Saturday, August 8, 2009

एक खामोश लेकिन सराहनीय क्रांति!


पश्चिम बंगाल के सबसे पिछड़े जिलों में शुमार और माओवादी गतिविधियों के लिए अक्सर सुर्खियां बटोरने वाले पुरुलिया जिले में बीते कुछ महीनों से एक खामोश क्रांति हो रही है. लेकिन माओवादी गतिविधियों के तले दबी इस क्रांति को कभी राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खी नहीं मिल सकी है. यह क्रांति शुरू की है कुछ छात्राओं ने. इलाके के विभिन्न गांवों और तबकों में लंबे अरसे से जारी बाल विवाह की परंपरा के खिलाफ. अशिक्षा व पिछड़ेपन के चलते उस जिले की ज्यादातर गांवों में लड़कियां 12-13 साल की होते न होते ब्याह कर जबरन पिया के घर भेज दी जाती हैं.
लेकिन अब शिक्षा के प्रति बढ़ते ललक ने इलाके में नाबालिग लड़कियों को इस परंपरा के खिलाफ खड़ा कर दिया है. रेखा कालिंदी नामक एक युवती ने कुछ महीने पहले अपने मां-बाप और समाज के विरोध के बावजूद इस दिशा में पहल की थी. उसकी इस पहल में अब धीरे-धीरे कई लड़कियां शामिल हो गई हैं. उनके इस अभियान में प्रशासन भी उनकी मदद कर रहा है. यह साहसिक फैसला करने वाली तीन लड़कियों-रेखा कालिंदी,सुनीता महतो व अफसाना खातून से राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने हाल ही में राष्ट्रपति भवन में मुलाकात कर उनका हौसला बढ़ाया था. राष्ट्रपति ने इन लड़कियों के साहसिक कदम के बारे में जानकर उनको दिल्ली बुलवाया था.
इन तीनों के साहस ने इलाके की दूसरी लड़कियों को भी बाल विवाह के खिलाफ एकजुट कर दिया है. अब अक्सर ऐसे खबरें जिले के विभिन्न गांवों से आ रही हैं जहां लड़कियां मा-बांप की मर्जी के खिलाफ बाल विवाह से इंकार करते हुए पढ़ाई को तरजीह दे रही हैं. सबसे ताजा मामला जिले के झालदा दो नंबर ब्लाक के ओलदी गांव के निवासी निमाई कुमार की पुत्री अहिल्या का है. उस के पिता निमाई कुमार बीड़ी मजदूर हैं. पढ़ाई में दिलचस्पी के चलते दो साल पहले अहिल्या का दाखिला पातराहातु चाइल्ड लेबर स्कूल में हुआ था. इसी दौरान अचानक उसके पिता ने कोटशिला थाना इलाके के बड़तलिया में एक लड़के से उसका विवाह तय कर दिया. अहिल्या ने इस मामले की जानकारी अपने मित्रों को दी. इसके बाद यह बात उसके शिक्षकों तक पहुंच गई. स्कूल के शिक्षकों ने अहिल्या के पिता को काफी समझाया-बुझाया और यह विवाह रोकने में कामयाब हो गए. अहिल्या के पिता की दलील है कि मजदूरी से पूरे परिवार के लिए दो जून की रोटी का जुगाड़ करना काफी मुश्किल है. इसलिए उन्होंने अहिल्या का विवाह तय कर दिया था ताकि उसे इस दुख से मुक्ति मिल सके.
दूसरी ओर, जिले के सहायक श्रम आयुक्त प्रसेनजीत कुंडू का कहना है कि पुरुलिया के पिछड़े क्षेत्रों में नारी सशक्तिकरण व बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है. इसी वजह से अब लोग जागरूक हो रहे हैं. विवाह रद्द होने के बाद अहिल्या फिर से स्कूल जाने लगी. वह अब पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती है. अहिल्या कहती है कि मैं अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूं ताकि घर की गरीबी दूर कर सकूं. इन छोटी लड़कियों के इस अभियान ने सरकार व बाल विवाह रोकने का दावा करने वाले तमाम गैर-सरकारी संगठनों को आईना तो दिखा ही दिया है.

