Tuesday, August 18, 2009

बुद्धदेव सरकार के लिए नासूर बन गया है लालगढ़

पश्चिम मेदिनीपुर जिले का माओवाद प्रभावित लालगढ़ बुद्धदेव भट्टाचार्य की अगुवाई वाली राज्य की वाममोर्चा सरकार के लिए धीरे-धीरे एक ऐसे नासूर में बदल गया है जो अक्सर टीसता रहता है। दो महीने से जारी लालगढ़ अभियान के बावजूद सुरक्षा बलों को वहां खास कामयाबी नहीं मिल सकी है। मजबूरन बीते हफ्ते सरकार ने भी मान लिया कि इस अभियान को कामयाबी नहीं मिल सकी है। मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए जहां केंद्र से पड़ोसी झारखंड में भी लालगढ़ की तर्ज पर माओवादियों के खिलाफ अभियान चलाने की मांग की है, वहीं वाममोर्चा के दूसरे घटक दल इस समस्या के लिए सरकार और माकपा की छीछालेदर कर रहे हैं।
लालगढ़ में बीते दो महीने से केंद्रीय सुरक्षा बलों और राज्य पुलिस का अभियान जारी रहने के बावजूद इलाके में माओवाद की समस्या सुलझने की बजाय और उलझती ही जा रही है। अब तक न तो कोई बड़ा नेता पुलिस की पकड़ में आया है और न ही इलाके में सामान्य स्थिति बहाल हो सकी है। इसलिए सरकार अब माओवादियों से निपटने के लिए रणनीति बदलने पर विचार कर रही है। इसी कवायद के तहत मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने बीते दिनों अपने मेदिनीपुर दौरे के दौरान पुलिस व प्रशासन के तमाम आला अधिकारियों के साथ बैठक में भावी रणनीति पर विचार किया। लेकिन अब तक नई रणनीति पर अमल नहीं शुरू हो सका है। उससे पहले ही सोमवार को लालगढ़ एक बार फिर अशांत हो गया। वहां माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच घंटों हुई गोलाबारी में पुलिस का एक जवान घायल हो गया। वैसे, सरकार इससे पहले ही मान चुकी है कि लालगढ़ अभियान कामयाब नहीं रहा है। इलाके में माकना नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्याओं का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। इलाके में विकास के काम ठप हैं। इससे लोगों की नाराजगी और बढ़ रही है। सरकार की मुश्किल यह है कि हालात सामान्य हुए बिना इलाके में विकास परियोजनाएं शुरू नहीं हो सकती।
राज्य सरकार का असली संकट है केंद्रीय बलों की मौजूदगी। गृह सचिव अर्द्धेंदु सेन मानते हैं कि केंद्रीय बल हमेशा के लिए लालगढ़ में नहीं रह सकते। राज्य सरकार ने केंद्र से उनको कम से कम और तीन महीने तक लालगढ़ में तैनात करने की गुहार की है। लेकिन मौजूदा हालात को ध्यान में रखते हुए तीन महीनों में भी समस्या के सुलझने के आसार कम ही हैं। सरकार को इस बात की चिंता खाए जा रही है कि जब केंद्रीय बलों के रहते यह स्थिति है तो उनके लौट जाने पर क्या होगा।
दूसरी ओर, वाममोर्चा की बैठक में सरकार व माकपा को सहयोगी दलों की आलोचना से जूझना पड़ रहा है। बीते सप्ताह हुई बैठक में घटक दलों ने सरकार से इस मुद्दे पर सफाई मांगते हुए कहा कि वह लालगढ़ अभियान की नाकामी की वजह बताए। आरएसपी और फारवर्ड ब्लाक ने इससे पहले माओवादियों पर पाबंदी लगाने का विरोध करते हुए इस मुद्दे को राजनीतिक तौर पर हल करने की वकालत की थी। फारवर्ड ब्लाक के एक नेता कहते हैं कि हमने सरकार से लालगढ़ अभियान की प्रगति रिपोर्ट मांगी है। भारी तादाद में सुरक्षा बलों की मौजूदगी के बावजूद हत्याओं और अपहरण का सिलसिला थम नहीं रहा है। यह गहरी चिंता का विषय है। हम सरकार से जानना चाहते हैं कि वह माओवादियों से निपटने के लिए क्या रणनीति अपना रही है।
घटक दलों ने इस मामले पर मुख्यमंत्री के बयान की मांग की। मुख्यमंत्री उस बैठक में मौजूद नहीं थे। इसलिए अब इसी हफ्ते मोर्चा की बैठक दोबारा बुलाई जाएगी। उसमें बुद्धदेव भी मौजूद रहेंगे।
यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि लालगढ़ की समस्या अब धीरे-धीरे नासूर बनती जा रही है। यह लंबे अरसे तक जब-तब रिसता ही रहेगा। किसी ठोस रणनीति के अभाव में सुरक्षा बल अंधेरे में ही ही तीर चला रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में भी वहां हालात सामान्य होने की उम्मीद कम ही है। जनसत्ता से

खूबसूरती और कंडोम !

