दी गई है। इसके लिए 35 करोड़ रुपए मंजूर किए गए हैं। सरकार को जब लगा कि इस नई योजना के तहत शुक्रवार, जिस दिन राशन दिया जाता है, तक चावल की खरीद संभव नहीं है तो उसने राशन डीलरों को मौजूदा स्टॉक से ही यह चावल देने का निर्देश दिया। यह चावल छह रुपए किलो की दर से खरीदा गया है। इससे राशन डीलरों को होने वाले नुकसान की भरपाई इस योजना के तहत आवंटित 35 करोड़ की रकम से की जाएगी।
सरकार ने अल्पसंख्यक तबके के छात्र-छात्रों की छात्रवृत्ति और शिक्षा कर्ज के तौर पर दी जाने वाली रकम भी बीते साल के मुकाबले दोगुनी से ज्यादा बढ़ा कर 31 करोड़ कर दिया है। इससे लगभग एक लाख छात्रों को फायदा होगा।
आर्थिक मंदी से निपटने तथा राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए सरकार ने 5,106 करोड़ रुपए के विशेष पैकेज का एलान किया है। वित्तमंत्री असीम दासगुप्ता कहते हैं कि आर्थिक मंदी में राज्य की अर्थव्यवस्था पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े और गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करने वाले लोगों को राहत मिले, इसीलिए सरकार ने इस पैकेज की घोषणा की है। इसके तहत बीपीएल तबके के लोगों को राशन दुकानों में दो रुपये प्रतिकिलो की दर से चावल मुहैया कराया जाएगा। उन्होंने कहा कि राज्य के बंद कल-कारखानों व चाय बागानों के मजदूरों का मासिक भत्ता 750 रुपए से बढ़ा कर एक हजार कर दिया गया है। पैकेज में शहरी व ग्रामीण क्षेत्र में बीपीएल तबके के लोगों के लिए गृह निर्माण योजना के लिए एक हजार करोड़ रुपए के आवंटन का प्रावधान रखा गया है। पैकेज के अंतर्गत राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में नए स्कूल व मदरसे खोलने के लिए धन उपलब्ध कराया गया है। इसके अलावा दो विश्वविद्यालय भी खोले जाएंगे।
सरकार ने राज्य के जेलों की सुरक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने के साथ ही उनकी खस्ताहाल स्थिति को सुधारने के लिए भी 10 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। इस रकम से जेलों में रेडियो स्कैनर, मेटल डिटेक्टर व सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे। इस रकम में लगभग चार करोड़ रुपए जेलों के रिकार्ड को कंप्यूटरीकृत करने में खर्च होंगे।
तृणमूल कांग्रेस ने सरकार की ओर से आर्थिक पैकेज के एलान और कर्मचारियों की वेतनवृद्धि का मुद्दा विधानसभा के बजट अधिवेश के दौरान उठाने का फैसला किया है। तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी ने कहा कि अधिवेशन जल्दी ही शुरू होने वाला है। ऐसे में सरकार ने सदन को अंधेरे में रख कर तमाम घोषणाएं की हैं। उन्होंने कहा कि सरकार दरअसल कर्मचारियों को बेवकूफ बना रही है। वह नए वेतनमान के तहत वर्ष 2006 से उनके बकाए का भुगतान नहीं करेगी। तृणणूल ने सरकार की इन तमाम घोषणाओं को चुनावी स्टंट करार दिया है।
Wednesday, June 10, 2009
बंगाल में चुनावी पटरी पर दौड़ने लगी शिलान्यासों की रेल
वाममोर्चा के पश्चिम बंगाल में शिलान्यासों की रेल चुनावी पटरी पर दौड़ने लगी है। टाटा मोटर्स की लखटकिया के सिंगुर से कारोबार समेटने के बाद मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की औद्योगिकीकरण की जो रेल पटरी से उतर गई थी, वह लोकसभा चुनावों के सिर पर आते ही सरपट दौड़ने लगी है। बीते कोई एक हफ्ते से राज्य में शिलान्यासों और उद्घाटनों की सिलसिला उफान पर है। मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य रोजाना राज्य में किसी न किसी परियोजना का उद्घाटन या शिलान्यास कर रहे हैं। इनमें इस्पात परियोजनाओं से लेकर ईस्ट-वेस्ट मेट्रो कॉरीडोर जैसी बड़ी परियोजनाएं शामिल हैं। मोटे अनुमान के मुताबिक, बुद्धदेव ने एक सप्ताह के भीतर ही 10 हजार करोड़ से ज्यादा लागत वाली कई परियोजनाओं का शिलान्यास किया है। यह बात दीगर है कि इनमें से कोई भी परियोजना 2011 से पहले पूरी नहीं होगी। जाहिर है आगामी लोकसभा चुनावों में उद्योग और औद्योगिकीरण ही वाममोर्चा का सबसे प्रमुख मुद्दा बनेगा।
मुख्यमंत्री ने बीते हफ्ते शुरूआत की पुरुलिया जिले के रघुनाथपुर जिले में श्याम स्टील की फैक्टरी के शिलान्यास से। वहां कंपनी ने 3425 करोड़ की लागत से 11 लाख टन क्षमता वाला एकीकृत इस्पात संयंत्र लगाने की योजना बनाई है। दिलचस्प बात यह है कि इस परियोजना के लिए जमीन के अधिग्रहण का काम भी अभी पूरा नहीं हुआ है। यह परियोजना 1265 एकड़ जमीन पर लगनी है, लेकिन अब तक महज 74 एकड़ का ही अधिग्रहण हुआ है। इस जमीन को कंपनी ने सीधे किसानों से खरीदा है। बावजूद इसके लोकसभा चुनावों के एलान को ध्यान में रखते हुए आनन-फानन में इसका शिलान्यास करा दिया गया। समारोह में मुख्यमंत्री ने कहा कि वे जिला प्रशासन से बात करेंगे ताकि बाकी जमीन का अधिग्रहण जल्दी ही हो जाए। हालांकि यह परियोजना कोई डेढ़ साल से लटकी थी। अब भी यह तय नहीं है कि इसका काम कब शुरू होगा। वैसे, कंपनी के अधिकारियों का दावा है कि इस साल की अंतिम तिमाही के दौरान काम शुरू हो जाएगा और परियोजना 2011 में पूरी हो जाएगी। लेकिन सरकारी सूत्रों को इस दावे पर संदेह है। वजह यह है कि बाकी जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया कब तक पूरी होगी, यह तय नहीं है।
उसके बाद मुख्यमंत्री ने शनिवार को बर्दवान जिले में जय बालाजी इंडस्ट्रीज के एकीकृत स्टील प्लांट में 450,000 टन क्षमता वाले एलॉय व स्टेनलेस स्टील की एक इकाई का उद्घाटन किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि नए रोजगार पैदा करने के लिए राज्य को निवेश की जरूरत है। लेकिन विपक्ष सरकार के औद्योगीकरण प्रयासों में अड़ंगा लगा कर बेरोजगार युवाओं के हितों को नुकसान पहुंचा रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि कुछ ताकतें हमारे औद्योगीकरण अभियान का विरोध कर रही हैं। लेकिन यह ऐसे हजारों बेरोजगार युवाओं के हितों के खिलाफ है, जो हमारी ओर रोजगार के लिए टकटकी लगाए हुए हैं।
उसके बाद रविवार को मुख्यमंत्री ने ईस्ट-वेस्ट मेट्रो कॉरीडोर का शिलान्यास कर दिया। हावड़ा नदी के नीचे से होकर गुजरने वाली मेट्रो देश में अपनी तरह की पहली परियोजना होगी। इस पर कुल 4874.58 करोड़ रुपए की लागत आएगी। इसमें से राज्य सरकार 1,452.58 करोड़ रुपए और केंद्र सरकार 1,169 करोड़ रुपए की आर्थिक सहायता देगी। राज्य सरकार ने बाकी 2,253 करोड़ रुपए की रकम जापान इंटरनेशनल को-ऑपरेशन एजेंसी से लंबी अवधि के कर्ज के तौर पर ली है। इस परियोजना का काम पूरा करने के लिए साल 2014 तक की समयसीमा रखी गई है। सरकार का दावा है कि इसका काम जल्दी ही शुरू हो जाएगा। लेकिन यहां देश की पहली मेट्रो रेल परियोजना में लगने वाले समय को ध्यान में रखें तो इसकी उम्मीद कम ही नजर आती है।
इसबीच, अब यह साफ हो गया है कि सिंगुर व नंदीग्राम की घटनाओं के बाद राज्य में निवेश का ग्राफ गिरा है। वर्ष 2008 में निवेश खींचने के मामले में राज्य का स्थान 13वां रहा जबकि उससे पहले यह चौथे नंबर पर था। एसोसिएटेड चेंबर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्री आफ इंडिया (एसोचेम) की ओर से जारी एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है। एसोचेम के महासचिव डीएस रावत के मुताबिक वर्ष 2007 में पश्चिम बंगाल निवेश खींचने के मामले में अव्वल रहा। कई देशी-विदेशी कंपनियों ने राज्य में बड़े पैमाने पर निवेश का ऐलान किया। वर्ष 2007 में राज्य में 2,434.89 अरब रुपए का निवेश हुआ था। लेकिन वर्ष 2008 मे यह घटकर 900.95 अरब रुपए हो गया। रिपोर्ट के मुताबिक, सिंगुर व नंदीग्राम मुद्दे के बाद राज्य में निवेश की रफ्तार धीमी पड़ चुकी है। निवेशक राज्य में ताजा निवेश करने में थोड़ी सावधानी बरत रहे हैं।