Friday, August 7, 2009

काश! मोबाइल और पहले आया होता

(आज से तीन दिन बाद यानी दस तारीख को ब्लॉग लिखते तीन महीने पूरे हो जाएंगे. यह ब्लॉग की सौवीं पोस्ट है. ब्लॉग में आंकड़ों के लिहाज से मुझे अगर तेज नहीं तो बहुत सुस्त भी नहीं कहा जा सकता. सैकड़ा चाहे क्रिकेट में रनों का हो या फिर ब्लॉग में पोस्ट्स का, हमेशा अहम होता है. इसलिए सोचा इसमें राजनीति की बजाय कुछ पुराने अनुभव ही लिख दूं. कौन जाने किसी मित्र की नजर पड़ जाए इस पोस्ट पर.)
काश! मोबाइल और पहले आया होता. काश! आज की तरह ई-मेल और चैट का दौर और कुछ पहले आ गया होता. अगर इन दोनों में से कोई भी एक चीज दो दशक पहले हुई होती तो मुझे जीवन के कुछ बेहतरीन दोस्तों से बिछड़ना नहीं पड़ता. पत्रकारिता के लंबे अनुभव ने बताया है कि जीवन में बेहतर लोग कैरियर के शुरूआती दौर में ही मिलते हैं. अब ऐसा है या नहीं, नहीं जानता. इसकी वजह यह है कि अपने कुछ पूर्व सहयोगियों की नजर में मैं मुख्यधारा की पत्रकारिता में नहीं हूं. दिल्ली या हिंदी पट्टी में कभी नौकरी नहीं की, इसीलिए. मेरा अब तक का समय बंगाल, पूर्वोत्तर राज्यों, सिक्किम, भूटान और नेपाल की रिपोर्टिंग करते ही बीता है. लेकिन दिल्ली में अब कई अहम पदों तक पहुंचे लोगों को लगता है कि यह पत्रकारिता भी कोई पत्रकारिता है लल्लू. बहरहाल, मुझे इसका कोई दुख नहीं है. अब तक जो भी काम किया, उससे पूरी तरह संतुष्ट हूं. सही है कि जीवन में ज्यादा मौके नहीं मिले. जो मिले भी उनको भुनाने में कामयाब नहीं रहा. शायद हिंदी पट्टी या कथित मुख्यधारा की पत्रकारिता नहीं की थी--यही वजह रही होगी. लेकिन जब भी जहां काम किया मन लगा कर किया. बीते 18 वर्षों से ऐसे अखबार में हूं जहां लिखने-पढ़ने की पूरी आजादी है. जो भी लिखा, जस का तस छपा. राजनीति के इतर विषयों मसलन पर्यावरण, सामाजिक सरोकार और क्रिकेट पर भी खूब लिखा. क्रिकेट के एकदिनी और आईपीएल के कई मैच कवर किए इसी अखबार के लिए. अब तक जो किया उससे संतुष्ट हूं. अपनी खबरों की कतरनें रखना मैंने बहुत पहले छोड़ दिया था. अब न तो इतनी जगह है और न ही इसकी जरूरत. जरूरत की चीजें तो वैसे भी घर के कंप्यूटर में दर्ज हैं.
बहरहाल, मैं बात कर रहा था शुरूआती दौर की. सिलीगुड़ी से छपने वाले जनपथ समाचार में तीन साल की नौकरी के बाद गुवाहाटी से छपने वाले पूर्वांचल प्रहरी की लांचिग टीम के सदस्य के तौर पर मार्च, 1989 में जब गुवाहाटी पहुंचा तो वहां माहौल ही कुछ अलग था. देश के विभिन्न हिस्सों से आए युवा व प्रशिक्षु पत्रकारों के चलते वह टीम सही मायने में एक राष्ट्रीय टीम बन गई थी. बाद में हालांकि कुछ लोग सेंटिनल समूह के हिंदी दैनिक में चले गए तो कुछ गुवाहाटी को ही छोड़ गए. लेकिन वहां रहने वालों से मित्रता जस की तस रही. होली-दीवाली, तीज-त्योहार में एक-दूसरे के घर आना-जाना चलता रहता था. अक्सर ऐसी जुटान मेरे दो कमरे के किराए के असम टाइप मकान में होती थी. असम टाइप मकान का मतलब दीवारें टाट खड़ी कर उन पर सीमेंट की हल्की परत और ऊपर छत के जगह टीन. लेकिन तब वही महल लगता था. आखिर घर से पहली बार निकल कर अपनी कमाई से मकान किराए पर लेने का सुख ही कुछ और होता है. वहां बाथरूम दूर था. पानी की किल्लत थी. फिर भी महफिलें खूब जमीं. उसी मकान में दिल्ली से आए पत्रकार भी जुटते थे कई बार. उनमें से कुछ से अब भी संबंध हैं, कुछ रखना नहीं चाहते.