गर्म निरोधक के तौर पर इस्तेमाल होने वाले कंडोम का भला खूबसूरती के क्या रिश्ता है? यह सवाल सुन कर कोई भी अचरज में पड़ सकता है। लेकिन इसका जवाब जानने के लिए आपको भारत के पड़ोसी पर्वतीय देश भूटान की राजधानी थिम्पू जाना होगा। भूटान की महिलाएं अपने चेहरे की खूबसूरती बढ़ाने और आंखों के नीचे के स्याह घेरे को मिटाने के लिए इन दिनों धड़ल्ले से कंडोम का इस्तेमाल कर रही हैं। यही नहीं, कपड़े बुनने के लिए धागों को नरम बनाने के लिए भी कंडोम का ही इस्तेमाल हो रहा है।
राजधानी में दवाइयों की दुकान चलाने वाली कर्मा देम ने बताया कि महिलाएं उनके पास कंडोम खरीदने आ रही हैं। वे कहती हैं कि इससे न केवल आँखों के नीचे के काले घेरे मिटते हैं, बल्कि गर्भवती महिलाओं के चेहरे के दाग भी हट जाते हैं।
एक अन्य दवा विक्रेता कहते हैं कि महिलाओं का कहना है कि कंडोम रूखी त्वचा को निखारने और झाइयों को दूर करने में काम आता है। महिला खरीददारों की संख्या में इजाफा हो रहा है। इसकी वजह उनका यह भरोसा है कि कंडोम कास्मेटिक के तौर पर भी फायदेमंद है।
लेकिन डाक्टर इस विचार से सहमत नहीं हैं। त्वचा रोग विशेषज्ञ पेमा रिंजिन कहती हैं कि कंडोम से त्वचा के कोमल होने के दावों में कोई दम नहीं है। उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो त्वचा में निखार लाए। कंडोम में उपयोग होने वाले लुब्रिकेंट सामान्य होते हैं। अगर उनका कास्मेटिक के तौर पर लाभ है तो उसे उसी तरह से बेचा जाना चाहिए।
एक अन्य चिकित्सक का कहना है कि शोध से पता चला है कि कंडोम लुब्रिकेंट में बेंजीन होता है, जो बहुत ज्यादा मात्रा में उपयोग करने पर हानिकारक साबित हो सकता है।
महिलाओं के अलावा भूटान के बुनकर भी कंडोम का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका दावा है कि यह धागों की सख्ती दूर करने में सहायक है। एक बुनकर का कहना है कि वह कंडोम को ठंड के दौरान उपयोग करता है। उस समय धागे बहुत सख्त हो जाते हैं और उनसे काम करना मुश्किल होता है।
सरकारी बुनाई केंद्र की एक कर्मचारी फुंतशो ने बताया कि उसने एक बार धागों पर कंडोम का उपयोग किया। उसने कहा कि वह आगे भी उसका उपयोग कर सकती है, अगर कोई उसे कंडोम ला दे तो। वह कहती है कि मैं बाहर जाकर उसे खरीद नहीं सकती। मैं दवा विक्रेता को कैसे बताउँगी कि मुझे उसका क्या उपयोग करना है,कोई मेरा विश्वास नहीं करेगा। कंडोम के लुब्रिकेंट को लूम पर लगाया जाता है ताकि धागे उस पर आसानी से चल सकें।

