<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003</id><updated>2011-11-28T05:13:57.604+05:30</updated><category term='बंगाल'/><category term='वामपंथी'/><category term='यादें'/><category term='ज्योति बसु'/><category term='मणिपुर'/><category term='यात्रा'/><category term='वन्यजीव'/><category term='असम'/><category term='स्वास्थ्य'/><category term='समस्या'/><category term='चेरापूंजी'/><category term='बाघ'/><category term='भूली-बिसरी-2'/><category term='माकपा'/><category term='दार्जिलिंग चाय'/><category term='समय'/><category term='रंजन'/><category term='दार्जिलिंग'/><category term='काजीरंगा'/><category term='भूटान'/><category 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बनर्जी'/><category term='धोनी पुराण'/><category term='संस्मरण'/><category term='बंगाल चुनाव'/><category term='सफरनामा'/><category term='कोलकाता'/><category term='चुनाव'/><title type='text'>पुरवाई</title><subtitle type='html'>पुरवाई यानी पूरब की हवा का झोंका जो अपने में कई गंध समेटे है.</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>155</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-5624766429971507951</id><published>2011-10-14T22:53:00.001+05:30</published><updated>2011-10-14T22:55:19.011+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>शाही शादी में भूटानी हुए दीवाने</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-cn-SaHxa8HE/TphwZZyVG5I/AAAAAAAAAdE/DLc4BXqaMRQ/s1600/13bhutan4-1_1318514431_l.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 172px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-cn-SaHxa8HE/TphwZZyVG5I/AAAAAAAAAdE/DLc4BXqaMRQ/s200/13bhutan4-1_1318514431_l.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5663400113139424146" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बे&lt;/strong&gt;गानी शादी में अब्दुल्ला के दीवाना होने की कहावत सबने सुनी ही होगी. लेकिन यह तो न तो बेगानी शादी थी और न ही दीवाना होने वाले लोग अब्दुल्ला थे.यह शादी उनके अपने राजा की थी. पूरे देश में युवकों की एक पूरी पीढ़ी ऐसी है जिन्होंने अपने जीवन में कभी कोई शाही शादी नहीं देखी. उनके लिए तो यह नजारा किसी उत्सव से कम नहीं था. &lt;br /&gt;यूरोपीय देशों के बाद अब हिमालय की गोद में बसे एशियाई देश भूटान के लोगों ने भी इस सप्ताह शाही शादी का नजारा देखा. बौद्ध रीति-रिवाजों के मुताबिक हुई शादी को देखने के लिए भूटान ही नहीं बल्कि भारत से भी भारी तादाद में लोग पहुंचे थे. यूरोप में होने वाली शाही शादियों के विपरीत इस शादी की खास बात यह रही कि इसमें किसी भी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष को नहीं न्योता गया था. दुनिया के सबसे नन्हे लोकतंत्र भूटान के सबसे कम उम्र के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांग्चुक और भारत में पली-बढ़ी और पढ़ी जेटसन पेमा की शाही शादी का गवाह बनने के लिए खराब मौसम के बावजूद देश के कोने-कोने से लगभग एक लाख लोग पहुंचे थे. &lt;br /&gt;विवाह समारोह राजधानी थिंपू से लगभग 70 किलोमीटर दूर पुनाखा शहर में 17वीं सदी में बने एक किले में संपन्न हुआ. 1955 में राजधानी के थिम्पू जाने से पहले तक यह शहर ही सत्ता का केंद्र था. शाही परिवार में यहीं शादी करने की परंपरा है. पुनाखा के रॉयल लिंका मैदान में भूटान के विभिन्न समुदायों के कलाकारों ने शाही विवाह के उपलक्ष्य में पारंपरिक नृत्य पेश किए. इसके बाद राजा व रानी उपस्थित जनता के समक्ष आए और उसे आशीर्वाद दिया. विवाह समारोह के सिलसिले में भूटान की सेना, पुलिस और रॉयल बॉडीगार्ड की तरफ से सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे. विवाह के दौरान भूटान की मोबाइल सेवाओं को बंद कर दिया गया था. यहां तक कि निजी वाहनों की आवाजाही पर भी रोक थी.