उसी दौर में विवेक पचौरी, प्रशांत, अरुण अस्थाना, आलोक जोशी और राकेश सक्सेना समेत कितने ही लोग आए थे गुवाहाटी. लेकिन उनमें से ज्यादातर नए आशियाने की तलाश में जल्दी ही लौट गए. सेंटिनल में काम करने वाले जयप्रकाश दंपती (जयप्रकाश मिश्र और उनकी पत्नी मधु) तो हमारे अजीज थे. बाद में एक बहुत प्यारी बेटी हुई थी उनको. बाद में वे गुवाहाटी से चले गए. उसके बाद बाद उनसे कोई संपर्क ही नहीं हो सका. वे गया के ही थे और उन्होंने प्रेम विवाह किया था. बाद में उड़ती-सी खबर सुनी कि जयप्रकाश को वहीं सरकारी नौकरी मिल गई है शायद.
फुर्सत के क्षणों में अजीजों का यह बिछोह बहुत सालता है. सेंटिनल में ही थे सुधीर सुधाकर, जो बाद में दिल्ली, बरेली और कई दूसरी जगहों पर घूमते हुए फिलहाल बी.ए.जी (अब शायद उसके न्यूज चैनल) में जमे हैं. अरुण अस्थाना बीबीसी होते हुए मुंबई में हैं और अक्सर बात होती है उनसे. लेकिन बाकी लोग एक बार बिछड़े तो फिर मिले ही नहीं. इनमें ही थे पूर्वांचल प्रहरी के कार्यकारी संपादक के.एम अग्रवाल, जो गोरखपुर के थे. अमृत प्रभात (इलाहाबाद) में लंबा अरसा बिताने के बाद वे गुवाहाटी आए थे. उनकी तरह ही कल्याण जायसवाल भी इलाहाबाद के थे.
पूर्वांचल में मार्केंटिग विभाग में काम करने वाली सुषमा सिंह और मेरी पत्नी के बीच काफी पटती थी. लेकिन सारनाथ में शादी के बाद वह मार्च, 1991 में गुवाहाटी रेलवे स्टेशन पर आखिरी बार मिली थी. उसके बाद रिपोर्टिंग के लिए बनारस जाने पर मैंने उसकी तलाश भी की. लेकिन कहीं से कोई सुराग नहीं मिला. वहीं एक पंजाबी कंपोजिटर थी सुरेखा सागर. काफी शर्मीली और सुंदर. हमारे फोटोग्राफर गोपाल मिश्र ने दफ्तर के नीचे बनी कैंटीन में चाय पीते हुए उससे पहली बार औपचारिक परिचय कराया था. फिर तो हमारी जो जमी कि पूछिए मत. किसी से ज्यादा बात नहीं करने वाली सुरेखा और मेरे बीच दुनिया-जहान के मुद्दों पर घंटों बातचीत होती थी. बाद में हमलोग एक बार उसके घर भी गए. सुरेखा के पिता नूनमाटी स्थित रिफाइनरी में काम करते थे. सुरेखा की शादी भी अमेरिका में बसे किसी एनआरआई से हो गई थी. तब से उसके बारे में भी कोई सूचना नहीं मिली.
तब दफ्तर के बाद समय काटने के लिए लोगों से मिलने-जुलने के अलावा कोई और साधन नहीं था. सरकारी दूरदर्शन अपने समय पर ही कार्यक्रम दिखाता था. बाकी कुछ था नहीं. उन दिनों की ही बात है. हर इतवार को सुबह एक सीरियल आता था-फिर वही तलाश. घर में तो टीवी था नहीं. लेकिन यह सीरियल शुरू होते ही हम मकान मालिक के घर भागते थे. हम पति-पत्नी ने शायद ही कोई एपीसोड मिस किया हो. हफ्ते में एक ही दिन तो आता था. बाद में लोग इधर-उधर बिछड़ते गए. जो बचे उनमें राजनीति घर करने लगी. जनसत्ता का कोलकाता संस्करण निकलने वाला था. कई लोग वहां चले गए. मुझे भी सिलीगुड़ी से काम करने का आफर मिला. घर लौटने के लोभ में मैं वहां चला आया. लेकिन अब भी कुछ मित्रों की यादें सालती हैं. बाद में यही सीखा कि उस समय की मित्रता निश्छल थी. आजकल की पत्रकारिता में तो मुंह में राम बगल में छुरी वाले मित्र ही ज्यादा मिलते हैं. काश! वो दिन फिर लौट आते. या फिर उन मित्रों में दो-चार फिर मिल जाते. उनके साथ बैठकर नब्बे के दशक की शुरूआत के उन दिनों को एक बार फिर जी लेता.