Monday, August 17, 2009

मंदी की मार से बेहाल हैं पूजा समितियां

आर्थिक मंदी और जरूरी वस्तुओँ की आसमान छूती कीमतों ने पश्चिम बंगाल के सबसे बड़े त्योहार दुर्गापूजा के आयोजकों को मुश्किल में डाल दिया है। इस बार पूजा के लिए वसूली जाने वाली चंदे की रकम में गिरावट का अंदेशा तो है ही, प्रायजकों का भी टोटा पड़ रहा है। आयोजन समितियों का कहना है कि प्रायोजकों ने मंदी के चलते अपने बजट में भारी कटौती कर दी है। इसका असर आयोजन पर पड़ना लाजिमी है।
एक पूजा समिति के सदस्य देवाशीष पाल बताते हैं कि पूजा को अब महज पांच सप्ताह बचे हैं। लेकिन हमें अब तक ढंग का प्रायोजक नहीं मिला है। जिन प्रायोजकों से अभी तक बात हुई है उन्होंने इस बार काफी कम धन खर्च करने का प्रस्ताव दिया है। उल्लेखनीय है कि दुर्गा पूजा आयोजन समितियों को चंदे के अलावा पंडालों के आस पास होर्डिग बैनर तथा स्टालों के लिए प्रायोजकों पर निर्भर रहना पड़ता है। कई पूजा आयोजकों ने बताया अबकी दुर्गा पूजा आयोजन के लिए उनको चंदे में गिरावट का अंदेशा है। मंदी के लंबे दौर की वजह से कुम्हारटोली के मूर्तिकार भी आशंकित हैं कि इस साल उनको अपनी बनाई मूर्तियों के ठीक-ठाक दाम नहीं मिलेंगे। कुम्हारटोली शिल्पी संगठन के सचिव बाबुल पाल ने बताया कि इस बार छोटी मूर्तियों के लिये अधिक आर्डर मिल रहे हैं।
एक मूर्तिकार रमेश प्रमाणिक बताते हैं कि मूर्ति निर्माण के लिये जरूरी मिट्टी के अलावा, धान की भूसी, रस्सी, जूट, लकड़ी और सजावटी सामानों और रंग की कीमतों में बीते साल के मुकाबले लगभग 25 फीसदी बढ़ोतरी हुई है। लेकिन बजट में कटौती के चलते पूजा आयोजक मूर्तियों की अधिक कीमत देने को तैयार नहीं हैं।
जयपुर के हवा महल की तर्ज पर पंडाल बना रहे कालेज स्क्वायर के आयोजकों ने बजट के बारे में कोई भी खुलासा करने से मना कर दिया। बीते साल उनका बजट 25 लाख का था। समितियों का कहना है कि अबकी दुर्गा पूजा पर मंदी का असर साफ नजर आएगा। पंडाल का आकार तो घटेगा ही, इनकी साज-सज्जा पर होने वाले खर्च में भी भारी कटौती होगी। ध्यान रहे कि महानगर में दर्जनों ऐसे आयोजन होते हैं जिनका बजट पहले 50 लाख से एक करोड़ के बीच होता था। अकेले बिजली की सजावट पर ही लाखों रुपए खर्च किए जाते थे। कई आयोजन समितियों ने बीते साल के मुकाबले अपना बजट आधा कर दिया है।