&lt;br /&gt;भूटान में गुरुवार सुबह शाही विवाह का समारोह शुरू होने से पहले ही इस जोड़े को भारत की ओर से शुभकामनाएं दी गईं. भूटान नरेश की दुल्हन के पुराने स्कूल की एक शिक्षिका ने भूटान में विवाह समारोह शुरू होने से पहले ही अपनी पूर्व छात्रा को शुभकामनाएं दीं. जेटसन पेमा के यहां के कसौली हिल्स स्थित आवासीय लारेंस स्कूल में पढ़ती थीं। उस दौरान नीलम ताहलन उनकी हाउस मिस्ट्रेस थीं. इस शाही शादी में मानो समूचा भूटान झूम रहा था. एक छात्र के.नामग्याल कहता है कि मैं राजा और रानी को नजदीक से देखना चाहता था.&lt;br /&gt;ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से पढ़े भूटान नरेश वांगचुक और पेमा बचपन से ही दोस्त थे. नरेश महज 17 साल की उम्र में ही पेमा को अपना दिल दे बैठे थे. बरसों पुराना यह प्यार अब सात जन्मों के बंधन में बदल गया है. इस अवसर पर दोनों बेहद खुश थे. लोगों को लंबे अरसे से इस शाही शादी का इंतजार था. राजधानी थिम्पू के एक स्कूल शिक्षक डी. वाग्दी इस शादी को देखने के लिए दो दिन पहले ही पुनाखा पहुंच गए थे. वे कहते हैं कि भूटान में अब अगले 20-25 वर्षों तक ऐसा कोई समारोह नहीं आयोजित होगा. मैं यह मौका चूकना नहीं चाहता था.&lt;br /&gt;राजसी विवाह को यहां के करीब सात लाख लोगों ने अपने घरों में टेलीविजन पर देखा. इसका ‘भूटान ब्राडकास्टिंग सर्विस टीवी’ पर सीधा प्रसारण किया गया. विवाह भूटानी बौद्ध परंपराओं के अनुसार हुआ. शाही शादी सुबह चार बजे ब्रह्म मुहुर्त में 100 बौद्ध भिक्षुओं की विशेष प्रार्थना के साथ आरंभ हुई. प्रार्थना मुख्य बौद्ध पुरोहित जे. खेनपो की देखरेख में हुई. इसके बाद वांगचुक और पेमा को पति-पत्नी घोषित कर दिया गया. शादी की रस्में पूरी होने के बाद दोनों बौद्ध मठ में खास तौर पर सजे कक्ष में कैमरे के सामने आए. शादी के बाद नरेश और महारानी ने किले के बाहर एक मैदान में जमा हजारों लोगों के साथ मिलकर नृत्य किया और अपनी शादी की खुशियां उनके साथ बांटी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विवाह की कई रस्में संपन्न होने के बाद 31 वर्षीय नरेश वांगचुक ने पीले रंग के जैकेट और स्कर्ट में सजी पेमा को मुकुट पहनाया. इसके बाद पेमा आधिकारिक तौर पर भूटान की महारानी घोषित कर दी गईं. भूटान की राजसी परंपराओं के अनुसार महारानी पेमा ने नरेश वांगचुक को तीन बार साष्टांग प्रणाम किया। इस रस्म के बाद दोनों को एक पेय दिया गया. मान्यताओं के अनुसार यह नवविवाहित जोड़े की दीर्घायु के लिए दिया जाता है. नरेश की शादी के जश्न में भूटान में भारत के राजदूत पवन के. वर्मा, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एम. के. नारायणन और राज परिवार के सदस्यों समेत लगभग 300 मेहमानों ने हिस्सा लिया.&lt;br /&gt;शादी के जश्न में आए लोगों को भूटान की 20 घाटियों से आए 60 बेहतरीन रसोईयों के हाथों का बना हुआ पारंपरिक भूटानी भोजन परोसा गया. इस शाही दावत में कुछ भारतीय पकवान भी शामिल किए गए थे. शाही शादी का गवाह बनने के लिए सौ किलोमीटर का सफर तय कर पहुंचे नामगे दोर्जी और उनके घरवाले बेहद खुश थे. इस शादी के मौके पर भूटान डाक विभाग ने नवविवाहित दंपती की तस्वीर वाले 60 हजार खास डाक टिकट छापे हैं. इसी तरह भूटान मुद्रा प्राधिकरण ने नई करेंसी और चांदी के सिक्के तैयार किए हैं. चांदी के सिक्के पांच हजार रुपए में बिक रहे हैं जबकि डाक टिकटों की कीमत 25 से 225 रुपए के बीच है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-5624766429971507951?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/5624766429971507951/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2011/10/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/5624766429971507951'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/5624766429971507951'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;शाही शादी में भूटानी हुए दीवाने&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-cn-SaHxa8HE/TphwZZyVG5I/AAAAAAAAAdE/DLc4BXqaMRQ/s72-c/13bhutan4-1_1318514431_l.