Thursday, August 6, 2009

लालगढ़ यानी नौ दिन चले अढाई कोस


पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार की ओर से केंद्रीय बलों की सहायता से कोई डेढ़ महीने पहले पश्चिम मेदिनीपुर जिले के लालगढ़ में ढोल पीट कर माओवादियों के खिलाफ शुरू किया अभियान आखिरकार फ्लॉप साबित हुआ है। लालगढ़ अभियान अब ‘नौ दिन चले अढाई कोस’ की कहावत को पूरी तरह चरितार्थ कर रहा है। मीडिया में तो यह बात काफी पहले से कही जा रही थी। राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी आफ द रिकार्ड यह बात कबूल कर रहे थे। लेकिन गुरुवार को राज्य सचिवालय राइटर्स बिल्डिंग में एक उच्च-स्तरीय बैठक में इस अभियान की समीक्षा के बाद आखिर सरकार ने भी इस बात को मान लिया। बैठक के बाद गृह सचिव अर्द्धेंदु सेन का कहना था कि लालगढ़ अभियान पूरी तरह कामयाब नहीं रहा है। शब्दों की बाजीगरी में लिपटे इस बयान का साफ मतलब है कि अभियान पूरी तरह नाकाम रहा है। सेन ने कहा कि शुरूआती दौर में कुछ कामयाबी मिलने के बावजूद बाद में यह नाकाम साबित हुआ। लालगढ़ में केंद्रीय बल के चार हजार जवानों की मौजूदगी के बावजूद वहां हत्याएं और अपहरण बदस्तूर जारी हैं। सेन कहते हैं कि सुरक्षा बल हर जगह मौजूद नहीं रह सकते। माओवादी वहां माकपाइयों को ही अपना निशाना बना रहे हैं।
गृह सचिव का बयान तथ्यों पर आधारित है। इसी हफ्ते इलाके में आधा दर्जन माकपा नेता व काडर मारे जा चुके हैं। तथ्य यह भी है कि इतने बड़े पैमाने पर अभियान के बावजूद अब तक एक भी माओवादी नेता न तो मारा गया है और न ही पुलिस के हत्थे चढ़ा है। पुलिस अत्याचार विरोधी समिति के संयोजक छत्रधर महतो खुलेआम पत्रकारों से बातचीत और जनसभाएं करते हैं। उनकी गिरफ्तारी के एलान के बावजूद पुलिस अब तक महतो के आसपास तक नहीं फटक सकी है।
सरकारी सूत्र बताते हैं कि पश्चिम मेदिनीपुर जिले के एसपी और जिलाशासक ने इस बैठक में सरकार को जो रिपोर्ट पेश की उसमें साफ कहा गया है कि अभियान पूरी तरह फ्लॉप रहा है। लालगढ़ मुद्दे से चिंतित मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने प्रशासन से इस मामले में कोई ठोस रणनीति बनाने को कहा था। यह बैठक भी बेनतीजा ही रही। अब 13 अगस्त को इसी मामले पर दोबारा बैठक होगी। अब सरकार ने केंद्र से सुरक्षा बलों की कम से कम छह और कंपनियां मांगने का फैसला किया है। उसने मौजूदा जवानों को भी कम से कम तीन महीने तक लालगढ़ में रखने का अनुरोध किया है।
दूसरी ओर, इलाके में पुलिस अभियान के बावजूद माकपा काडरों की लगातार हत्याओं पर चिंता जताते हुए माकपा के प्रदेश सचिव विमान बसु ने इस मुद्दे पर प्रशासन के साथ बातचीत करने की बात कही है। उन्होंने कहा कि माओवादियों ने हमले के बाद जंगल में फरार होने की रणनीति अपनाई है।
इधर, गृह सचिव का कहना था कि लालगढ़ में हालात काबू में आने में अभी कम से कम दो महीने का समय लग सकता है। वहां सामान्य स्थिति बहाल होने तक सुरक्षा बल मौजूद रहेंगे।
इससे साफ है कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के दो दिन बाद शुरू हुआ यह अभियान अब तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका है। यानी बुद्धदेव सरकार की मुसीबत बढ़ती ही जा रही है।