Sunday, August 16, 2009

बंगाल से आईएएस अफसरों का पलायन

एक बहुत पुरानी कहावत है कि बुरे वक्त में परछाई भी साथ छोड़ देती है। माकपा की अगुवाई वाली वाममोर्चा सरकार को शायद अब इस कहावत का अर्थ समझ में आ रहा है। बीते लोकसभा चुनाव में वाममोर्चा की किस्मत क्या बिगड़ी, राज्य के आईएएस अफसरों में डेपुटेशन पर केंद्र में जाने की होड़ मच गई है। जिन अफसरों के सहारे बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार ने राज्य में औद्योगिकीकरण की जोरदार मुहिम शुरू की थी, अब वे भी एक-एक कर बंगाल को लाल सलाम करने लगे हैं। दो महीने बाद भी यह सिलसिला थमता नहीं नजर आ रहा है। बीते कुछ हफ्तों के दौरान राज्य के कई काबिल आईएएस अफसरों के केंद्र की सेवा में जाने की वजह से प्रशासन तेजी से पंगु होता जा रहा है। बीते सप्ताह भी दो अफसर दिल्ली चले गए। अभी कोई एक दर्जन अफसर केंद्र में जाने के लिए हरी झंडी मिलने का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे अफसरों की लगातार लंबी होती सूची ने राज्य सरकार के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी कर दी हैं। इन अफसरों की दलील है कि दिल्ली में कामकाज के बेहतर मौके तो हैं ही, वहीं राजनीतिक हस्तक्षेप भी बहुत कम है।
ताजा मामला दो अफसरों का है। 1984 बैच के आईएएस अफसर आर.डी.मीना दिल्ली में बंगाल के अतिरिक्त आवासीय आयुक्त बनाए गए हैं। इसी तरह स्वास्थ्य विभाग में परियोजना निदेशक रहे अनूप अग्रवाल के केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री शिशिर अधिकारी का निजी सचिव बनने की चर्चा है। इससे पहले बंगाल काडर के तीन अफसर वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के साथ जुड़ गए थे। तृणमूल कांग्रेस के मंत्री भी राज्य के आईएएस अफसरों को अपने साथ रखना चाहते हैं। कुछ अफसरों ने अपने गृह राज्य में तैनाती का आवेदन दे रखा है तो कुछ अध्ययन अवकाश पर जाना चाहते हैं।
बीते कुछ हफ्तों के दौरान जिन अफसरों ने केंद्र सरकार के तहत विभिन्न स्थानों पर तैनाती ली है उनमें राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव सुनील मित्र, वस्त्र आयुक्त मनोज पंत, विशेष सचिव (उद्योग) एस.किशोर, कोलकाता मेट्रोपोलिटन डेवलपमेंट अथारिटी (केएमडीए) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पी.आर.वाभिष्कर व शहरी विकास मंत्रालय में प्रमुख सचिव पी.के.प्रधान जैसे लोग शामिल हैं। वाणिज्य कर आयुक्त एच.के. द्विवेदी (1988) को राज्य का नया मुख्य चुनाव अधिकारी बनाए जाने की चर्चा है। इस पर पर रहे देवाशीष सेन को पश्चिम बंगाल बिजली विकास निगम का प्रबंध निदेशक बनाया गया है।
एख आईएएस अफसर कहते हैं कि इस राज्य में काम करना बेहद चुनौतीपूर्ण है। प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी को भी पांच हजार रुपए खर्च करने के लिए ऊपर से मंजूरी लेनी पड़ती है। ऊपर से हर काम में राजनीतिक हस्तक्षेप होता है। एक अन्य अधिकारी कहते हैं कि हर आईएएस अधिकारी केंद्र में काम करना चाहता है। किसी भी काडर का अधिकारी कुछ साल तक राज्य सरकार के साथ काम करने के बाद केंद्र में जाना चाहता है। अबकी अगर आईएएस अफसरों का पलायन एक मुद्दा बन गया है तो इसकी वजह यह है कि सरकार के करीबी समझे जाने वाले अधिकारी भी बाहर जाने के लिए बेताब हैं।
यहां हालात ऐसे बन गए हैं कि दिल्ली में केंद्र सरकार के साथ डेपुटेशन की अवधि पूरी कर लेने वाले कम से कम दो अधिकारी राज्य में नहीं लौटना चाहते। इनमें से एक ने तो दो साल के अध्ययन अवकाश का आवेदन दे रखा है ताकि बंगाल नहीं लौटना पड़े।
फिलहार राज्य सरकार ने एक-एक अफसरों को दो-दो-तीन-तीन विभागों का जिम्मा सौंप रखा है। लेकिन इससे समस्या और जटिल हो रही है। अफसरों के पलायन से सरकार की हरी झंडी का इंतजार कर रहीं विभिन्न परियोजनाएं लटक गई हैं। अब भी लगभग एक दर्जन अधिकारी किसी तरह केंद्र में जाने के जुगाड़ में हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में इस समस्या के और गंभीर होने का अंदेशा है।