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-7480432227018711241</id><published>2011-08-07T11:20:00.000+05:30</published><updated>2011-08-07T11:21:38.778+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाघ'/><title type='text'>सुंदरबन में तेज होती जिंदगी की जंग</title><content type='html'>&lt;strong&gt;प्रभाकर मणि तिवारी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;(यह रिपोर्ट रविवार, 7 अगस्त को जनसत्ता रविवारी में कवर स्टोरी के तौर पर छपी है. वहीं से साभार.)&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सुं&lt;/strong&gt;दरबन यानी दुनिया में रायल बंगाल टाइगर का सबसे बड़ा घर। पश्चिम बंगाल और पड़ोसी बांग्लादेश की सीमा पर 4262 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला यह इलाका इन बाघों के अलावा अपनी जैविक विवधताओं के लिए भी मशहूर है। लेकिन अब यह सब खतरे में है। वैश्विक तापमान में बढ़ोती ने इस इलाके के वजूद पर सवालिया निशान लगा दिया है। लेकिन सबसे तात्कालिक समस्या तो इस इलाके में रहने वाले इंसानों और बाघों को बचाने की है। आबादी के बढ़ते दबाव और पर्यावरण असंतुलन की वजह से से सिकुड़ते जंगल के चलते सुंदरबन की विभिन्न बस्तियों में रहने वाले लोग और बाघ एक-दूसरे से रोजाना जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं। कभी बाघ इंसानों का शिकार करते हैं तो कभी इंसान बाघों का। अब इस जंगल में इंसान ही नहीं बल्कि बाघ भी असुरक्षित हैं। &lt;br /&gt;सुंदरबन दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र है। बाघों को सुंदरबन का रक्षक कहा जाता है। लेकिन सुंदरबन के इस रक्षक को अब कम होते क्षेत्र, घटते शिकार और शिकारियों के कारण भारी नुकसान हो रहा है। इसी तरह प्राकृतिक आपदाओं व मनुष्य की गतिविधियों से बाघों की शरणस्थली मैंग्रोव जंगल भी अब तेजी से खत्म होते जा रहे हैं। इसे 1973 में टाइगर रिजर्व के रूप में घोषित कर दिया गया था और 1984 में इसे सुंदरवन राष्ट्रीय उद्यान बनाया गया। 1997 में इसे यूनेस्को की ओर से विश्व धरोहर का दर्जा दिया गया। &lt;br /&gt;सुंदरबन इलाके में बाघों के जंगल से निकल कर मानव बस्तियों में आने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। अपने मैंग्रोव जंगल और रॉयल बंगाल टाइगर के लिए मशहूर सुंदरबन इलाका बाघ और इंसानों के बीच बढ़ते संघर्ष की वजह से लगातार सुर्खिर्यां बटोर रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सुंदरबन में हर साल औसतन 35 से 40 लोग बाघ के शिकार बन जाते हैं। लेकिन स्थानीय लोग कहते हैं कि इलाके में हर साल अममून सौ से ज्यादा लोग बाघ के जबड़ों में जिंदगी गंवा देते हैं। दूर-दराज के इलाकों की घटनाओं के बारे में अक्सर पता ही नहीं चलता या लोग इन्हें दर्ज नहीं करवाते। हाल के दिनों में इंसानी बस्तियों पर बाघों के हमले की कम से कम एक दर्जन घटनाओं में छह लोग लोग मारे जा चुके हैं और इतने ही घायल हुए हैं। वन विभाग ने बीते हफ्ते बस्ती में घूमते एक बाघ को दबोचने में भी कामयाबी हासिल की है। इस कड़ी की ताजा घटना में बाघ के जबड़े में फंस कर एक और मछुआरे की मौत हो गई। इन घटनाओं ने वन विभाग के अधिकारियों और राज्य सरकार को चिंता में डाल दिया है। सुंदरबन टाइगर रिजर्व के एक अधिकारी कहते हैं कि बाघों के हमले की ज्यादातर घटनाओं की रिपोर्ट ही नहीं दर्ज कराई जाती। इसकी वजह यह है कि ज्यादातर लोग बिना किसी परमिट या मंजूरी के ही गहरे जंगल में घुसते हैं। इसलिए ऐसे मामलों की सही तादाद बताना मुश्किल है। वन विभाग की दलील है कि सुंदरबन का जो इलाका भारत की सीमा में है वहां रहने वाले बाघ आदमखोर नहीं हैं। लेकिन पड़ोसी बांग्लादेश में लगभग हर साल आने वाले तूफान के चलते उस पार से भी भोजन की तलाश में काफी बाघ इधर आ गए हैं। वे अक्सर जंगल से सटी बस्तियों में घुस जाते हैं या फिर जंगल में जाने वालों को घात लगा कर अपना शिकार बना लेते हैं। &lt;br /&gt;वन विभाग ने इसके कारणों का पता लगाने के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाने का फैसला किया है। शुरूआती जांच में यह तथ्य सामने आया है कि सुंदरवन से सटी बंगाल की खाड़ी का जलस्तर बढ़ने, बाघों के चरने की जगह लगातार घटने और अपना पसंदीदा खाना नहीं मिलने की वजह से बाघ भोजन की तलाश में इंसानी बस्तियों में आने लगे हैं। इनसे बचाव के फौरी राहत के तौर पर वन विभाग ने सुंदरबन में सौ हिरण छोड़े हैं। लेकिन इसे ऊंट के मुंह में जीरा ही माना जा रहा है। &lt;br /&gt;सुंदरबन विकास बोर्ड इस बात का पता लगाने पर जोर दे रहा है कि बाघ भोजन की कमी के चलते जंगल से बाहर निकल रहे हैं या अपनी प्रकृति में बदलाव की वजह से। बीते दो सालों में बाघों के इंसानी बस्तियों में घुसने की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। सुंदरबन के बाघों की प्रकृति में भी बदलाव आ रहा है। अब वे निडर होकर बस्तियों में घुस कर इंसानों पर हमले कर रहे हैं।&lt;br /&gt;सुंदरबन टाइगर रिजर्व के एक अधिकारी कहते हैं कि बाघ तभी जंगल से बाहर निकलते हैं जब वे बूढ़े हो जाते हैं और जंगल में आसानी से कोई शिकार नहीं मिलता। उस अधिकारी का कहना है कि सुदरबन की इंसानी बस्तियों में रहने वाले लोग अपनी रोजी-रोटी के लिए मूल रूप से जंगली लकड़ियों की कटाई पर ही निर्भर हैं। अक्सर जंगल में बाघ से मुठभेड़ होने पर वे लोग उसे अपने धारदार हथियारों से घायल कर देते हैं। ऐसे ही बाघ भोजन की तलाश में इंसानों पर हमला करते हैं। प्रोजेक्ट टाइगर के पूर्व फील्ड डायरेक्टर प्रणवेश सान्याल इसके लिए वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को जिम्मेवार ठहराते हैं। वे कहते हैं कि सुंदरबन के जिस इलाके में बाघ रहते हैं वहां पानी का खारापन बीते एक दशक में 15 फीसद बढ़ गया है। इसलिए बाघ धीरे-धीरे जंगल के उत्तरी हिस्से में जाने लगे हैं जो इंसानी बस्तियों के करीब है।&lt;br /&gt;सुंदरबन बायोरिजर्व के निदेशक प्रदीप व्यास कहते हैं कि हमारे लिए यह चिंता का विषय है। हम इसकी वजह का पता लगा रहे हैं।  व्यास ने कहा कि बाघों को आसपास के वनों में प्रवेश से रोकने के लिए कई उपाय किए जा रहे हैं । वे बताते हैं कि बाघों के भोजन के लिए जंगल में हिरण छोड़े जा रहे हैं। राज्य वन्यजीव बोर्ड की सिफारिशों के तहत 200 हिरणों को सुंदरबन में मुक्त किया जायेगा । लेकिन इससे पहले यह सुनिश्चित किया जाएगा कि वे बीमारी से मुक्त हों । इस प्रक्रिया को पूरा होने में तीन से नौ महीने तक का समय लग सकता है । उन्होंने कहा कि वनकमिर्यों ने कुछ बाघों को पकड़ा है जो काफी कमजोर पाए गए हैं ।&lt;br /&gt;उधर, वन्यजीवों से जुड़े एनजीओ ने चिंता जताई है कि बाघों के इन गांवों में भटकने से फिर से मानव-पशु संघर्ष हो सकता है। नेचर एनवायनर्मेंट एंड वाइल्डलाइफ सोसाइटी के सचिव विश्वजीत रायचौधरी कहते हैं कि हालात काफी चिंताजनक है । &lt;br /&gt;बाघ और इंसानों के बीच लगातार तेज हो रही इस जंग का नतीजा दक्षिण 24-परगना जिले के आरामपुर गांव में अपनी पूरी कड़वाहट के साथ देखा जा सकता है। इस गांव में हर साल इतने लोग बाघ के शिकार हो जाते हैं कि उस गांव का नाम ही विधवापल्ली यानी विधवाओं का गांव हो गया है। सुंदरबन के गोसाबा द्वीप में स्थित आरामपुर गांव राजधानी कोलकाता से लगभग 90 किलोमीटर दूर जयनगर संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है। लेकिन इस आरामपुर गांव में विधवाओं की लगातार बढ़ती तादाद के चलते इसका नाम ही बदल कर विधवापल्ली या विधवाओं का गांव हो गया है। गांव में अठारह से लेकर साठ साल तक की महिला मतदाता हैं। लेकिन उनके मुकाबले पुरुष मतदाताओं की तादाद नहीं के बराबर है।&lt;br /&gt;देश में यह शायद अकेली ऐसी जगह है, जहां हर दो चुनाव के बीच पुरुष मतदाताओं की तादाद बढ़ने की बजाय घट जाती है। ज्यादातर मामलों में तो गांव के युवक मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने से पहले ही बाघ के पेट में समा जाते हैं। सुंदरबन के इस गांव में रहने वाले मछली पकड़ने के अलावा जंगल से मधु एकत्र कर अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं।  