पाबंदियों वाला राज्य है मणिपुर


पूर्वोत्तर की सात बहनों में शुमार मणिपुर घाटी की गिनती उग्रवाद से प्रभावित राज्यों में होती है। दरअसल, यह अब कोई नई खबर नहीं है। इसकी वजह यह है कि मणिपुर घाटी में जितने उग्रवादी संगठन हैं उतने शायद इलाके के किसी भी राज्य में नहीं हैं। इस राज्य में कोई तीन दर्जन छोटे-बड़े संगठन सक्रिय है। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर यह घाटी हमेशा गलत वजहों से ही सुर्खियों में रही है। राजधानी इंफाल में इस समय भी कर्फ्यू जारी है।
राज्य में उग्रवाद के फलने-फूलने की एक प्रमुख वजह इस राज्य की सीमा का म्यामां से मिलना है। लेकिन यह भी कोई खबर नहीं है। खबर यह है कि बीते कुछ वर्षों के दौरान मणिपुर पाबंदियों वाला राज्य बन गया है। कभी कोई भूमिगत संगठन यहां हिंदी फिल्मों पर पाबंदी लगाता है तो कभी कोई छात्र संगठन छात्रों के दोपहिया वाहनों के इस्तेमाल पर। मामाला यहीं तक सीमित नहीं है। पाबंदी लगाने की इस होड़ में राज्य सरकार भी पीछे नहीं है। उसने किसी भी सरकारी भवन में सरकार विरोधी कोई कार्यक्रम आयोजित करने पर पाबंदी लगा दी है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह पर्वतीय राज्य अब इलाके में पाबंदी वाले सबसे बड़े राज्य के तौर पर उभर रहा है।
सबसे ताजा मामले में छात्र संगठन डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स अलायंस, मणिपुर (डीएसएएम) ने राजधानी इंफाल में जारी एक बयान में कहा है कि दोपहिया संस्कृति इस राज्य और कुछ परिवारों की अर्थव्यवस्था के अलावा अकादमिक गतिविधियों को भी प्रभावित कर रही है। संगठन ने कहा है कि बहुत से छात्र अपने शैक्षणिक संस्थानों तक आने-जाने के लिए दोपहिया वाहनों का इस्तेमाल करते हैं। खासकर कोचिंग संस्थान तो रोमांस के अड्डे बन गए हैं। संगठन ने कहा है कि इस पाबंदी को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए समुचित कदम उठाए जाए जाएंगे। संगठन ने कहा है कि उसने मजबूरी में इस पाबंदी का फैसला किया है क्योंकि इससे छात्रों का कैरियर प्रभावित हो रहा है। संगठन ने कहा है कि यह पाबंदी 12वीं कक्षा तक के छात्रों पर लागू होगी। इस समय मणिपुर में ज्यादातर अभिभावक अपने बच्चों को दसवीं की परीक्षा पास करने पर इनाम के तौर पर दोपहिया वाहन खरीद देते हैं। मौजूदा कानूनों के तहत राज्य में किसी भी व्यक्ति को 18 वर्ष की उम्र के पहले डा्रइविंग लाइसेंस नहीं दिया जा सकता । लेकिन मणिपुर में छात्रों को इस नियम से छूट दी गई है। संगठन ने कहा है कि इस पाबंदी को असरदार तरीके से लागू करने के लिए समुचित कदम उठाए जाएंगे। उसने परिवहन अधिकारियों से भी छात्रों को ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने के मामले में नियमों का कड़ाई से पालन करने की अपील की है।
इससे पहले वर्ष 2000 में मणिपुर के लगभग 32 उग्रवादी संगठनों ने राज्य में हिंदी फिल्मों व संगीत पर भी पाबंदी लगा दी थी। यह पाबंदी आज तक लागू है। इस मामले में रिवोल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट यानी आरपीएफ ने सबसे अहम भूनमिका निभाई थी। संगठन की दलील थी कि हिंदी फिल्मों का राज्य की संस्कृति पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। यह संगठन पहले राज्य मे नशीली दवाओं के विक्रेताओं और अश्लील फिल्मों का कारोबार करने वालों पर भी पाबंदी लगा चुका है। संगठन ने इस कारोबार से जुड़े कई लोगों की गोली मार कर हत्या कर दी है। इलाके के एक अन्य. प्रमुख संगठन यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट यानी यूएनएलएफ ने भी इन पाबंदियों का समर्थन किया है। इन संगठनों ने राज्य में शराबखोरी पर भी पूरी पाबंदी लगा दी है।
वैसे, मणिपुर सरकार भी पाबंदियों के मामले में किसी से पीछे नहीं है। सरकार ने बीते सप्ताह एक सर्कुलर जारी कर सरकारी भवनों में किसी सरकार-विरोधी कार्यक्रम के आयोजन पर पाबंदी लगा दी थी। सरकार की दलील है कि किसी सरकारी भवन का इस्तेमाल सरकार-विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता। राज्य के मुख्य सचिव जरनैल सिंह की ओर से जारी इस सर्कुलर में कहा गया है कि सरकारी इमारतें सरकारी कामकाज के लिए ही इस्तेमाल की जा सकती हैं। इनका इस्तेमाल सरकार विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता। कुछ गैसरकारी संगठनों ने आईरोम शर्मिला की भूख हड़ताल के छह साल पूरे होने के मौके पर एक सेमिनार के आयोजन के लिए सरकारी भवन के इस्तेमाल की अनुमति मांगी थी। उसके बाद ही सरकार ने उक्त फैसला किया।
राज्य के विपक्षी राजनीतिक दलों ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया है। मणिपुर पीपुल्स पार्टी यानी एमपीपी के प्रवक्ता जी. जयकुमार शर्मा ने इस फैसले को मणिपुर सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम से भी ज्यादा खतरनाक करार दिया है। वे कहते हैं कि उक्त अध्यादेश के जरिए सरकार आम लोगों की आवाज दबाने का प्रयास कर रही है। मणिपुर भाजपा के अध्यक्ष एच., बोरोबाबू इस फैसले को जनविरोधी करार देते हैं।
मामला यहीं तक सीमित नहीं है। अभी बीते सप्ताह ही पीपुल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी आफ कांग्लीपाक नामक एक उग्रवादी संगठन ने स्थानीय आदिवासियों में गर्भ निरोधक उपायों पर पाबंदी लगा दी थी। उसकी दलील थी कि बाहरी लोगों की तादाद बढ़ने के कारण स्थानीय लोगों के वजूद पर खतरा पैदा हो गया है। वे अपने ही घर में अल्पसंख्यक बनते जा रहे हैं।
और जहां तक दोपहिया वाहनों पर पाबंदी का सवाल है, मणिपुर विश्वविद्यालय में एमए अंग्रेजी के छात्र अजमल सिंह कहते हैं कि यह गैरकानूनी है। छात्र अपनी कक्षा में आने के लिए किस वाहन का इस्तेमाल करेग, यह सिर्फ वही तय कर सकता है, कोई छात्र संगठन नहीं। मणिपुर के मुख्यमंत्री ईबोबी सिंह छात्र संगठन के इस फैसले के प्रति अनभिज्ञता जताते हैं। लेकिन राज्य में समय-समय पर विभिन्न संगठनों और सरकार की ओर से जारी होने वाली पांबदियों का समर्थन करते हैं। वे कहते है कि राज्य की परंपरा और संस्कृति के हित में ही ऐसा किया जा रहा है। जहां तक उग्रवाद या इस पर काबू पाने की बात है, यह एक अलग मुद्दा है। और इस पर सरकार अकेले कोई फैसला नहीं कर सकती। मुख्यमंत्री के इस बयान से साफ है कि राज्य के लोगों को आगे भी कई और पाबंदियां झेलनी पड़ सकती हैं।