Wednesday, August 12, 2009

अब गांधी से दो-दो हाथ कर रहे हैं वामपंथी


पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा के सबसे बड़ी घटक माकपा ने राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी के खिलाफ लगता है अंतिम मोर्चा खोल दिया है। वैसे, तो गांधी के कार्यकाल के दौरान माकपा से उनका छत्तीस का ही आंकड़ा रहा है। लेकिन अब उनके कार्यकाल के आखिरी दौर में माकपा ने उन पर अपनी संवैधानिक जिम्मेवारियों के निर्वाह में तटस्थ नहीं रहने का आरोप लगाते हुए उन पर हमले तेज कर दिए हैं। यह हमला इतना तीखा था कि राज्यपाल को मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य और माकपा के प्रदेश सचिव विमान बसु, जो वाममोर्चा के अध्यक्ष भी हैं, को बाकायदा पत्र लिख कर यह सफाई देनी पड़ी कि उन्होंने अपने कामकाज में हमेशा तटस्थता बरती है। बावजूद उसके माकपा सोची-समझी रणनीति के तहत गांधी पर हमले का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। माकपा के बाद अब वाममोर्चा में उसकी सहयोगी भाकपा भी हमलावर मूड में आ गई है। भाकपा महासचिव ए.बी. वर्द्धन ने भी राज्यपाल को राजनीतिक हिंसा की पूरी जानकारी लेने के बाद ही कोई टिप्पणी करने की नसीहत दे डाली।
दरअसल, विधानसभा में विपक्ष के नेता पार्थ चटर्जी की अगुवाई में एक प्रतिनिधिमंडल ने बीते सप्ताह राज्यपाल से मिल कर राजनीतिक हिंसा रोकने पर उनसे हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया था। उन्होंने राज्यपाल को बताया था कि राज्य में हिंसा पर अंकुश लगाने के लिए केंद्रीय हस्तक्षेप जरूरी है। उसी दिन वाममोर्चा विधायकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने भी राज्यपाल से मिल कर राज्य में हिंसा फैलाने के लिए तृणमूल सांसदों व केंद्रीय मंत्रियों की ओर से भड़काऊ बयान देने की शिकायत की। प्रतिनिधि मंडल ने राजनीतिक हिंसा के लिए विपक्षी दलों को जिम्मेवार ठहराया था। उसके बाद ही राज्यपाल ने एक बयान जारी राजनीतिक हिंसा पर चिंता जताई थी और इसे रोकने के लिए राजनीतिक दलों की चुप्पी का भी जिक्र किया था। उसके बाद पहले वाममोर्चा की ओर से एक बयान जारी कर राज्यपाल पर पक्षपात करने का आरोप लगाया गया और बाद में माकपा राज्य समिति के सदस्य श्यामल चक्रवर्ती ने सार्वजनिक तौर पर राज्यपाल की आलोचना की।
माकपा ने गांधी के बयान को एकतरफा व पक्षपातपूर्ण करार दिया है। उसने मंगलकोट में हिंसा और लाठीचार्ज के लिए तृणमूल को जिम्मेदार ठहराया है। माकपा के राज्य सचिव विमान बसु ने आरोप लगाया है कि तृणमूल कांग्रेस सुनियोजित तरीके से राज्य में हिंसा फैला रही है। मंगलकोट में बाहरी लोगों को ले जाकर पुलिस पर हमला किया गया। इस पर टिप्पणी करते हुए तृणमूल कांग्रेस के पार्थ चटर्जी ने कहा कि सच्चाई से लोगों का ध्यान हटाने के लिए ही माकपा नेता राज्यपाल के खिलाफ बेसिर-पैर के आरोप लगा रहे हैं।
रविवार को माकपा राज्य कमेटी के सदस्य व सीटू के वरिष्ठ नेता श्यामल चक्रवर्ती ने राज्यपाल पर हमला बोला। उनका कहना था कि राजनीतिक हिंसा पर राज्यपाल हमें तो बहुत उपदेश देते हैं, लेकिन वे तृणमूल कांग्रेस की ओर से फैलाई जा रही हिंसा पर चुप्पी साध लेते हैं। चक्रवर्ती ने गांधी के रवैए को अनुचित करार दिया। नंदीग्राम से लेकर अब तक के गांधी के बयानों का हवाला देते हुए माकपा नेता ने कहा कि उनका रवैया हमेशा पक्षपातपूर्ण रहा है। वे वाम मोर्चा और माकपा को ही कठघरे में खड़ा करने में लगे हैं।
इन हमलों के बाद राज्यपाल ने मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य और माकपा के राज्य सचिव विमान बसु को पत्र भेज कर साफ किया है कि संवैधानिक पद का निर्वाह तटस्थ रह कर ही किया जाता है। वे निष्पक्ष होकर ही अपनी संवैधानिक जिम्मेवारी निभा रहे हैं। इसबीच, पार्टी के एक कार्यक्रम में शिरकत करने कोलकाता आए भाकपा महासचिव ए.बी. वर्द्धन ने कहा कि राज्यपाल को राज्य में जारी राजनीतिक हिंसा की विस्तृत जानकारी हासिल करने के बाद ही कोई बयान जारी करना चाहिए। उनको कम से कम यह तो पता करना ही चाहिए कि हिंसा के लिए कौन जिम्मेवार है। उन्होंने कहा कि वाममोर्चा के प्रतिनिधिमंडल ने पहले ही राज्यपाल को बताया था कि तृणमूल नेता व कुछ केंद्रीय मंत्री के भड़काऊ बयानों से तनाव फैल रहा है। लेकिन गांधी ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की। वर्द्धन ने कहा कि राज्यपाल ने जिस तरह पक्षपातपूर्ण बयान जारी किया वह ठीक नहीं है।
यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि माकपा ने सोची-समझी रणनीति के तहत ही राज्यपाल पर हमले शुरू किए हैं। पार्टी यह साबित करने का प्रयास कर रही है कि विपक्ष की हिंसा को राज्यपाल का भी समर्थन हासिल है। ऐसे में यह सिलसिला अभी थमने के आसार कम ही हैं। जनसत्ता से