राज्य की प्रमुख राजनीतिक पार्टी तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पार्थ चटर्जी, जो विधानसभा में विपक्ष के नेता भी हैं, ने आरोप लगाया है कि राज्य में एक के बाद परियोजनाओं के शिलान्यास के जरिए मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने दरअसल लोकसभा चुनावों का प्रचार शुरू कर दिया है। वे कहते हैं कि मुख्यमंत्री के इस अभियान में विदेश मंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रणव मुखर्जी भी उनका सहयोग कर रहे हैं। वे हर शिलान्यास समारोह में मुख्यमंत्री की हां में हां मिलाकर लोगों की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास रहे हैं।
यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि सिंगुर के बाद सरकार ने विभिन्न परियोजनाओं पर जानबूझ कर धीरे चलने की नीति अपनाई थी। लेकिन अब लोकसभा चुनाव नजदीक आते देख कर उसने तमाम ठप पड़ी परियोजनाओं के शिलान्यासों व उद्घाटनों का सिलसिला शुरू कर दिया है। चुनावी आचार संहिता लागू होने से पहले से सरकार इनको निपटा देना चाहती है ताकि वह अपने इस सबसे अहम मुद्दे के नाम पर लोगों से वोट मांग सके।
मुख्यमंत्री ने बीते हफ्ते शुरूआत की पुरुलिया जिले के रघुनाथपुर जिले में श्याम स्टील की फैक्टरी के शिलान्यास से। वहां कंपनी ने 3425 करोड़ की लागत से 11 लाख टन क्षमता वाला एकीकृत इस्पात संयंत्र लगाने की योजना बनाई है। दिलचस्प बात यह है कि इस परियोजना के लिए जमीन के अधिग्रहण का काम भी अभी पूरा नहीं हुआ है। यह परियोजना 1265 एकड़ जमीन पर लगनी है, लेकिन अब तक महज 74 एकड़ का ही अधिग्रहण हुआ है। इस जमीन को कंपनी ने सीधे किसानों से खरीदा है। बावजूद इसके लोकसभा चुनावों के एलान को ध्यान में रखते हुए आनन-फानन में इसका शिलान्यास करा दिया गया। समारोह में मुख्यमंत्री ने कहा कि वे जिला प्रशासन से बात करेंगे ताकि बाकी जमीन का अधिग्रहण जल्दी ही हो जाए। हालांकि यह परियोजना कोई डेढ़ साल से लटकी थी। अब भी यह तय नहीं है कि इसका काम कब शुरू होगा। वैसे, कंपनी के अधिकारियों का दावा है कि इस साल की अंतिम तिमाही के दौरान काम शुरू हो जाएगा और परियोजना 2011 में पूरी हो जाएगी। लेकिन सरकारी सूत्रों को इस दावे पर संदेह है। वजह यह है कि बाकी जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया कब तक पूरी होगी, यह तय नहीं है।
उसके बाद मुख्यमंत्री ने शनिवार को बर्दवान जिले में जय बालाजी इंडस्ट्रीज के एकीकृत स्टील प्लांट में 450,000 टन क्षमता वाले एलॉय व स्टेनलेस स्टील की एक इकाई का उद्घाटन किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि नए रोजगार पैदा करने के लिए राज्य को निवेश की जरूरत है। लेकिन विपक्ष सरकार के औद्योगीकरण प्रयासों में अड़ंगा लगा कर बेरोजगार युवाओं के हितों को नुकसान पहुंचा रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि कुछ ताकतें हमारे औद्योगीकरण अभियान का विरोध कर रही हैं। लेकिन यह ऐसे हजारों बेरोजगार युवाओं के हितों के खिलाफ है, जो हमारी ओर रोजगार के लिए टकटकी लगाए हुए हैं।
उसके बाद रविवार को मुख्यमंत्री ने ईस्ट-वेस्ट मेट्रो कॉरीडोर का शिलान्यास कर दिया। हावड़ा नदी के नीचे से होकर गुजरने वाली मेट्रो देश में अपनी तरह की पहली परियोजना होगी। इस पर कुल 4874.58 करोड़ रुपए की लागत आएगी। इसमें से राज्य सरकार 1,452.58 करोड़ रुपए और केंद्र सरकार 1,169 करोड़ रुपए की आर्थिक सहायता देगी। राज्य सरकार ने बाकी 2,253 करोड़ रुपए की रकम जापान इंटरनेशनल को-ऑपरेशन एजेंसी से लंबी अवधि के कर्ज के तौर पर ली है। इस परियोजना का काम पूरा करने के लिए साल 2014 तक की समयसीमा रखी गई है। सरकार का दावा है कि इसका काम जल्दी ही शुरू हो जाएगा। लेकिन यहां देश की पहली मेट्रो रेल परियोजना में लगने वाले समय को ध्यान में रखें तो इसकी उम्मीद कम ही नजर आती है।
इसबीच, अब यह साफ हो गया है कि सिंगुर व नंदीग्राम की घटनाओं के बाद राज्य में निवेश का ग्राफ गिरा है। वर्ष 2008 में निवेश खींचने के मामले में राज्य का स्थान 13वां रहा जबकि उससे पहले यह चौथे नंबर पर था। एसोसिएटेड चेंबर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्री आफ इंडिया (एसोचेम) की ओर से जारी एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है। एसोचेम के महासचिव डीएस रावत के मुताबिक वर्ष 2007 में पश्चिम बंगाल निवेश खींचने के मामले में अव्वल रहा। कई देशी-विदेशी कंपनियों ने राज्य में बड़े पैमाने पर निवेश का ऐलान किया। वर्ष 2007 में राज्य में 2,434.89 अरब रुपए का निवेश हुआ था। लेकिन वर्ष 2008 मे यह घटकर 900.95 अरब रुपए हो गया। रिपोर्ट के मुताबिक, सिंगुर व नंदीग्राम मुद्दे के बाद राज्य में निवेश की रफ्तार धीमी पड़ चुकी है। निवेशक राज्य में ताजा निवेश करने में थोड़ी सावधानी बरत रहे हैं।
राज्य की प्रमुख राजनीतिक पार्टी तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पार्थ चटर्जी, जो विधानसभा में विपक्ष के नेता भी हैं, ने आरोप लगाया है कि राज्य में एक के बाद परियोजनाओं के शिलान्यास के जरिए मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने दरअसल लोकसभा चुनावों का प्रचार शुरू कर दिया है। वे कहते हैं कि मुख्यमंत्री के इस अभियान में विदेश मंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रणव मुखर्जी भी उनका सहयोग कर रहे हैं। वे हर शिलान्यास समारोह में मुख्यमंत्री की हां में हां मिलाकर लोगों की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास रहे हैं।
यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि सिंगुर के बाद सरकार ने विभिन्न परियोजनाओं पर जानबूझ कर धीरे चलने की नीति अपनाई थी। लेकिन अब लोकसभा चुनाव नजदीक आते देख कर उसने तमाम ठप पड़ी परियोजनाओं के शिलान्यासों व उद्घाटनों का सिलसिला शुरू कर दिया है। चुनावी आचार संहिता लागू होने से पहले से सरकार इनको निपटा देना चाहती है ताकि वह अपने इस सबसे अहम मुद्दे के नाम पर लोगों से वोट मांग सके।
रैली के जरिए शुरू हुआ वाममोर्चा का सबसे कठिन चुनाव अभियान
पश्चिम बंगाल में सत्तारुढ़ वाममोर्चा ने रविवार को यहां एक रैली के जरिए अपना अब तक का सबसे कठिन चुनाव अभियान शुरू किया। इससे पहले कभी किसी चुनाव के पहले मोर्चा को इतनी प्रतिकूल परिस्थितियों से नहीं जूझना पड़ा था। अभियान तो हर बार वह सबसे पहले शुरू करता था, लेकिन सिंगुर, नंदीग्राम, गोरखालैंड आंदोलन, लालगढ़, बीते साल हुए पंचायत चुनावों के नतीजे जैसे मुद्दों व सवालों से घिरे मोर्चा ने अबकी इनकी काट के तौर पर ही ब्रिगेड में रिकार्ड भीड़ जुटा कर अपना अभियान शुरू किया। मोर्चा इस आम चुनाव से पहले जिन समस्याओं से घिरा है, उसमें विपक्ष की बजाय उसी का हाथ ज्यादा है। यानी ज्यादातर मुसीबतें उसने खुद ही पैदा की हैं। मोर्चा के सबसे बड़े व ताकतवर घटक माकपा ने ही उसे लालगढ़ और गोरखा बनाम आदिवासी के झगड़े में फंसाया है।
सिंगुर से पहले तक जिस राज्य में औद्योगिकीकरण अबियान की धूम मची थी, वहां अब इसका कोई नामलेवा तक नहीं मिल रहा है। सिंगुर से टाटा मोटर्स के कामकाज समेटने के बाद यह मुद्दा लगभग ठप हो गया है। वैसे, मोर्चा ने इससे पांव पीछे नहीं खींचे हैं। लोकसभा चुनावों में औद्योगिकीरकरण भी उसका एक अहम मुद्दा बनने जा रहा है। सिंगुर, लालगढ़, गोरखालैंड और दिनहाटा में पुलिस फायरिंग जैसे मुद्दों पर मोर्चा के घटक दलों के बीच भी मतभेद उभरे। लेकिन इससे माकपा की नीतियों पर कोई अंतर नहीं पड़ने वाला। दरअसल, मोर्चा का मतभेद कागजी ही होता है। घटक दलों के नेता मीडिया में तो अपने मतभेदों के बारे में टिप्पणी करते हैं, लेकिन वाममोर्चा की बैठक में माकपा की घउड़की के आगे वे मुंह नहीं खोल पाते।