जंगल में रायल बंगाल टाइगर के खतरे से बाकिफ होने के बावजूद पेट की आग बुझाने के लिए वे रोज जंगल में जाते हैं।&lt;br /&gt;गांव की ज्यादातर विधवाओं के पास अपनी जमीन नहीं है। अपना और अपने बच्चों का पेट पालने के लिए उन्हें काफी दूर जाकर पैसे वाले लोगों के लोगों के घरों और खेतों में काम करना पड़ता है। गांव के बच्चों का बचपन भी उसे छिन गया है। वे छोटी उम्र से ही दूसरों के खेतों में मजदूरी करते हैं और बड़े होने पर जंगल में जाते हैं। &lt;br /&gt;आजादी से पहले विधवापल्ली गांव का कोई वजूद नहीं था। लेकिन विभाजन के बाद पारंपरिक रूप से मछुआरे, लकड़हारे और मधु एकत्र करने वाले यहां धीरे-धीरे आ बसे। साल 1950 तक यहां की आबादी ज्यादा नहीं थी। बाद में गांव के पुरुष धीरे-धीरे बाघ का शिकार बनते गए और गांव में या तो विधवाएं बच गईं या फिर उनके दुधमुंहे बच्चे। सामाजिक बायकाट की चलते धीरे-धीरे सुंदरबन इलाके के दूसरे गांवों की विधवाएं भी विधवापल्ली में आ कर बसने लगीं। इस समय गांव में लगभग सवा दो सौ घर हैं। लेकिन इनमें से एक भी घर ऐसा नहीं है जहां बाघ के जबड़ों में सुहाग खोने वाली कोई विधवा नहीं हो। यानी सुदंरबन के बाघों ने इलाके में विधवाओं का एक पूरा गांव ही बसा दिया है।&lt;br /&gt;गांव की पार्वर्ती मंडल के पति को बीते साल ही जंगल में बाघ ने मार दिया। वह कहती है कि यह तो विधवाओं का गांव है। हमें न तो सरकार से कोई सहायता मिलती है और न ही कोई नेता हमारा दर्द बांटने आता है। वह आरोप लगाती है कि चुनाव के मौके पर तमाम राजनीतिक पार्टियां हमदर्दी का नाटक करती हैं। लेकिन चुनाव बीतते ही उनके दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं। गांव के एक बुजुर्ग मोहम्मद शफीकुल के तो तीनों बेटों को बाघ ने मार दिया। अब अपने छोटे-छोटे पोते-पोतियों के साथ दिन काट रहे शफीकुल कहते हैं कि यहां मौत ही हमारी नियति है। घर में बैठें तो भूख से मर जाएंगे और जंगल में जाएं तो बाघ हमें नहीं छोड़ेगा। गांव के न जाने कितने ही मर्द उनका शिकार हो चुके हैं।&lt;br /&gt;सुंदरबन के बाघों की घटती तादाद पर 'टाइगर कंजर्वेशन लैंडस्केप आॅफ ग्लोबल प्रायोरिटी' के एक विस्तृत अध्ययन पर आधारित रिपोर्ट बनाई जा रही है। इस अध्ययन का मकसद मैंग्रोव जंगलों में बाघों की विकास-प्रक्रिया को समझना, उनकी तादाद की सही जानकारी और बाघों व मनुष्यों के बीच लगातार बढ़ते टकराव की वजहों का पता करना है। इसका एक और मकसद यह भी पता लगाना है कि सुंदरबन के अस्तित्व के लिए बाघों का होना कितना जरूरी है। &lt;br /&gt;इलाके में ज्यादातर  हमले अप्रैल व मई में हुए हैं। यह मैंग्रोव के खिलने का समय होता है और लोग शहद एकत्र करने जंगल में जाते हैं। लेकिन बाघों के लिए यही प्रजनन का सीजन होता है। वन्यजीव विशेषज्ञ बताते हैं कि अधिकतर मामलों में मनुष्य को मारने वाली बाघिन अपने शावक को भी आदमखोर बना सकती है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्री जलस्तर के बढ़ने से मैंग्रोव में मिलने वाले अपने प्राकृतिक आहार में आई कमी से भी बाघों के भोजन स्त्रोत पर काफी असर पड़ा है। अपने घटते भोजन से बाघ भी अब मानव बस्तियों व गाय-भैंस जैसे आसान शिकार की ओर ज्यादा आकर्षित होने लगे हैं।&lt;br /&gt;सुंदरबन के बाघों को बेहद खूंखार माना जाता है।  सुंदरबन में ताजे पानी के स्रोत बहुत ही कम हैं और बाघों को अकसर खारा पानी पीना पड़ता है जो शायद उनके इस खूंखार व्यवहार का कारण है। सरकार हर साल लगभघ 40 लोगों को जंगल से शहद एकत्र करने, मछली पकड़ने का परमिट देती है। लेकिन पैसा कमाने के लालच में हजारों लोग अवैध रूप से इन जंगलों में वन उत्पादों को एकत्र करने व मछली पकड़ने जाते हैं।&lt;br /&gt;अब इस इलाके में पर्यावरण असंतुलन के चलते बाघ ही नहीं, बल्कि इंसानों का वजूद भी खतरे में पड़ गया है। यूनेस्को के विश्व धरोहरों की सूची में शुमार सुंदरबन में देखने के लिए बहुत कुछ है। रायल बंगाल बाघ, जैविक और प्राकृतिक विविधता और सुंदरी पेड़ों का सबसे बड़ा जंगल यानी मैंग्रोव फॉरेस्ट। लेकिन अब इसमें एक और चीज जुड़ गई है।  वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी का कुप्रभाव देखना हो तो सुंदरबन एक आदर्श जगह है। बांग्लादेश की सीमा से सटा यह इलाका दुनिया में मैंग्रोव जंगल और अपनी जैविक व पर्यावरण विविधताओं के लिए मशहूर  है। लेकिन बंगाल की खाड़ी के लगातार बढ़ते जलस्तर ने इसके अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पर्यावरण में तेजी से होने वाले बदलावों के चलते समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण इस जंगल और इलाके में जहां-तहां बिखरे द्वीपों पर संकट मंडराने लगा है। इन प्राकृतिक द्वीपों के साथ यहां रहने वाली आबादी भी खतरे में है। डूबने के डर से इलाके से बड़े पैमाने पर विस्थापन हो रहा है। वैसे, तो पहले भी समय-समय पर सुंदरबन के द्वीपों के पानी में समाने पर चिंताएं जताई जा रहीं थी। लेकिन संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी पर्यावरण रिपोर्ट के बाद इसकी गंभीरता खुल कर सामने आ गई है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि समुद्र का जलस्तर इसी तरह बढ़ता रहा तो सुंदरबन जल्दी ही भारत के नक्शे से मिट जाएगा। &lt;br /&gt;इस क्षेत्र के दो द्वीप पानी में डूब चुके हैं। लोहाचारा नामक एक द्वीप पानी में समा चुका है। घोड़ामारा द्वीप भी धीरे-धीरे पानी में समा रहा है। अब कम से कम और एक दर्जन द्वीपों पर यही खतरा मंडरा रहा है। इनमें वह सागरद्वीप भी शामिल है जहां सदियों से मशहूर गंगासागर मेला आयोजित होता रहा है। उन द्वीपों में लगभग 70 हजार की आबादी रहती है। &lt;br /&gt;कोलकाता में यादवपुर विश्वविद्यालय के समुद्री अध्ययन स्कूल के निदेशक सुगत हाजरा कहते हैं कि यह पर्यावरण में हो रहे बदलावों का नतीजा है। लोहाचारा समेत दो द्वीप समुद्र में डूब गए हैं। अब सेटेलाइट से ली जाने वाली तस्वीरों में इनको नहीं देखा जा सकता। ग्लोबल वार्मिंग और लगातार जारी भूमि कटाव के कारण इलाके के कम से कम 12 और द्वीपों के डूब जाने का खतरा पैदा हो गया है। हाजरा कहते हैं कि समुद्र के लगातार बढ़ते जलस्तर व प्रशासनिक उदासीनता के कारण सुंदरबन का 15 फीसदी हिस्सा वर्ष 2020 तक समुद्र में समा जाएगा। वे बताते हैं कि यहां समुद्र का जलस्तर 3.14 मिमी सालाना की दर से बढ़ रहा है। इससे कम से कम 12 द्वीपों का वजूद संकट में है।&lt;br /&gt;सुंदरबन इलाके में कुल 102 द्वीप हैं। उनमें से 54 द्वीपों पर आबादी है। मछली मारना और खेती करना ही उनकी आजीविका के प्रमुख साधन हैं। इलाके में यहां रोजगार का कोई अवसर नहीं है। इसके साथ बढ़ती आबादी और बाहरी लोगों के यहां की जमीन पर कब्जा कर होटल खोलने के कारण दबाव और बढ़ा है। सुंदरबन के गड़बड़ाते पर्यावरण संतुलन पर व्यापक शोध करने वाले आर. मित्र कहते हैं कि इस मुहाने के द्वीप धीरे-धीरे समुद्र में समाते जा रहे हैं। अगले दशक के दौरान हजारों लोग पर्यावरण के शरणार्थी  बन जाएंगे।&lt;br /&gt;राज्य के अतिरिक्त प्रमुख वन संरक्षक अतनु राहा कहते हैं कि आबादी के दबाव ने सुंदरबन के जंगलों को भारी नुकसान पहुंचाया है। इलाके के गावों में रहने वाले लोगों के चलते जंगल पर काफी दबाव है। इसे बचाने के लिए एक ठोस पहल की जरूरत है ताकि जंगल के साथ-साथ वहां रहने वाले लोगों को भी बचाया जा सके। हमने इलाके में बड़ी नहरें व तालाब खुदवाने का फैसला किया है ताकि बारिश का पानी संरक्षित किया जा सके। इस पानी से इलाके में जाड़ों के मौसम में दूसरी फसलें उगाई जा सकती हैं। इससे जंगल पर दबाव कम होगा।&lt;br /&gt;सरकार ने कुछ गैर-सरकारी संगठनों के साथ मिल कर सुंदरबन इलाके के लोगों में जागरूकता पैदा करने की भी योजना बनाई है। लेकिन सुंदरबन को बचाने की दिशा में होने वाले उपाय उस पर मंडराते खतरे के मुकाबले पर्याप्त नहीं हैं।&lt;br /&gt;पर्यावरण विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि अगर इस दिशा में ठोस पहल नहीं की गई तो जल्दी ही सुंदरबन का नाम नक्शे से मिट जाएगा। तब यहां न तो बाघ बचेंगे और न ही इंसान। आबादी के बढ़ते दबाव की वजह से कई बस्तियां जंगल से एकदम सटी हैं। बाघ अक्सर उनमें घुस जाते हैं। जिंदगी की इस बढ़ती जंग ने बाघों को उन गांव वालों के लिए राक्षस बना दिया है जो कभी उसी बाघ देवता की पूजा कर जंगल में जाते थे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-7480432227018711241?