Sunday, August 9, 2009

ठहर-सा गया है कोलकाता


किसी जमाने में राजीव गांधी ने कलकत्ता को मरता हुआ शहर कहा था। तब उनकी इस टिप्पणी पर भद्रलोक कहे जाने वाले इस समाज ने काफी बवाल किया था। तब मरता हुआ था या नहीं, यह मुझे नहीं पता। मैं तब इस महानगर में आया ही नहीं था। लेकिन अब पंद्रह साल पुराने वाहनों को हटाने की मुहिम के तहत इस महीने की पहली तारीख से हजारों बसों, टैक्सियों और आटो रिक्शा यानी तिपहियों के सड़कों से गायब हो जाने से इस महानगर की रफ्तार जरूर थमक गई है। दक्षिण से उत्तर कोलकाता के बीच जमीन के नीचे चलने वाली मेट्रो रेल के विभिन्न स्टेशनों के बाहर अलग-अलग कालोनियों और मोहल्लों के लिए बने आटो स्टैंड अब सूने पड़े हैं। यात्री तो नहीं घटे, लेकिन सवारियां बेहद घट गई हैं। इनको देखते हुए एक पुराना गीत बरबस ही याद आता है---इस शहर में हर शख्स परेशान-सा क्यूं है....। पुराने बस मालिकों ने हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है। अदालत सोमवार 10 मई को इस पर विचार करेगी। पहले यह सुनवाई चार मई को होनी थी। लेकिन टल गई।
पहले इस लेख का शीर्षक दिया था-ठहर गया है मेरा शहर। फिर लगा कि कोलकाता मेरा शहर तो कभी रहा ही नहीं। इस तथ्य के बावजूद कि बीते नौ वर्षों से यहीं रहता हूं। दफ्तर से लौटते हुए दक्षिण कोलकाता के टालीगंज मेट्रो स्टेशन तक तो आसानी से पहुंच जाता हूं । लेकिन बीते नौ-दस दिनों से इससे कोई डेढ़ किमी दूर स्थित अपने फ्लैट तक पहुंचने के लिए बाकायदा जंग लड़नी पड़ रही है। पहले जिस रूट पर कई दर्जन आटो चलते थे, अब वहां दो ही बचे हैं। कई दिन तो यह दूरी पैदल ही तय करनी पड़ी। अब दफ्तर से थके-हारे लौटने के बाद कौन घंटों लाइन में खड़ा हो कर अपनी बारी का इंतजार करे। दरअसल, भीड़-भाड़ और ट्रैफिक जाम के चलते कोलकाता मुझे कभी उतना पसंद नहीं आया। सिलीगुड़ी में रहते हुए दफ्तर के कामकाज से साल में तीन-चार बार यहां आना होता था। उस समय धर्मतल्ला इलाके में राजभवन के ठीक सामने बने भारतीय जीवन बीमा निगम के गेस्ट हाउस में ठहरता था। वहां से सुबह-सबेरे जो दफ्तर जाता था तो रात दस बजे के बाद ही वापसी होती थी। दो-तीन दिन में काम निपटाने के बाद धर्मतल्ला से ही बस पकड़ कर सिलीगुड़ी लौट जाता था। तब कभी सोचा तक नहीं था कि मुझे इसी शहर में बसना होगा। आखिर नौ साल तक रहना एक तरह से बसना ही तो है। गुवाहाटी से तबादले पर आने के बाद मेट्रो को ध्यान में रखते हुए टालीगंज इलाके में मकान लिया था। दफ्तर के बाकी साथी दमदम यानी एकदम उत्तरी इलाके में रहते थे। मेट्रो ने कभी दूरी महसूस नहीं होने दी। लेकिन नौ साल की इस सहूलियत और सुख पर इन नौ दिनों का दुख (सवारी नहीं होने का) बहुत भारी पड़ रहा है।