माकपा और मोर्चा का शीर्ष नेतृत्व उक्त मुद्दों के असर को लेकर चिंतित है। विपक्ष उसकी चिंता का विषय नहीं है। वह (विपक्ष) तो खुद राज्य में बिखराव का शिकार होकर एका और चुनावी तालमेल का बेसुरा राग अलाप रहा है। वामपंथियों की चिंता यह है कि अपने काडरों की गलतियों की वजह से उसने नंदीग्राम व लालगढ़ जैसे जो भस्मासुर पैदा किए हैं, उनका लोकसभा चुनावों पर क्या असर पड़ेगा। बीते पंचायत चुनावों और नंदीग्राम विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव के नतीजों ने काफी हद तक भविष्य का संकेत तो दे ही दिया है। लेकिन अब मोर्चा नेतृत्व इसकी काट की तलाश में जुटा है। दागी नेताओं के चलते चुनावी नतीजों पर पड़ने वाले प्रतिकूल असर को ध्यान में रखते हुए ही माकपा ने अभकी कोई एक दर्जन से ज्यादा नए चेहरों को टिकट देने का फैसला किया है। पार्टी के उम्मीदवारों की सूची भी जल्दी ही जारी कर दी जाएगी।
तीन महीने से ज्यादा बीत जाने के बावजूद लालगढ़ में बारूदी सुरंग के विस्फोट से शुरू हुई समस्या खत्म होने के बावजूद लगातार उलझती ही जा रही है। बीते दिनों माकपा नेता की शव यात्रा के दौरान हुई फायरिंग में तीन लोगों की मौत ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। इसके अलावा दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में अलग गोरखालैंड राज्य की मांग में साल भर से जारी आंदोलन की लपटें अब डुआर्स व तराई के मैदानी इलाकों तक भी पहुंचने लगी हैं। इलाके में हिंसा, आगजनी व बंद तो अब आम हो गया है। इसी शनिवार को बंद के दौरान गोरखालैंड समर्थकों व विरोधियों के बीच हुई हिंसा में दो लोगों की मौत हो गई। आंदोलन की अगुवाई करने वाले गोरखा जनमुक्ति मोर्चा और मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के बीच हुई हालिया बैठक बेनतीजा रहने के बाद यह समस्या और गंभीर रूप ले रही है।
इन तमाम समस्याओं से निपट कर अपना अभियान बेहतर तरीके से चलाने के मकसद से ही माकपा ने पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु की भी सहायता ली है। अपनी बढ़ती उम्र व बिगड़ते स्वास्थ्य की वजह से बसु अब पार्टी के कार्यक्रमों में शिरकत नहीं करते। लेकिन रैली के एक दिन पहले मोर्चा ने उनसे बयान जारी करा दिया। इस बयान में बसु ने विपक्षी दलों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि बंगाल में जो वाममोर्चा का विरोध कर रहे हैं, उनके पास न तो कोई योजना है और न कोई नीति। वे सत्ता में आने के लिए बन्दूक का सहारा ले रहे हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए प्रदेश के राजनेताओं और आमलोगों को एक साथ मिलकर काम करना चाहिए। उन्होंने कहा है कि सरकार बंगाल में लगातार विकास कार्य कर रही है। लेकिन प्रमुख विपक्षी पार्टी तृणमूल कांग्रेस विकास विरोधी है। बसु ने कहा है कि विकास कार्यो में बाधा डालकर बंगाल और इसके लोगों का नुकसान किया जा रहा है। लोकसभा चुनाव में वाममोर्चा को जिताने की अपील करते हुए उन्होंने लोगों से एक जिम्मेदार पार्टी को वोट देने को कहा है। उन्होंने कहा कि विरोधियों के पास कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं है। उनके पास नैतिकता और सिद्धांत का भी अभाव है। बसु ने राज्य सरकार की औद्योगिकीरण की नीति का समर्थन करते हुए कहा है राज्य में विकास के लिए उद्योगों की स्थापना जरूरी है। उद्योगों से ही युवकों को रोजगार मिलेगा। राज्य में कृषि के साथ उद्योग का भी विकास किया जाएगा।
दूसरी ओर, आम चुनावों से पहले सरकारी कर्मचारियों को अपने पाले में करने के लिए सरकार ने कर्मचारियों को महंगाई भत्ते की एक और किश्त देने का तो एलान किया ही है, छठे वेतन आयोग की सिफारिशें भी अगले वित्त वर्ष से लागू करने की बात कही है।
राज्य के वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता के मुताबिक यह छह फीसदी महंगाई भत्ता एक मार्च से लागू होगा। इससे राज्य सरकार पर मौजूदा वित्त वर्ष में 63 करोड रूपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। सरकार ने छठे वेतन आयोग की सिफारिश भी पहली अप्रैल से लागू करने का भरोसा दिया है। सरकार पहले ही कह चुकी है कि आयोग मूल वेतन में 30 फीसदी से ज्यादा वृद्धि की सिफारिश करेगा।
यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि वाममोर्चा संगठन और सरकार के स्तर पर तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों से निपटने के लिए ठोस कदम उठा रहा है। लोकसभा चुनावों में उसके यह उपाय कितने कारगर होंगे, यह तो बात में पता चलेगा। लेकिन अपनी रिकार्ड रैली के जरिए महानगर को अस्त-व्यस्त करते हुए उसने सबसे पहले अपना चुनाव अभियान तो शुरू कर ही दिया है।
सिंगुर से पहले तक जिस राज्य में औद्योगिकीकरण अबियान की धूम मची थी, वहां अब इसका कोई नामलेवा तक नहीं मिल रहा है। सिंगुर से टाटा मोटर्स के कामकाज समेटने के बाद यह मुद्दा लगभग ठप हो गया है। वैसे, मोर्चा ने इससे पांव पीछे नहीं खींचे हैं। लोकसभा चुनावों में औद्योगिकीरकरण भी उसका एक अहम मुद्दा बनने जा रहा है। सिंगुर, लालगढ़, गोरखालैंड और दिनहाटा में पुलिस फायरिंग जैसे मुद्दों पर मोर्चा के घटक दलों के बीच भी मतभेद उभरे। लेकिन इससे माकपा की नीतियों पर कोई अंतर नहीं पड़ने वाला। दरअसल, मोर्चा का मतभेद कागजी ही होता है। घटक दलों के नेता मीडिया में तो अपने मतभेदों के बारे में टिप्पणी करते हैं, लेकिन वाममोर्चा की बैठक में माकपा की घउड़की के आगे वे मुंह नहीं खोल पाते।
माकपा और मोर्चा का शीर्ष नेतृत्व उक्त मुद्दों के असर को लेकर चिंतित है। विपक्ष उसकी चिंता का विषय नहीं है। वह (विपक्ष) तो खुद राज्य में बिखराव का शिकार होकर एका और चुनावी तालमेल का बेसुरा राग अलाप रहा है। वामपंथियों की चिंता यह है कि अपने काडरों की गलतियों की वजह से उसने नंदीग्राम व लालगढ़ जैसे जो भस्मासुर पैदा किए हैं, उनका लोकसभा चुनावों पर क्या असर पड़ेगा। बीते पंचायत चुनावों और नंदीग्राम विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव के नतीजों ने काफी हद तक भविष्य का संकेत तो दे ही दिया है। लेकिन अब मोर्चा नेतृत्व इसकी काट की तलाश में जुटा है। दागी नेताओं के चलते चुनावी नतीजों पर पड़ने वाले प्रतिकूल असर को ध्यान में रखते हुए ही माकपा ने अभकी कोई एक दर्जन से ज्यादा नए चेहरों को टिकट देने का फैसला किया है। पार्टी के उम्मीदवारों की सूची भी जल्दी ही जारी कर दी जाएगी।
तीन महीने से ज्यादा बीत जाने के बावजूद लालगढ़ में बारूदी सुरंग के विस्फोट से शुरू हुई समस्या खत्म होने के बावजूद लगातार उलझती ही जा रही है। बीते दिनों माकपा नेता की शव यात्रा के दौरान हुई फायरिंग में तीन लोगों की मौत ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। इसके अलावा दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में अलग गोरखालैंड राज्य की मांग में साल भर से जारी आंदोलन की लपटें अब डुआर्स व तराई के मैदानी इलाकों तक भी पहुंचने लगी हैं। इलाके में हिंसा, आगजनी व बंद तो अब आम हो गया है। इसी शनिवार को बंद के दौरान गोरखालैंड समर्थकों व विरोधियों के बीच हुई हिंसा में दो लोगों की मौत हो गई। आंदोलन की अगुवाई करने वाले गोरखा जनमुक्ति मोर्चा और मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के बीच हुई हालिया बैठक बेनतीजा रहने के बाद यह समस्या और गंभीर रूप ले रही है।