Wednesday, August 5, 2009

हिन्दुस्तान में पुरवाई


सुबह-सबेरे लखनऊ से अंबरीश जी (जनसत्ता) का पहले मेल आया और फिर फोन. उन्होंने बताया कि रवीश जी ने हिन्दुस्तान में आपके ब्लॉग के बारे में बहुत बढ़िया और विस्तार से लिखा है. सुन कर चौंका. मेरा चौंकना स्वाभाविक था.अभी ब्लॉग लिखते तीन महीने भी पूरे नहीं हुए हैं.इसबीच, रायपुर से छपने वाले दैनिक हरिभूमि में तो चार-पांच बार मेरे ब्लॉग के हवाले सिंगल कालम की रिपोर्ट्स छपी थीं. लेकिन ब्लॉग का ऐसा चित्रण पहली बार देखा.बाद में कुछ और मित्रों और परिचितों ने इसके लिए बधाई दी.अब कोलकाता में हिन्दुस्तान नहीं आता. इसलिए ई-पेपर से ही संतोष करना पड़ा.इसके लिए मैंने एक बार फिर तकनीक को बधाई दी. पहले का वह दौर याद आ गया जब रचनाएं कहीं छपने और उसे देखने के बीच हफ्तों और कई बार महीनों गुजर जाता था.
मैं रवीश जी का आभारी हूं जिन्होंने इस कदर चित्रण कर मुझे अपने ब्लॉग पर और मेहनत करने की ऊर्जा और प्रेरणा दी है. इसके बाद अब पूरब की इस खिड़की पुरवाई का कैनवास कुछ बढ़ाते हुए इसमें विविध और बहुरंगी चीजें समेटने का प्रयास करूंगा. वैसे,रवीश जी की समीक्षा तो बहुतों ने पढ़ी है. फिर भी मैं उसे पीडीएफ के तौर पर यहां डाल रहा हूं. ताकि सनद रहे.