बीते नौ दिनों से कोलकाता में लाखों लोगों को उमस और गर्मी के बीच बस अड्डों और टैक्सी स्टैंड पर लंबी-लंबी कतारों में खड़े रहना पड़ रहा है। इन सबको को उम्मीद है कि शहर की यातायात प्रणाली जल्द ठीक होगी।
पुलिस इस महीने की पहली तारीख से ही 1993 से पहले बने वाहनों को ज़ब्त कर रही है। कोलकाता हाई कोर्ट ने जुलाई 2008 में शहरी इलाक़ों में ऐसे व्यावसायिक वाहनों के चलाने पर रोक लगा दी थी जो एक जनवरी 1993 से पहले पंजीकृत किए गए हों। पहले यह पाबंदी बीते साल 31 दिसंबर से लागू होनी थी। लेकिन सरकार ने कुछ समय और मांगा था। उसके बाद यह समयसीमा बढ़ा कर 31 जुलाई 2009 कर दी गई थी.
कोलकाता की सेवियर एंड फ़्रेंड ऑफ़ इन्वायरमेंट( सेफ़) के सर्वेक्षण के मुताबिक इन वाहनों को ज़ब्त करने के बाद से शहर के पर्यावरण में सुधार हुआ है और पिछले दो दशकों में इतना पर्यावरण इतना स्वच्छ कभी नहीं रहा।
लेकिन पर्यावरण के साथ लोगों की दिक्कतों का ख्याल रखना भी तो जरूरी है। इस मामले में न तो पुराने वाहन मालिक चेते और न ही सरकार ने कोई ध्यान दिया। अब आग लगने पर कुंआ खोदने की कहावत चरितार्थ करते हुए सरकार ने चार सौ नई बसें उतारने का दावा किया है। लेकिन यह जरूरत के मुकाबले बहुत कम है।
मुझे तो अब इस दिक्कत से निजात पाने के लिए 23 अगस्त का इंतजार है। इसकी वजह यह है कि उसी दिन टालीगंज से न्यू गड़िया के बीच मेट्रो की विस्तारित सेवा का उद्घाटन होना है। और मेरा फ्लैट इसी रूट में टालीगंज के बाद वाले स्टेशन से ही सटा है। तब तक तो मेट्रो से उतर कर घऱ पहुंचने के लिए रोज एक लड़ाई लड़नी होगी। यह तो मेरी बात हुई। लेकिन सब लोगों की किस्मत ऐसी कहां? सोचता हूं, और कुछ न सही मेट्रो के मामले में तो किस्मत का धनी हूं ही।

खेत ही बाड़ खाने पर उतारू है बंगाल में!