इन तमाम समस्याओं से निपट कर अपना अभियान बेहतर तरीके से चलाने के मकसद से ही माकपा ने पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु की भी सहायता ली है। अपनी बढ़ती उम्र व बिगड़ते स्वास्थ्य की वजह से बसु अब पार्टी के कार्यक्रमों में शिरकत नहीं करते। लेकिन रैली के एक दिन पहले मोर्चा ने उनसे बयान जारी करा दिया। इस बयान में बसु ने विपक्षी दलों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि बंगाल में जो वाममोर्चा का विरोध कर रहे हैं, उनके पास न तो कोई योजना है और न कोई नीति। वे सत्ता में आने के लिए बन्दूक का सहारा ले रहे हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए प्रदेश के राजनेताओं और आमलोगों को एक साथ मिलकर काम करना चाहिए। उन्होंने कहा है कि सरकार बंगाल में लगातार विकास कार्य कर रही है। लेकिन प्रमुख विपक्षी पार्टी तृणमूल कांग्रेस विकास विरोधी है। बसु ने कहा है कि विकास कार्यो में बाधा डालकर बंगाल और इसके लोगों का नुकसान किया जा रहा है। लोकसभा चुनाव में वाममोर्चा को जिताने की अपील करते हुए उन्होंने लोगों से एक जिम्मेदार पार्टी को वोट देने को कहा है। उन्होंने कहा कि विरोधियों के पास कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं है। उनके पास नैतिकता और सिद्धांत का भी अभाव है। बसु ने राज्य सरकार की औद्योगिकीरण की नीति का समर्थन करते हुए कहा है राज्य में विकास के लिए उद्योगों की स्थापना जरूरी है। उद्योगों से ही युवकों को रोजगार मिलेगा। राज्य में कृषि के साथ उद्योग का भी विकास किया जाएगा।
दूसरी ओर, आम चुनावों से पहले सरकारी कर्मचारियों को अपने पाले में करने के लिए सरकार ने कर्मचारियों को महंगाई भत्ते की एक और किश्त देने का तो एलान किया ही है, छठे वेतन आयोग की सिफारिशें भी अगले वित्त वर्ष से लागू करने की बात कही है।
राज्य के वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता के मुताबिक यह छह फीसदी महंगाई भत्ता एक मार्च से लागू होगा। इससे राज्य सरकार पर मौजूदा वित्त वर्ष में 63 करोड रूपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। सरकार ने छठे वेतन आयोग की सिफारिश भी पहली अप्रैल से लागू करने का भरोसा दिया है। सरकार पहले ही कह चुकी है कि आयोग मूल वेतन में 30 फीसदी से ज्यादा वृद्धि की सिफारिश करेगा।
यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि वाममोर्चा संगठन और सरकार के स्तर पर तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों से निपटने के लिए ठोस कदम उठा रहा है। लोकसभा चुनावों में उसके यह उपाय कितने कारगर होंगे, यह तो बात में पता चलेगा। लेकिन अपनी रिकार्ड रैली के जरिए महानगर को अस्त-व्यस्त करते हुए उसने सबसे पहले अपना चुनाव अभियान तो शुरू कर ही दिया है।
नतीजों की कसौटी पर कुछ चुनावी खबरें
अबकी लोकसभा चुनावों के दौरान मैंने अपने अखबार जनसत्ता के लिए कई विश्लेषण लिखे थे. उनमें से कुछ चुनिंदा रिपोर्टों को यहां दे रहा हूं. इससे पता चलेगा कि यह रिपोर्ट्स नतीजों की कसौटी पर कितनी खरी उतरी हैं. इनको यहां देने का मकसद अपनी पीठ ठोकना नहीं है. चुनाव के लगभग महीने भर बाद इन रिपोर्टों को देखना मेरे लिए किसी आत्मवालोकन से कम नहीं है. पश्चिम बंगाल के अलावा पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों पर भी कुछ रिपोर्टें हैं. ज्यादातर रिपोर्ट्स जनसत्ता के तमाम संस्करणों में पहले पेज पर प्रमुखता से छपीं थी. तमाम लेख और रिपोर्ट्स जनसत्ता से साभार.
Monday, June 8, 2009
थम नहीं रही राहत पर राजनीति
पश्चिम बंगाल में चक्रवाती समुद्री तूफान आइला के गुजर जाने के एक पखवाड़े बाद भी तूफानपीड़ितों को राहत पहुंचाने के मुद्दे पर राजनीति थमने की बजाय लगातार तेज होती जा रही है। राज्य सरकार ने इस मुद्दे पर रविवार को सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। तृणमूल कांग्रेस तो इस बैठक में नहीं गई। लेकिन उसकी सहयोगी कांग्रेस के प्रतिनिधि इसमें मौजूद थे। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और रेल मंत्री ममता बनर्जी ने तूफान पीड़ितों को रेलवे की ओर से राहत भेजने का एलान किया है। इसबीच, केंद्रीय पर्यवेक्षकों की तीन अलग-अलग टीमें भी दार्जिलिंग के अलावा आइला से सबसे ज्यादा प्रभावित उत्तर और दक्षिण 24-परगना जिलों का दौरा कर चुकी है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने भी राहत के सवाल पर अपनी राजनीति चमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। वह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को तूफानपीड़ित इलाकों के दौरे पर लाने का प्रयास कर रही है। विडंबना यह है कि सुंदरबन के कई इलाकों में लोग अब भी दाने-दाने को तरस रहे हैं। खाने और पानी की कमी के चलते इलाके में गांव के गांव तेजी से खाली हो रहे हैं।
मुख्यमंत्री बुद्धदेव भंट्टाचार्य की अध्यक्षता में रविवार को यहां राइटर्स बिल्डिंग में आयोजित सर्वदलीय बैठक में तूफान पीड़ितों को दलगत हितों से ऊपर उठ कर अधिक से अधिक राहत उपलब्ध कराने पर सहमति बनी। बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने पत्रकारों से कहा कि दुर्गम क्षेत्रों में राहत ठीक से नहीं पहुंचने पर सभी दलों ने सवाल उठाए हैं। सबके सहयोग से राहत पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा। 14 जून को फिर सर्वदलीय बैठक होगी। इसमें राहत कार्य की समीक्षा की जाएगी। बैठक में विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टी एसयूसीआई शामिल नहीं हुई। भाजपा का भी कोई प्रतिनिधि बैठक में उपस्थित नहीं हुआ। कांग्रेस के मानस भुइंया और सुब्रत मुखर्जी शामिल हुए। बैठक में पीड़ितों को अधिक से अधिक राहत उपलब्ध कराने और उचित पुनर्वास पर सहमति हुई। तृणमूल ने यह कहते हुए इस बैठक का बायकाट किया था कि तूफान गुजर जाने के दो हफ्ते बाद अब इस बैठक का कोई मतलब नहीं है। यह काम पहले होना चाहिए था।
दूसरी ओर, प्रदेश कांग्रेस विधायक दल के नेता डा. मानस भुइयां ने राहत के तौर पर भेजी जाने वाली खाद्य सामग्री को राशन दुकानों में बेचने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी मेदिनीपुर में तूफान पीड़ितों से बात करने पर पता चला कि उन्हें अब तब राहत सामग्री नहीं मिली है। स्थानीय लोगों ने बताया कि अधिकांश खाद्य सामग्री राशन दुकानों में बेची जा रही है। उन्होंने कहा कि जब मैंने दुकानदारों से बात की तो राहत सामग्री बेचने की खबर सच निकली। इससे जिला प्रशासन व मुख्य सचिव अशोक मोहन चक्रवर्ती को अवगत कराया गया है। उन्होंने कहा कि पार्टी ने इस बारे में मुख्यमंत्री को भी एक पत्र भेजा है। भुइयां का आरोप है कि राहत सामग्री बेचने में स्थानीय माकपा नेता शामिल हैं। उन्होंने कहा कि एक ओर बंगाल के केन्द्रीय मंत्री तूफान पीड़ितों के लिए राहत के लिए आवाज उठा रहे हैं दूसरी तरफ राहत सामग्री बेची जा रही है। कांग्रेस नेता ने कहा कि यदि जल्दी ही सर्वदलीय राहत कमेटी बनाकर खाद्य सामग्री का वितरण का काम नहीं शुरू होता तो पार्टी कार्यकर्ता सड़क पर उतरने को बाध्य होंगे और 15 जून से शुरू होने वाले विधानसभा के वर्षाकालीन अधिवेशन में सरकार के खिलाफ आवाज उठाएंगे।