Monday, August 3, 2009

खामोश हुई माकपा की बागी आवाज


माकपा के वरिष्ठ नेता और परिवहन मंत्री सुभाष चक्रवर्ती के निधन के साथ ही माकपा की एक बागी आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई है। सुभाष को पार्टी की सुधारवादी पीढ़ी का अगुआ माना जाता है। अपनी विवादास्पद टिप्पणियों के लिए मशहूर इस नेता ने हमेशा कार्ल मार्क्स के उन सिद्धांतों के खिलाफ आवाज उठाई जो मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में काफी हद तक अप्रासंगिक हो चुके थे। वह चाहे केंद्र की पिछली यूपीए सरकार में शामिल होने का मुद्दा हो, खेती की जमीन के अधिग्रहण का सवाल हो या फिर तारापीठ मंदिर में पूजा-पाठ पर उठा बवाल हो-सुभाष अपनी खरी टिप्पणियों से हमेशा पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से दो-दो हाथ करने के मूड में नजर आए।
माकपा में वे पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु को अपना राजनीतिक गुरू मानते थे। बसु के वरदहस्त की वजह से ही माकपा और उसकी अगुवाई वाली राज्य सरकार में रहते हुए उसकी गलत नीतियों के खिलाफ लगातार आवाज उठाने के बावजूद उनके खिलाफ कभी कोई कार्रवाई नहीं हुई थी। वर्ष 2006 में हुए बीते विधानसभा चुनाव के मौके पर माकपा नेताओं का एक बड़ा धड़ा उनको टिकट दिए जाने के खिलाफ था। बावजूद इसके अंतिम मौके पर उनको टिकट मिल गया। चक्रवर्ती ने बसु से अपनी नजदीकी और उनके प्रति निष्ठा को कबी छिपाने की कोई कोशिश नहीं की। हकीकत यही है कि अपने बागी तेवरों और खरी टिप्पणियों के चलते कई बार खुद अपने और पार्टी के लिए मुसीबत व विवाद पैदा करने वाले सुभाष बसु के अलावा पार्टी के किसी नेता को कोई तरजीह नहीं देते थे। सुभाष का अपने इलाके में व्यापक जनाधार था। वे इलाके के तमाम क्लबों के अलावा कम से कम 120 दुर्गापूजा समितियों के भी संरक्षक थे। इसी जनाधार की वजह से वे लगातार चुनाव जीतते रहे।
कार्ल मार्क्स ने भले कहा हो कि धर्म लोगों के लिए अफीम के समान है, सुभाष का इस पर कोई भरोसा नहीं था। यही वजह है कि उनके तारापीठ जा कर पूजा-अर्चना करने पर जब पार्टी में बवाल मचा तो उन्होंने साफ कहा कि वे पहले हिंदू हैं, उसके बाद ब्राह्मण और फिर वामपंथी। प्रदेश समिति से पोलित ब्यूरो तक गूंजने के बावजूद इस मामले में सुभाष के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसी साल लोकसभा चुनाव के मौके पर एक निजी टीवी चैनल से बातचीत में उन्होंने कह दिया था कि साम्राज्यवाद से लड़ने के लिए कांग्रेस का साथ जरूरी है और माकपा को वर्ष 2004 में केंद्र की यूपीए सरकार में शामिल होना चाहिए था। उनकी इस टिप्पणी पर भी काफी बवाल मचा और माकपा के प्रदेश सचिव विमान बसु को एक बयान जारी कर सफाई देनी पड़ी कि यह सुभाष के निजी विचार हैं और माकपा की विचारधारा से इसका कोई लेना-देना नहीं है।
सुभाष चक्रवर्ती उद्योगों के लिए जमीन के अधिग्रहण के खिलाफ भी मुखर रहे। इसी तरह उन्होंने नंदीग्राम में पुलिस की फायरिंग और उसके आठ महीने बाद माकपा काडरों की ओर से इलाके के पुनर्दखल के खिलाफ भी खुल कर आवाज उठाई थी। इससे पहले वे क्रिकेट एसोसिएशन आफ बंगाल (सीएबी) के चुनाव में मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य से भी दो-दो हाथ कर चुके थे। मुख्यमंत्री ने तब सीएबी अध्यक्ष पद के लिए कोलकाता के तत्कालीन पुलिस आयुक्त प्रसून मुखर्जी के लिए मैदान में उतारा था। लेकिन सुभाष ने इस फैसले की सरेआम आलोचना करते हुए उनके प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार जगमोहन डालमिया का समर्थन किया था। उस चुनाव में डालमिया ही जीते थे।
बीते साल केंद्र सरकार से समर्थन वापस लेने और उसी मुद्दे पर लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकालने के मुद्दे पर असंतोष और नाराजगी तो बंगाल के तमाम कामरेडों में थी। लेकिन इस नाराजगी को स्वर देने की हिम्मत दिखाई सिर्फ सुभाष ने। उन्होंने इसके लिए सरेआम पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को जिम्मेवार ठहराया। सुभाष चक्रवर्ती पार्टी फंड में चंदा जुटाने और रैलियों में भीड़ जुटाने में भी माहिर थे। कोई 23 साल पहले कोलकाता में होप 86 नामक सांस्कृतिक कार्यक्रम के बैनर तले फिल्मी सितारों को नचा कर भी उन्होंने काफी सुर्खियां और विवाद बटोरे थे।
सुभाष के राजनीतिक कैरियर की शुरूआत से ही ऐसे न जाने कितने ही प्रसंग उनसे जुड़े हैं जब किसी गलत काम या नीतिगत गलतियों के लिए उन्होंने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को सरेआम कटघरे में खड़ा कर दिया। अब उनके निधन से माकपा की बागी आवाज खामोश हो गई है। माकपा में अब सुभाष चक्रवर्ती जैसा दूसरा कोई नेता नहीं बचा है जो गलत फैसलों पर उंगली उठाने का नैतिक साहस दिखाए। ऐसे में सुभाष की मौत किसी वामपंथी नेता की नहीं बल्कि एक विचारधारा की मौत कही जा सकती है।