पश्चिम बंगाल में क्या खेत ही बाड़ को खाने पर उतारू है? बर्दवान जिले के मंगलकोट के पास शुक्रवार को पुलिस वालों ने जिस तरह तृणमूल कांग्रेस की रैली के लिए बने मंच पर चढ़ कर उसके नेताओं व कार्यकर्ताओं पर लाठियां बरसाईं उससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या यहां माकपा और प्रशासन मिल कर बुद्धदेव सरकार की कब्र खोदने पर तुले हैं। माकपा का प्रदेश नेतृत्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी की टिप्पणियों के लिए दो दिनों से लगातार उन पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए उनकी खिंचाई कर रहा है। बंगाल में मुख्य विपक्षी दल के मंच पर पुलिस के चढ़ कर लाठी भांजने की हाल के वर्षों में यह शायद पहली घटना है।
पश्चिम बंगाल में बर्दवान जिले का मंगलकोट कस्बा राजनीतिक हिंसा के सवाल पर नंदीग्राम बनने की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। मंगलकोट में बीते दो महीने से माकपा के एक नेता की हत्या के मुद्दे पर माकपा काडर आक्रामक मूड में हैं। राजनीतिक हिंसा के सवाल पर पार्टी का प्रदेश नेतृत्व तो इतने आक्रामक मूड में है कि उसने राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी से भी दो-दो हाथ करने का मन बना लिया है। लोकसभा चुनावों के बाद बंगाल में राजनीतिक हिंसा का जो दौर शुरू हुआ है वह कहीं से थमता नहीं नजर आ रहा है। मंगलकोट ने इस मामले में सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी हैं। इस मामले में उसने लालगढ़ को भी पीछे छोड़ दिया है।
मंगलकोट पर फिलहाल सरकार नहीं माकपा का राज है। कांग्रेस के कई विधायकों की बीते महीने वहां जम कर पिटाई हुई। उसके बाद कल मंगलकोट से काफी पहले तृणमूल कांग्रेस की एक रैली पर पुलिस ने जम कर लाठियां बरसाईं। तृणमूल वालों ने भी पुलिस पर पथराव किए। उसके बाद पुलिस के जवानों ने मंच पर चढ़ कर नेताओं की पिटाई की। अब पार्टी प्रमुख व रेल मंत्री ममता बनर्जी ने मंगलवार को मंगलकोट का दौरा करने का एलान किया है। इससे इलाके में उत्तेजना और बढ़ने का अंदेशा है।
इसबीच, राज्य में जारी राजनीतिक हिंसा पर राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी और माकपा में ठन गई है। गांधी ने एक बयान में सवाल उठाया था कि जब तमाम राजनीतिक दल हिंसा रोकने पर सहमत हैं तो आखिर इस पर अंकुश क्यों नहीं लग रहा है? उनका कहना था कि जो लोग कुछ करने की हालत में वे समुचित कदम नहीं उठा रहे हैं। राज्य सरकार से अवैध हथियारों की बिक्री रोकने और अपराधियों पर अंकुश लगाने का अनुरोध किया था। गांधी ने बंगाल में हिंसा जारी रहने पर गहरी चिंता जताई थी।
उन्होंने तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं से कहा था कि वे दलगत भावना से ऊपर उठ कर अपने-अपने संगठनों में हिंसक लोगों की पहचान करें और उन्हें कानून के हवाले करें।
गांधी ने अपने बयान में कहा था कि मुझे भरोसा है कि सरकार अवैध हथियारों के कारोबार को रोकने के लिए आगे आएगी। हिंसक लोगों पर नकेल लगाने के लिए तेजी के साथ कार्रवाई करेगी और लोगों में यह भरोसा पैदा करेगी कि उनकी सुरक्षा के साथ राजनीति नहीं जोड़ी जाएगी। राज्यपाल के इस बयान पर माकपा में तीखी प्रतिक्रया हुई। उसने ईंट का जवाब पत्थर से देने की तर्ज पर एक लिखित बयान में राज्यपाल को अपने संवैधानिक पद की गरिमा बनाए रखते हुए और तटस्थ रहने का सुझाव दिया। इसके अलावा भी बयान में कई बातें कही गईं थी। वैसे, माकपा और राज्यपाल में कोई पहली बार नहीं ठनी है। नंदीग्राम में हुई हिंसा पर राज्यपाल की टिप्पणी और फिर राजभवन में स्वेच्छा से बिजली की कटौती जैसे मुद्दों पर भी माकपा ने गांधी की जम कर खिंचाई की थी।
राज्यपाल की चिंता जायज थी। बीते बुधवार को तृणमूल कांग्रेस और वाममोर्चा का एक प्रतिनिधिमंडल अलग-अलग उनसे मिला था। इन दोनों ने राज्य में उनसे राज्य में जारी हिंसा को रोकने की दिशा में पहल की अपील की थी। ऐसे में गांधी का यह सवाल गलत नहीं था कि अगर तमाम दल इसे रोकने के लिए कृतसंकल्प हैं तो आखिर यह रुक क्यों नहीं रही है। माकपा और तृणमूल कांग्रेस इस हिंसा के लिए एक-दूसरे को जिम्मेवार ठहराते रहे हैं। लेकिन दोनों शायद इस मामूली तथ्य को भूल गए हैं कि एक हाथ से ताली नहीं बजती। इसी तरह दोनों दलों में हिंसा में मरने वाले अपने समर्थकों की तादाद बढ़ा-चढ़ा कर बताने की होड़ लगी है। अगर दोनों दलों के दावों को मान लें तो राज्य में बीते दो महीने से जारी इस हिंसा में मृतकों की तादाद दोगुनी हो जाएगी।
यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि पूरा मामला खुद को इस हिंसा का शिकार बता कर सहानुभूति बटोरने और अपना राजनीतिक हित साधने का है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस हिंसा को रोकने की जिम्मेवारी प्रशासन व राज्य सरकार की है। लेकिन फिलहाल वह भी लालगढ़ की तरह मंगलकोट के मामले में भी फेल होती नजर आ रही है। ऐसे में मंगलकोट में सामान्य स्थिति बहाल होने के कोई आसार नहीं नजर आते।