इसबीच, मुख्यमंत्री बुद्धदेव भंट्टाचार्य ने रेल मंत्री की हैसियत से ममता बनर्जी के पीड़ितों की मदद के लिए आगे आने पर खुशी जताई है। उनका कहना है कि प्राकृतिक विपदा की इस घड़ी में सबका सहयोग जरूरी है। उन्होंने पीड़ितों की मदद में केंद्र की भूमिका की सराहना की है। बुद्धदेव ने पहली बार ममता बनर्जी के सहयोग के प्रति भी आभार जताया है और उनके कदम का स्वागत किया है। प्रणव मुखर्जी के साथ मुख्यमंत्री की बैठक के बाद केंद्र ने पीड़ितों के लिए 100 करोड़ रुपए मंजूर किए थे।
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस के मंत्रियों ने प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से चक्रवाती तूफान आइला से प्रभावित इलाकों का दौरा करने का अनुरोध किया है। तृणमूल कांग्रेस सूत्रों ने बताया कि ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री के साथ बातचीत में कहा है कि पीड़ितों की स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है और राज्य सरकार राहत में ढिलाई बरत रही है। ऐसे में उनको एक बार प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करना चाहिए। इस पर प्रधानमंत्री ने संसद सत्र समाप्त होने के बाद तूफान से प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने का भरोसा दिया है। कांग्रेस नेताओं के अनुसार उनके साथ सोनिया गांधी के भी आने की संभावना है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने तूफान पीड़ितों की मदद के लिए सरकारी कोष से और पांच करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। वित्तामंत्री डा. असीम दासगुप्ता ने बताया कि तूफान पीड़ितों की मदद के लिए अब तक 117 करोड़ दिए जा चुके हैं। प्रभावित इलाकों में राहत सामग्री भेजी जा रही है। 463 डाक्टरों की टीमें दिन- रात चिकित्सा सुविधा मुहैया कर रही है। डा. दासगुप्ता ने कहा कि 75 फीसदी तटबंधों की मरम्मत का काम पूरा हो चुका है। सुंदरवन विकास मंत्री कांति गांगुली व सिंचाई मंत्री सुभाष नस्कर को दक्षिण 24-परगना के बासंती व गोसाबा और नागरिक रक्षा मंत्री श्रीकुमार मुखर्जी को उत्तर 24-परगना के बसीरहाट में रह कर राहत कार्यों का निरीक्षण करने को कहा गया है। वित्ता मंत्री ने कहा कि तूफान पीड़ितों इलाकों का जायजा लेने आई केन्द्रीय टीम ने गृह सचिव अर्द्धेंदु सेन, उत्तर व दक्षिण 24 परगना के जिलाधिकारियों, वित्त, स्वास्थ्य , लोकनिर्माण व पर्यावरण विभाग के सचिवों के साथ बातचीत की है। उसने तूफान प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर स्थिति का जायजा लिया है। केंद्रीय टीम इसी हफ्ते केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी।
मुख्यमंत्री बुद्धदेव भंट्टाचार्य की अध्यक्षता में रविवार को यहां राइटर्स बिल्डिंग में आयोजित सर्वदलीय बैठक में तूफान पीड़ितों को दलगत हितों से ऊपर उठ कर अधिक से अधिक राहत उपलब्ध कराने पर सहमति बनी। बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने पत्रकारों से कहा कि दुर्गम क्षेत्रों में राहत ठीक से नहीं पहुंचने पर सभी दलों ने सवाल उठाए हैं। सबके सहयोग से राहत पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा। 14 जून को फिर सर्वदलीय बैठक होगी। इसमें राहत कार्य की समीक्षा की जाएगी। बैठक में विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टी एसयूसीआई शामिल नहीं हुई। भाजपा का भी कोई प्रतिनिधि बैठक में उपस्थित नहीं हुआ। कांग्रेस के मानस भुइंया और सुब्रत मुखर्जी शामिल हुए। बैठक में पीड़ितों को अधिक से अधिक राहत उपलब्ध कराने और उचित पुनर्वास पर सहमति हुई। तृणमूल ने यह कहते हुए इस बैठक का बायकाट किया था कि तूफान गुजर जाने के दो हफ्ते बाद अब इस बैठक का कोई मतलब नहीं है। यह काम पहले होना चाहिए था।
दूसरी ओर, प्रदेश कांग्रेस विधायक दल के नेता डा. मानस भुइयां ने राहत के तौर पर भेजी जाने वाली खाद्य सामग्री को राशन दुकानों में बेचने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी मेदिनीपुर में तूफान पीड़ितों से बात करने पर पता चला कि उन्हें अब तब राहत सामग्री नहीं मिली है। स्थानीय लोगों ने बताया कि अधिकांश खाद्य सामग्री राशन दुकानों में बेची जा रही है। उन्होंने कहा कि जब मैंने दुकानदारों से बात की तो राहत सामग्री बेचने की खबर सच निकली। इससे जिला प्रशासन व मुख्य सचिव अशोक मोहन चक्रवर्ती को अवगत कराया गया है। उन्होंने कहा कि पार्टी ने इस बारे में मुख्यमंत्री को भी एक पत्र भेजा है। भुइयां का आरोप है कि राहत सामग्री बेचने में स्थानीय माकपा नेता शामिल हैं। उन्होंने कहा कि एक ओर बंगाल के केन्द्रीय मंत्री तूफान पीड़ितों के लिए राहत के लिए आवाज उठा रहे हैं दूसरी तरफ राहत सामग्री बेची जा रही है। कांग्रेस नेता ने कहा कि यदि जल्दी ही सर्वदलीय राहत कमेटी बनाकर खाद्य सामग्री का वितरण का काम नहीं शुरू होता तो पार्टी कार्यकर्ता सड़क पर उतरने को बाध्य होंगे और 15 जून से शुरू होने वाले विधानसभा के वर्षाकालीन अधिवेशन में सरकार के खिलाफ आवाज उठाएंगे।
इसबीच, मुख्यमंत्री बुद्धदेव भंट्टाचार्य ने रेल मंत्री की हैसियत से ममता बनर्जी के पीड़ितों की मदद के लिए आगे आने पर खुशी जताई है। उनका कहना है कि प्राकृतिक विपदा की इस घड़ी में सबका सहयोग जरूरी है। उन्होंने पीड़ितों की मदद में केंद्र की भूमिका की सराहना की है। बुद्धदेव ने पहली बार ममता बनर्जी के सहयोग के प्रति भी आभार जताया है और उनके कदम का स्वागत किया है। प्रणव मुखर्जी के साथ मुख्यमंत्री की बैठक के बाद केंद्र ने पीड़ितों के लिए 100 करोड़ रुपए मंजूर किए थे।
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस के मंत्रियों ने प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से चक्रवाती तूफान आइला से प्रभावित इलाकों का दौरा करने का अनुरोध किया है। तृणमूल कांग्रेस सूत्रों ने बताया कि ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री के साथ बातचीत में कहा है कि पीड़ितों की स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है और राज्य सरकार राहत में ढिलाई बरत रही है। ऐसे में उनको एक बार प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करना चाहिए। इस पर प्रधानमंत्री ने संसद सत्र समाप्त होने के बाद तूफान से प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने का भरोसा दिया है। कांग्रेस नेताओं के अनुसार उनके साथ सोनिया गांधी के भी आने की संभावना है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने तूफान पीड़ितों की मदद के लिए सरकारी कोष से और पांच करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। वित्तामंत्री डा. असीम दासगुप्ता ने बताया कि तूफान पीड़ितों की मदद के लिए अब तक 117 करोड़ दिए जा चुके हैं। प्रभावित इलाकों में राहत सामग्री भेजी जा रही है। 463 डाक्टरों की टीमें दिन- रात चिकित्सा सुविधा मुहैया कर रही है। डा. दासगुप्ता ने कहा कि 75 फीसदी तटबंधों की मरम्मत का काम पूरा हो चुका है। सुंदरवन विकास मंत्री कांति गांगुली व सिंचाई मंत्री सुभाष नस्कर को दक्षिण 24-परगना के बासंती व गोसाबा और नागरिक रक्षा मंत्री श्रीकुमार मुखर्जी को उत्तर 24-परगना के बसीरहाट में रह कर राहत कार्यों का निरीक्षण करने को कहा गया है। वित्ता मंत्री ने कहा कि तूफान पीड़ितों इलाकों का जायजा लेने आई केन्द्रीय टीम ने गृह सचिव अर्द्धेंदु सेन, उत्तर व दक्षिण 24 परगना के जिलाधिकारियों, वित्त, स्वास्थ्य , लोकनिर्माण व पर्यावरण विभाग के सचिवों के साथ बातचीत की है। उसने तूफान प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर स्थिति का जायजा लिया है। केंद्रीय टीम इसी हफ्ते केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी।
Sunday, June 7, 2009