Sunday, August 2, 2009

अब दागी कामरेडों से पल्ला झाड़ेगी माकपा

लोकसभा चुनावों में दुर्गति और उसके बाद राज्य में जारी राजनीतिक हिंसा के सवाल पर केंद्र से कई बार डांट खाने के बाद अब पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा सरकार की सबसे बड़ी घटक माकपा ने पार्टी के दागी और भ्रष्ट कामरेडों से पल्ला झाड़ने की तैयारी कर ली है। रविवार को खत्म हुई माकपा राज्य समिति की दो-दिनी बैठक में पार्टी नेतृत्व ने सरकार के कामकाज में गति लाने के लिए मंत्रियों के विभागों में पेरबदल का भी फैसला किया है। इसके तहत उन मंत्रियों से कुछ विभाग लेकर दूसरों को सौंप दिए जाएंगे जिनके पास एक से ज्यादा विभागों का जिम्मा है। ध्यान रहे कि केंद्रीय गृह मंत्री पी.चिदंबरम राज्य के कई जिलों के कत्लगाह में तब्दील हो जाने का गंभीर आरोप लगा चुके हैं। इससे माकपा के शीर्ष नेतृत्व में तिलमिलाहट है। इन नेताओं ने पलटवार करते हुए इसके लिए कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस को दोषी ठहराया है।
लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद पहली बार पार्टी ने कबूल किया था कि दागी और भ्रष्ट कामरेडों की तादाद बढ़ी है और इनको पार्टी से निकालना जरूरी है। पार्टी नेतृत्व का मानना था कि ऐसे दागी नेताओं के चलते ही आम लोगों से माकपा की दूरी बढ़ी है और इसी वजह से लोकसभा चुनाव में पार्टी को मुंहकी खानी पड़ी है। बैठक में नेताओं ने माना कि लंबे अरसे तक लगातार सत्ता में रहने के कारण पार्टी आम लोगों से कट गई है। नेताओं ने पार्टी की संगठनात्मक खामियों को दूर कर आम लोगों से सीधा संवाद कायम करने की जरूरत पर जोर दिया। बैठक में इस बात पर आम राय रही कि पार्टी को भ्रष्ट व दागी कामरेडों से जल्दी से जल्दी छुटकारा पा लेना चाहिए। इसमें मंत्रिमंडल में फेरबदल पर भी जोर दिया गया। राज्य समिति की बैठक में मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की औद्योगिकीकरण की मुहिम को आड़े हाथों लेते हुए कहा गया कि इसी वजह से बाकी योजनाएं हाशिए पर चली गईं और पार्टी को इसका खमियाजा चुनावों में भुगतना पड़ा।
माकपा सूत्रों ने बताया कि बैठक में विभिन्न जिलों में आने वाली उन रिपोर्टों पर विस्तार से चर्चा की गई जिनमें कहा गया है कि कुछ भ्रष्ट नेताओं के अधिकारों के दुरुपयोग से नाराज होकर बेहतर छवि वाले कुछ नेताओं ने भी पार्टी से नाता तोड़ लिया है और विपक्ष के साथ हो गए हैं। बैठक में तय हुआ कि अब निजी हितों के लिए सत्ता और अधिकारों का दुरुयोग करने वाले नेताओं से छुटकारा पाना जरूरी है। पार्टी के प्रदेश सचिव विमान बसु ने तमाम जिलों से आए नेताओं से ऐसे दागी नेताओं की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। राज्य के विभिन्न जिलों में पार्टी के कुछ नेता रियल इस्टेट के धंधे में शामिल हैं तो कई नेता कुछ सरकारी अधिकारियों के साथ मिलीभगत से शिक्षा के धंधे में सक्रिय हो गए हैं।
माकपा नेताओं का कहना है कि पूरी सरकार के औद्योगिकीकरण में जुट जाने की वजह से विभिन्न मंत्रालयों का काम ठप हो गया है और गरीब व पिछड़े तबके के लोगों के लिए चलाई जाने वाली कई कल्याण योजनाएं प्रभावित हुई हैं। इसलिए अब जल्दी ही मंत्रियों के विभागों में फेरबदल की संभावना है। पार्टी नेताओं का कहना है कि एक मंत्री के पास एक से ज्यादा मंत्रालय होने की वजह से उन पर ठीक से ध्यान देना संभव नहीं हो रहा है। खासकर पंचायत और पुलिस विभाग का कामकाज काफी सुस्त है। आगोमी विधानसभा चुनावों से पहले इनको और सक्रिय किया जाना चाहिए। कामरेडों में माओवादी प्रभावित इलाकों में माकपा नेताओं और काडरों की सुरक्षा में नाकामी के लिए भी पुलिस विभाग के प्रति भारी नाराजगी है। यह विभाग मुख्यमंत्री के ही जिम्मे है।
पार्टी ने सरकार से एक ठोस तंत्र विकसित करने को कहा है कि ताकि कल्याण योजनाओं का फायदा जमीनी स्तर पर आम लोगों तक पहुंच सके। राज्य समिति ने माना है कि दागी कामरेडों से छुटकारा नहीं मिलने और आम लोगों से सीधा संवाद दोबारा बहाल नहीं होने की स्थिति में पार्टी की आगे की राह आसान नहीं होगी।