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/7480432227018711241/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2011/08/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/7480432227018711241'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/7480432227018711241'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;सुंदरबन में तेज होती जिंदगी की जंग&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-6723013142442516579</id><published>2011-04-26T22:45:00.000+05:30</published><updated>2011-04-26T22:46:05.247+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पश्चिम बंगाल'/><title type='text'>अनुशासनहीन और पार्टीविरोधी सोमनाथ बने माकपा का सहारा</title><content type='html'>बदलाव के शोर के बीच पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव में माकपा की अगुवाई वाला वाममोर्चा सत्ता में बने रहने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा है। इसके लिए उसे पार्टीविरोधी और अनुशासनहीन पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी का सहारा लेने से भी कोई परहेज नहीं है। सोमनाथ को जुलाई 2008 में इन्हीं आरोपों के चलते माकपा से निकाल दिया गया था। माकपा नेता और आवासन मंत्री गौतम चटर्जी के अनुरोध पर सोमनाथ के चुनाव प्रचार से पार्टी के प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व के बीच की खाई एक बार फिर सतह पर आ गई है। अब इस अहम चुनाव के मौके पर पार्टी महासचिव प्रकाश कारत और सीताराम येचुरी जैसे नेताओं को भी सोमनाथ का स्वागत करना पड़ रहा है।&lt;br /&gt;यह बात जगजाहिर है कि माकपा के शीर्ष नेतृत्व में दक्षिणपंथी लाबी के दबाव में ही सोमनाथ जैसे कद्दावर नेता को पार्टीविरोधी गतिविधियों और अनुशासनहीनता के आरोप में माकपा से निकाल दिया गया था। उस समय इस मुद्दे पर प्रदेश और शीर्ष नेतृत्व के बीच गहरे मतभेद उभरे थे। प्रदेश माकपा के नेता सोमनाथ के खिलाफ निष्कासन जैसी कड़ी कार्रवाई के पक्ष में नहीं थे। सुभाष चक्रवर्ती समेत कई नेताओं ने तो सार्वजनिक तौर पर इस फैसले के खिलाफ सवाल उठाए थे। &lt;br /&gt;सोमनाथ बीते सप्ताह से ही माकपा के समर्थन में कई रैलियों को संबोधित कर लोगों से आठवीं वाममोर्चा सरकार को सत्ता में लाने में की अपील कर रहे हैं। लेकिन गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज की तर्ज पर वाममोर्चा के नेता इस मामले को कोई तूल नहीं देना चाहते। माकपा के प्रदेश सचिव और वाममोर्चा अध्यक्ष विमान बसु ने पहले ही पत्रकारों से कहा था कि अगर सोमनाथ समेत कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से माकपा व वाममोर्चा के पक्ष में प्रचार के लिए आगे आता है उसका विरोध नहीं, स्वागत किया जाएगा। महासचिव प्रकाश कारत और पोलितब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी ने भी लगभग इन्हीं शब्दों में इस मुद्दे पर टिप्पणी की। लेकिन वे शायद यह भूल गए कि सोमनाथ अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि माकपा के स्टार प्रचारक और सबसे बड़े प्रवक्ता के तौर पर उभरे गौतम देव के लगातार अनुरोध की वजह से प्रचार के लिए आगे आए हैं। शायद इसलिए करात ने यह जोड़ा कि प्रचार के लिए किसी को बुलाने या नहीं बुलाने का फैसला प्रदेश नेतृत्व पर निर्भर है। गौतम देव की ओर से सोमनाथ को दिए गए प्रचार के न्योते के बाते में पूछे गए सवाल पर पहले तो विमान बसु का कहना था कि उनको इसकी जानकारी नहीं है। वे कोलकाता से बाहर थे। इससे यह सवाल पैदा होता है कि क्या गौतम देव इतने ताकतवर हो गए हैं कि वे प्रदेश सचिव की अनुमति तो दूर, उनको सूचित किए बिना किसी ऐसे नेता को प्रचार का न्योता दे सकते हैं जिसे महज तीन साल पहले पार्टीविरोधी गतिविधियों के आरोप में माकपा से निकाल दिया गया हो। अगर सचमुच ऐसा है तो सोमनाथ को निकालने में पार्टी ने जिस अनुशासन का परिचय दिया था, उसकी तो देव ने धज्जियां ही उड़ा दीं।