बंगाल में नंदीग्राम की तर्ज पर फिर बर्चस्व की लड़ाई
पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव के बाद एक बार फिर राजनीतिक बर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई है। माकपा ने इस चुनाव में मुंहकी खाने के बाद राज्य के विभिन्न जिलों में अपनी खोई जमीन हासिल करने के लिए नंदीग्राम की तर्ज पर बर्चस्व और पुनर्दखल की लड़ाई शुरू कर दी है। चुनावी नतीजों के बाद होने वाली हिंसक घटनाओं में एक दर्जन से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। यह आग बुझने की बजाय लगातार धधकती जा रही है। चुनावी नतीजों के एक सप्ताह बाद ही राज्य के आइला की चपेट में आने की वजह से इन झड़पों को वैसी सुर्खियां तो नहीं मिली, लेकिन जिलों में हालत गंभीर है। माकपा और तृणमूल समर्थकों के अलावा विभिन्न कालेजों में माकपा और तृणमूल कांग्रेस से संबद्ध छात्र यूनियनों के बीच संघर्ष की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। राज्य के गृह सचिव अर्द्धेंदु सेन ने भी माना है कि लोकसभा चुनाव के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों की वजह से संघर्ष बढ़ रहा है। मरने वालों में तृणमूल कांग्रेस के समर्थकों की तादाद ही ज्यादा है।
मुर्शिदाबाद जिले के डोमकल इलाके में तो माकपा व कांग्रेस समर्थकों के बीच चुनाव के बाद से लगातार होने वाली हिंसक झड़पों से परेशान जिला पुलिस प्रशासन ने 20 जून तक धारा 144 लागू कर दी है। पंचायत चुनावों से ही डोमकल में कांग्रेस व माकपा समर्थकों के बीच अक्सर झड़पें होती रहीं जो लोकसभा चुनाव के बाद और तेज हो गई। बीते तीन दिनों में डोमकल में संघर्ष की चार वारदातें हुई, जिसमें कई लोग जख्मी हो गए। इन घटनाओं के लिए माकपा और कांग्रेस के नेता एक दूसरे को जिम्मेवार ठहराते रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि लोकसभा चुनावों में करारी हार के बाद हताश माकपा समर्थक हमले कर रहे हैं। वहीं माकपा नेताओं का आरोप है कि जीत के बाद कांग्रेस समर्थक माकपा समर्थकों पर हमला कर रहे हैं और घर जला रहे हैं।
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और रेल मंत्री ममता बनर्जी ने बंगाल में चुनाव बाद की स्थितियों को बहद खराब बताते हुए रेल मंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि माकपा को नंदीग्राम और सिंगुर की घटनाओं से सबक लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि कोई भी राजनीतिक पार्टी अपने खोए जनाधार को आतंक के सहारे वापस नहीं पा सकती। तृणमूल प्रमुख ने कहा कि लोकसभा चुनाव के बाद राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति काफी खराब हुई है। टकराव रोकने के लिए ही हमने अपने कार्यकर्ताओं को विजय जुलूस निकालने से मना कर दिया था। ममता का आरोप है कि माकपा काडरों ने पूरे राज्य में आतंक फैला रखा है इसमें हमारे 22 कार्यकर्ता मारे गए हैं। उन्होंने कहा कि माकपा सोचती है कि वह आतंक के सहारे अपना खोया जनाधार हासिल कर लेगी। लेकिन उसे नंदीग्राम और सिंगुर से सबक लेना चाहिए कि ऐसा नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर, माकपा के प्रदेश नेताओं ने इस हिंसा के लिए तृणमूल कांग्रेस को जिम्मेवार ठहराया है। पार्टी ने कहा है कि लोकसभा चुनाव में जीत के बाद पार्टी के कार्यकर्ता चुन-चुन कर माकपाइयों पर हमले कर रहे हैं और उनके घरों को जला रहे हैं।
ममता ने कहा है कि माकपा ने बीते सात-आठ दिनों में अत्याचार और हमले बढ़ा दिए हैं। खानकुल के तृणमूल कांग्रेस नेता युधिष्ठिर दलुई की हत्या का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि दलुई के हाथ- पैर काट डाले गए, उनके घर में आग लगा दी गई और घर की महिलाओं पर अत्याचार किया गया। उन्होंने कहा कि चुनावों के एलान के तुरंत बाद अगर ऐसी घटनाएं होतीं तो इसके लिए तृणमूल कांग्रेस को जिम्मेवार ठहराया जाता। लोकसभा चुनावों के नतीजे ने वामपंथियों की नींद उड़ा दी है। तृणमूल कांग्रेस सांसद मुकुल राय का आरोप है कि माकपा काडरों ने उन लोगों की एक सूची बना ली है जो चुनाव में माकपा के खिलाफ थे। इस सूची में शामिल जान्हवी मंडल की दो दिन पहले कुछ लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी। मंडल उत्तर 24-परगना के गोपालपुर का वाशिंदा था। वह तृणमूल का मतदान एजंट था। इस घटना के एक दिन पहले ही तृणमूल समर्थक युद्धिष्ठिर दलुई को जिन्दा जला दिया गया। हमलावरों ने पहले उसे चाकू मारा, फिर बम फेंका। इसके बाद उसे घर में बंद कर आग लगा दी। यही नहीं, उसके भाइयों के घरों में भी आग लगा दी गई।
दलुई के भाई तरुण कहते हैं कि हम लोगों का अपराध यह है कि हम तृणमूल कांग्रेस समर्थक हैं। इसलिए हमारे घरों को जला दिया गया। उनका आरोप है कि माकपाइयों ने इलाके में अपनी दहशत कायम करने के लिए ही हिंसा का रास्ता अख्तियार किया है। अब तो दोनों पार्टियों की लड़ाई से छात्र संगठन भी अछूते नहीं रहे। लगभग रोज ही किसी न किसी कालेज में माकपा व तृणमूल से संबद्ध छात्र संगठनों के बीच टकराव की खबरें आ रही हैं। यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि दरअसल विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए ही नंदीग्राम की तर्ज पर बर्चस्व और पुनर्दखल की यह लड़ाई शुरू हुई है। माकपा लोकसभा की हार को विधानसभा में नहीं दोहराना चाहती। यही वजह है कि वह इलाके में आतंक फैला कर अपना खोया जनाधार हासिल करने का प्रयास कर रही है।
मुर्शिदाबाद जिले के डोमकल इलाके में तो माकपा व कांग्रेस समर्थकों के बीच चुनाव के बाद से लगातार होने वाली हिंसक झड़पों से परेशान जिला पुलिस प्रशासन ने 20 जून तक धारा 144 लागू कर दी है। पंचायत चुनावों से ही डोमकल में कांग्रेस व माकपा समर्थकों के बीच अक्सर झड़पें होती रहीं जो लोकसभा चुनाव के बाद और तेज हो गई। बीते तीन दिनों में डोमकल में संघर्ष की चार वारदातें हुई, जिसमें कई लोग जख्मी हो गए। इन घटनाओं के लिए माकपा और कांग्रेस के नेता एक दूसरे को जिम्मेवार ठहराते रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि लोकसभा चुनावों में करारी हार के बाद हताश माकपा समर्थक हमले कर रहे हैं। वहीं माकपा नेताओं का आरोप है कि जीत के बाद कांग्रेस समर्थक माकपा समर्थकों पर हमला कर रहे हैं और घर जला रहे हैं।
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और रेल मंत्री ममता बनर्जी ने बंगाल में चुनाव बाद की स्थितियों को बहद खराब बताते हुए रेल मंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि माकपा को नंदीग्राम और सिंगुर की घटनाओं से सबक लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि कोई भी राजनीतिक पार्टी अपने खोए जनाधार को आतंक के सहारे वापस नहीं पा सकती। तृणमूल प्रमुख ने कहा कि लोकसभा चुनाव के बाद राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति काफी खराब हुई है। टकराव रोकने के लिए ही हमने अपने कार्यकर्ताओं को विजय जुलूस निकालने से मना कर दिया था। ममता का आरोप है कि माकपा काडरों ने पूरे राज्य में आतंक फैला रखा है इसमें हमारे 22 कार्यकर्ता मारे गए हैं। उन्होंने कहा कि माकपा सोचती है कि वह आतंक के सहारे अपना खोया जनाधार हासिल कर लेगी। लेकिन उसे नंदीग्राम और सिंगुर से सबक लेना चाहिए कि ऐसा नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर, माकपा के प्रदेश नेताओं ने इस हिंसा के लिए तृणमूल कांग्रेस को जिम्मेवार ठहराया है। पार्टी ने कहा है कि लोकसभा चुनाव में जीत के बाद पार्टी के कार्यकर्ता चुन-चुन कर माकपाइयों पर हमले कर रहे हैं और उनके घरों को जला रहे हैं।
ममता ने कहा है कि माकपा ने बीते सात-आठ दिनों में अत्याचार और हमले बढ़ा दिए हैं। खानकुल के तृणमूल कांग्रेस नेता युधिष्ठिर दलुई की हत्या का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि दलुई के हाथ- पैर काट डाले गए, उनके घर में आग लगा दी गई और घर की महिलाओं पर अत्याचार किया गया। उन्होंने कहा कि चुनावों के एलान के तुरंत बाद अगर ऐसी घटनाएं होतीं तो इसके लिए तृणमूल कांग्रेस को जिम्मेवार ठहराया जाता। लोकसभा चुनावों के नतीजे ने वामपंथियों की नींद उड़ा दी है। तृणमूल कांग्रेस सांसद मुकुल राय का आरोप है कि माकपा काडरों ने उन लोगों की एक सूची बना ली है जो चुनाव में माकपा के खिलाफ थे। इस सूची में शामिल जान्हवी मंडल की दो दिन पहले कुछ लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी। मंडल उत्तर 24-परगना के गोपालपुर का वाशिंदा था। वह तृणमूल का मतदान एजंट था। इस घटना के एक दिन पहले ही तृणमूल समर्थक युद्धिष्ठिर दलुई को जिन्दा जला दिया गया। हमलावरों ने पहले उसे चाकू मारा, फिर बम फेंका। इसके बाद उसे घर में बंद कर आग लगा दी। यही नहीं, उसके भाइयों के घरों में भी आग लगा दी गई।
दलुई के भाई तरुण कहते हैं कि हम लोगों का अपराध यह है कि हम तृणमूल कांग्रेस समर्थक हैं। इसलिए हमारे घरों को जला दिया गया। उनका आरोप है कि माकपाइयों ने इलाके में अपनी दहशत कायम करने के लिए ही हिंसा का रास्ता अख्तियार किया है। अब तो दोनों पार्टियों की लड़ाई से छात्र संगठन भी अछूते नहीं रहे। लगभग रोज ही किसी न किसी कालेज में माकपा व तृणमूल से संबद्ध छात्र संगठनों के बीच टकराव की खबरें आ रही हैं। यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि दरअसल विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए ही नंदीग्राम की तर्ज पर बर्चस्व और पुनर्दखल की यह लड़ाई शुरू हुई है। माकपा लोकसभा की हार को विधानसभा में नहीं दोहराना चाहती। यही वजह है कि वह इलाके में आतंक फैला कर अपना खोया जनाधार हासिल करने का प्रयास कर रही है।
Friday, June 5, 2009
शांति को तरसता शांतिनिकेतन
शांतिनिकेतन का चेहरा तेजी से बदल रहा है। कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में बोलपुर नामक प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर एक गांव में जब इसकी स्थापना की थी तब यह अपने नाम को सार्थख करता था। लेकिन अब यह अपने नाम को ही मुंह चिढ़ाता नजर आ रहा है। बीते एक-डेढ़ दशक के दौरान इस कस्बे के शहरीकरण की प्रक्रिया इतनी तेज हो गई है कि इसमें शांतिनिकेतन को तलाशना मुश्किल है। यहां अब सब कुछ है सिवाय शांति के। अभी दस साल पहले तक यहां किसी भी घर की खिड़की से सरसों के पीले फूलों से भरे खेत नजर आते थे। लेकिन अब वहां उन खेतों में फूलों की जगह बहुमंजिली इमारतें उग आई हैं।
बीते खास कर 10 वर्षों में शांतिनिकेतन का चेहरा ही बदल गया है। कभी गांव जैसा रहा यह कस्बा अब शहरीकरण की पूरी चपेट में आ गया है। जाने-माने चित्रकार जोगेन चौधुरी कभी अपने बागान में पक्षियों के कलरव के बीच चित्र बनाया करते थे। लेकिन अब यह कलरव कभी सुनाई नहीं देता। इसकी जगह अब वाहनों के शोर ने ले ली है। अब स्थानीय लोगों ने शांतिनिकेतन की हवा और पानी को प्रदूषण से बचाने की पहल करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की है।
कविगुरू रवींद्रनाथ टैगोर ने जिस माहौल को ध्यान में रखते हुए कोलकाता से लगभग डेढ़ सौ किमी दूर बोलपुर में शांतिनिकेतन की स्थापना की थी, वह माहौल बीते तकरीबन एक दशक में तेजी से बदला है। किसी जमाने में अपनी शांति और प्रदूषणमुक्त माहौल और विश्वभारती विश्विद्यालय के लिए दुनिया भर में मशहूर रहे शांतिनिकेतन की छवि अब पर्यटकों के सैरगाह के तौर पर विकसित हो रही है। क्रांकीट के तेजी से पसरते जंगल में इसका असली ग्रामीण स्वरूप कहीं खो गया है। कच्चे मकानों की जह अब रोज नए सेटेलाइट टाउनशिप बन रहे हैं। राजधानी कोलकाता के धनाढय लोगों ने यहां अपने फार्म हाउस व पक्के मकान बनवा लिए हैं जहां वे महीने में दो-चार दिन अपने मित्रों व परिजनों के साथ छुट्टियां मनाने चले आते हैं। बोलपुर स्टेशन से बाहर निकलते ही अब या तो क्रांकीट की बड़ी-बड़ी इमारतें नजर आती हैं या फिर होटलों के बोर्ड। बाहरी लोगों की आवाजाही बढ़ने से लाज व होटलों की तादाद और कमाई बढ़ी है लेकिन साथ ही इस छोटे से शहर का प्रदूषण भी तेजी से बढ़ा है। यह कस्बा तेजी से शहर में बदल रहा है। सबसे बड़ी दिक्कत सीवरेज की है। यह कस्बा न तो पंचायत समिति के अधीन है और न ही यहां कोई नगरपालिका है।
रवीद्रनाथ के पिता देवेंद्रनाथ टैगोर ने वर्ष 1863 में सात एकड़ जमीन पर एक आश्रम की स्थापना की थी। वहीं आज विश्वभारती है। रवीद्रनाथ ने 1901 में सिर्फ पांच छात्रों को लेकर यहां एक स्कूल खोला। इन पांच लोगों में उनका अपना पुत्र भी शामिल था। 1921 में राष्ट्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा पाने वाले विश्वभारती में इस समय लगभग छह हजार छात्र पढ़ते हैं। इसी के ईर्द-गिर्द शांतिनिकेतन बसा था। बोलपुर रेलवे स्टेशन से इस विश्व विद्यालय तक तीन किमी लंबी पतली सड़क पर पहले जहां सिर्फ रिक्शे नजर आते थे वहीं अब तिपहिया स्कूटरों और कारों की भीड़ लगी रहती है।
अब इसे शहरीकरण के चंगुल से बचाने की पहल के तहत स्थानीय नागरिकों ने शांतिनिकेतन अंचल आवासिक समिति का गठन किया है। समिति ने इस इलाके का पर्यावरण, स्वरूप और धनी सांस्कृतिक विरासत बचाने के लिए कलकत्ता हाईकोरट में एक याचिका भी दायर की है। बीरभूम जिले में स्थित शांतिनिकेतन तक कोलकाता से मजह ढाई घंटे के ट्रेन के सफर में पहुंचा जा सकता है। समिति के सुशांत टैगोर बताते हैं कि शांतिनिकेतन को व्यावसायिक नजरिए से कांक्रीट के जंगल में बदलने की सुनियोजित साजिश हो रही है। अब न्यायापालिका ही इसे बचा सकती है। कविगुरू ने अपनी आत्मकथा जीवन-स्मृति और आश्रमेर रूप ओ विकास में जिस खोवाई इलाके का बार-बार जिक्र किया था वह अब झोपड़ियों से पट गया है और जल्दी ही वहां नौ एकड़ जमीन पर एक आवासीय परियोजना शुरू होने वाली है। इसके अलावा वहां अब डुप्लेक्स मकानों की लंबी कतारें भी नजर आने लगी हैं। स्थानीय लोग
कहते हैं कि अगर तेजी से हो रहे निर्माणों पर कोई अंकुश नहीं लगाया गया तो दस साल बाद यह जगह रहने लायक नहीं रह जाएगी।
स्थानीय लोग मौजूदा हालात के लिए श्रीनिकेतन शांतिनिकेतन विकास प्राधिकरण (एसए सडीए) को जिम्मेवार ठहराते हैं। उनका आरोप है कि प्राधिकरण को सिर्फ मुनाफा कमाने की चिंता है,स्थानीय विरासत को बचाने की नहीं। प्राधिकरण अब यहां लाहाबंद में 24 एकड़ जमीन पर एक मनोरंजन पार्क बनाने में जुटा है। इसे एक निजी कंपनी को सौंपा गया है। इस जमीन पर 17 एकड़ में फैला एक तालाब भी था। लोग बताते हैं कि इस तालाब के किनारे हर साल प्रवासी पक्षियों की भीड़ जुटती थी लेकिन अब उन्होंने अपना मुंह मोड़ लिया है। बीते कुछ वर्षों से दूर-दराज से आने वाले पक्षियों की तादाद काफी कम हो चुकी है। लोकसभा अध्यक्ष और माकपा सांसद सोमनाथ चटर्जी ही उक्त प्राधिकरण के अध्यक्ष रहे हैं। उसके गठन के बाद बीते साल इस्तीफा देने तक। प्राधिकरण के एक अधिकारी कहते हैं कि हमने तो मनमाने तरीके से होने वाले निर्माण पर अंकुश लगाया है। प्राधिकरण को अदालतों में कई मामलों पर काफी रकम खर्च करनी पड़ रही है लेकिन हम अपना काम जारी रखेंगे। विश्वभारती से चार किमी दूर प्रांतिक रेलवे स्टेशन के पास अब कई नए रिसार्ट और सोनार तरी नामक आवासीय परियोजनाएं तैयार हो गई हैं।
लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जो विकास को सही मानते हैं। विश्वभारती के वाइस-चांसलर सुजीत बसु कहते हैं कि अब हर जगह बदलाव की लहर चल रही है और शांतिनिकेतन भी कोई अपवाद नहीं है। वे कहते हैं कि आखिर हम घड़ी की सुईयों को उल्टा तो नहीं घुमा सकते न। विश्वभारती में पहले यह अलिखित परंपरा थी कि शांतिनिकेतन में कोई भी मकान कविगुरू के दोमंजिले मकान उदयन से ऊंचा नहीं होना चाहिए। लेकिन अब यह नियम भी बदल रहा है। अब हर मकान में तीन मंजिल की नींव देने की बात कही जा रही है।
विश्वभारती भी हाल के दिनों में गलत वजहों से सुर्खियों में रहा है। कभी टैगोर के नोबेल पदक की चोरी की वजह से तो कभी प्रेम प्रसंग के चलते परिसर में होने वाली हत्याओं के। इन घटनाओं ने विश्वविद्यालय में सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
लेकिन क्या शांतिनिकेतन को शहर में बदलने से बचाना संभव है? इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है। लेकिन बाहर से यहां आकर बसने वालों को यहां मकान बनवाने में कुछ भी गलत नहीं लगता। 65 वर्ष के राजा भट्टाचार्य ने बीते साल ही यहां एक फ्लैट खरीदा है। वे सवाल करते हैं कि अगर बाकी लोग यहां मकान खरीद और बनवा सकते हैं तो हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते?यानी अब शांतिनिकेतन को शांति के लिए तरसना ही होगा।
बीते खास कर 10 वर्षों में शांतिनिकेतन का चेहरा ही बदल गया है। कभी गांव जैसा रहा यह कस्बा अब शहरीकरण की पूरी चपेट में आ गया है। जाने-माने चित्रकार जोगेन चौधुरी कभी अपने बागान में पक्षियों के कलरव के बीच चित्र बनाया करते थे। लेकिन अब यह कलरव कभी सुनाई नहीं देता। इसकी जगह अब वाहनों के शोर ने ले ली है। अब स्थानीय लोगों ने शांतिनिकेतन की हवा और पानी को प्रदूषण से बचाने की पहल करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की है।
कविगुरू रवींद्रनाथ टैगोर ने जिस माहौल को ध्यान में रखते हुए कोलकाता से लगभग डेढ़ सौ किमी दूर बोलपुर में शांतिनिकेतन की स्थापना की थी, वह माहौल बीते तकरीबन एक दशक में तेजी से बदला है। किसी जमाने में अपनी शांति और प्रदूषणमुक्त माहौल और विश्वभारती विश्विद्यालय के लिए दुनिया भर में मशहूर रहे शांतिनिकेतन की छवि अब पर्यटकों के सैरगाह के तौर पर विकसित हो रही है। क्रांकीट के तेजी से पसरते जंगल में इसका असली ग्रामीण स्वरूप कहीं खो गया है। कच्चे मकानों की जह अब रोज नए सेटेलाइट टाउनशिप बन रहे हैं। राजधानी कोलकाता के धनाढय लोगों ने यहां अपने फार्म हाउस व पक्के मकान बनवा लिए हैं जहां वे महीने में दो-चार दिन अपने मित्रों व परिजनों के साथ छुट्टियां मनाने चले आते हैं। बोलपुर स्टेशन से बाहर निकलते ही अब या तो क्रांकीट की बड़ी-बड़ी इमारतें नजर आती हैं या फिर होटलों के बोर्ड। बाहरी लोगों की आवाजाही बढ़ने से लाज व होटलों की तादाद और कमाई बढ़ी है लेकिन साथ ही इस छोटे से शहर का प्रदूषण भी तेजी से बढ़ा है। यह कस्बा तेजी से शहर में बदल रहा है। सबसे बड़ी दिक्कत सीवरेज की है। यह कस्बा न तो पंचायत समिति के अधीन है और न ही यहां कोई नगरपालिका है।
रवीद्रनाथ के पिता देवेंद्रनाथ टैगोर ने वर्ष 1863 में सात एकड़ जमीन पर एक आश्रम की स्थापना की थी। वहीं आज विश्वभारती है। रवीद्रनाथ ने 1901 में सिर्फ पांच छात्रों को लेकर यहां एक स्कूल खोला। इन पांच लोगों में उनका अपना पुत्र भी शामिल था। 1921 में राष्ट्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा पाने वाले विश्वभारती में इस समय लगभग छह हजार छात्र पढ़ते हैं। इसी के ईर्द-गिर्द शांतिनिकेतन बसा था। बोलपुर रेलवे स्टेशन से इस विश्व विद्यालय तक तीन किमी लंबी पतली सड़क पर पहले जहां सिर्फ रिक्शे नजर आते थे वहीं अब तिपहिया स्कूटरों और कारों की भीड़ लगी रहती है।
अब इसे शहरीकरण के चंगुल से बचाने की पहल के तहत स्थानीय नागरिकों ने शांतिनिकेतन अंचल आवासिक समिति का गठन किया है। समिति ने इस इलाके का पर्यावरण, स्वरूप और धनी सांस्कृतिक विरासत बचाने के लिए कलकत्ता हाईकोरट में एक याचिका भी दायर की है। बीरभूम जिले में स्थित शांतिनिकेतन तक कोलकाता से मजह ढाई घंटे के ट्रेन के सफर में पहुंचा जा सकता है। समिति के सुशांत टैगोर बताते हैं कि शांतिनिकेतन को व्यावसायिक नजरिए से कांक्रीट के जंगल में बदलने की सुनियोजित साजिश हो रही है। अब न्यायापालिका ही इसे बचा सकती है। कविगुरू ने अपनी आत्मकथा जीवन-स्मृति और आश्रमेर रूप ओ विकास में जिस खोवाई इलाके का बार-बार जिक्र किया था वह अब झोपड़ियों से पट गया है और जल्दी ही वहां नौ एकड़ जमीन पर एक आवासीय परियोजना शुरू होने वाली है। इसके अलावा वहां अब डुप्लेक्स मकानों की लंबी कतारें भी नजर आने लगी हैं। स्थानीय लोग
कहते हैं कि अगर तेजी से हो रहे निर्माणों पर कोई अंकुश नहीं लगाया गया तो दस साल बाद यह जगह रहने लायक नहीं रह जाएगी।
स्थानीय लोग मौजूदा हालात के लिए श्रीनिकेतन शांतिनिकेतन विकास प्राधिकरण (एसए सडीए) को जिम्मेवार ठहराते हैं। उनका आरोप है कि प्राधिकरण को सिर्फ मुनाफा कमाने की चिंता है,स्थानीय विरासत को बचाने की नहीं। प्राधिकरण अब यहां लाहाबंद में 24 एकड़ जमीन पर एक मनोरंजन पार्क बनाने में जुटा है। इसे एक निजी कंपनी को सौंपा गया है। इस जमीन पर 17 एकड़ में फैला एक तालाब भी था। लोग बताते हैं कि इस तालाब के किनारे हर साल प्रवासी पक्षियों की भीड़ जुटती थी लेकिन अब उन्होंने अपना मुंह मोड़ लिया है। बीते कुछ वर्षों से दूर-दराज से आने वाले पक्षियों की तादाद काफी कम हो चुकी है। लोकसभा अध्यक्ष और माकपा सांसद सोमनाथ चटर्जी ही उक्त प्राधिकरण के अध्यक्ष रहे हैं। उसके गठन के बाद बीते साल इस्तीफा देने तक। प्राधिकरण के एक अधिकारी कहते हैं कि हमने तो मनमाने तरीके से होने वाले निर्माण पर अंकुश लगाया है। प्राधिकरण को अदालतों में कई मामलों पर काफी रकम खर्च करनी पड़ रही है लेकिन हम अपना काम जारी रखेंगे। विश्वभारती से चार किमी दूर प्रांतिक रेलवे स्टेशन के पास अब कई नए रिसार्ट और सोनार तरी नामक आवासीय परियोजनाएं तैयार हो गई हैं।
लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जो विकास को सही मानते हैं। विश्वभारती के वाइस-चांसलर सुजीत बसु कहते हैं कि अब हर जगह बदलाव की लहर चल रही है और शांतिनिकेतन भी कोई अपवाद नहीं है। वे कहते हैं कि आखिर हम घड़ी की सुईयों को उल्टा तो नहीं घुमा सकते न। विश्वभारती में पहले यह अलिखित परंपरा थी कि शांतिनिकेतन में कोई भी मकान कविगुरू के दोमंजिले मकान उदयन से ऊंचा नहीं होना चाहिए। लेकिन अब यह नियम भी बदल रहा है। अब हर मकान में तीन मंजिल की नींव देने की बात कही जा रही है।
विश्वभारती भी हाल के दिनों में गलत वजहों से सुर्खियों में रहा है। कभी टैगोर के नोबेल पदक की चोरी की वजह से तो कभी प्रेम प्रसंग के चलते परिसर में होने वाली हत्याओं के। इन घटनाओं ने विश्वविद्यालय में सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
लेकिन क्या शांतिनिकेतन को शहर में बदलने से बचाना संभव है? इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है। लेकिन बाहर से यहां आकर बसने वालों को यहां मकान बनवाने में कुछ भी गलत नहीं लगता। 65 वर्ष के राजा भट्टाचार्य ने बीते साल ही यहां एक फ्लैट खरीदा है। वे सवाल करते हैं कि अगर बाकी लोग यहां मकान खरीद और बनवा सकते हैं तो हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते?यानी अब शांतिनिकेतन को शांति के लिए तरसना ही होगा।
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