&lt;br /&gt;लेकिन सोमनाथ को प्रचार का न्योता देने का फैसला अकेले गौतम का नहीं था। उन्होंने पत्रकारों को बताया था कि यह फैसला विमान बसु व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य से सलाह-मशविरे के बाद ही लिया गया है। गौतम का सवाल था कि कहीं भी ऐसा नहीं लिखा है कि एक बार पार्टी से निकाले जाने के बाद उस नेता को वापस नहीं लिया जा सकता या फिर उससे प्रचार नहीं कराया जा सकता।&lt;br /&gt;पार्टी से निकाले जाने के बाद सक्रिय राजनीति से अलग रहने का फैसला करने सोमनाथ ने पत्रकारों से कहा था कि गौतम देव लगातार अपने समर्थन में दमदम इलाके में चुनाव प्रचार करने का अनुरोध कर रहे हैं। अपने समर्थन में हुई कई रैलियों के बाद गौतम अब सोमनाथ को पार्टी में वापस लेने की मुहिम चला रहे हैं। उनका कहना है कि वापसी का फैसला तो सोमनाथ पर निर्भर है। लेकिन वाममोर्चा उम्मीदवारों के पक्ष में चुनाव प्रचार करने वाले ऐसे कद्दावर नेता को कब तक पार्टी से बाहर रखा जा सकता है।&lt;br /&gt;सोमनाथ के प्रचार में उतरने का स्वागत मुख्यमंत्री ने भी किया है। लेकिन उन्होंने पार्टी में उनकी वापसी के सवाल पर कोई टिप्पणी नहीं की है। बुद्धदेव ने कहा कि सोमनाथ हमारी पार्टी के एक अहम नेता थे। दो-तीन साल पहले कुछ समस्याएं जरूर पैदा हो गईं। लेकिन वे अब भी पार्टी के साथ हैं। क्या उनकी वापसी होगी? इस सवाल पर मुख्यमंत्री कहते हैं कि फिलहाल इस सवाल पर विचार नहीं किया गया है। लेकिन यह तय है कि उनके चुनाव प्रचार से हमें काफी फायदा होगा।&lt;br /&gt;राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि अपने कार्यकाल के सबसे अहम विधानसभा चुनाव का सामना कर रही माकपा अबकी कोई खतरा नहीं मोल लेना चाहती। यही वजह है कि केंद्रीय नेतृत्व की परवाह किए बिना ही उसने सोमनाथ जैसे नेता को चुनाव प्रचार में उतारा है। इसके साथ ही उनको पार्टी में वापस लाने की मांग भी जोर पकड़ रही है। सोमनाथ इन चुनावी रैलियों में कह चुके हैं कि वे अब भी मार्क्सवादी हैं। चुनाव का नतीजा वाममोर्चा के पक्ष में रहने की स्थिति में माकपा में सोमनाथ की वापसी के सवाल प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व का टकराव तय है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि सोमनाथ के प्रचार से माकपा को कितना फायदा होगा या फिर पार्टी में उनकी वापसी होगी या नहीं, इन जैसे कई सवालों का जवाब तो बाद में मिलेगा। लेकिन उनके कूदने से माकपा के चुनाव अभियान को मजबूती तो मिली ही है।&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-6723013142442516579?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/6723013142442516579/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2011/04/blog-post_4036.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/6723013142442516579'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/6723013142442516579'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2011/04/blog-post_4036.html' title='&lt;strong&gt;अनुशासनहीन और पार्टीविरोधी सोमनाथ बने माकपा का सहारा&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-1026290507862807267</id><published>2011-04-26T22:44:00.001+05:30</published><updated>2011-04-26T22:44:51.957+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पश्चिम बंगाल'/><title type='text'>बेशर्मी और बेहयाई की हदें टूटीं बंगाल चुनाव में</title><content type='html'>ममता तो सोनागाछी की वेश्या की तरह बड़ा ग्राहक मिलने पर छोटे को छोड़ देती हैं, तृणमूल कांग्रेस को अमेरिका से काला धन मिला है चुनाव लड़ने के लिए, ममता नाचते हुए भाषण देती हैं, पैरों में हवाई और प्रचार के लिए हेलीकाप्टर, यह तो जबरदस्त विरोधाभास है, माकपा नेता गौतम देव ने फ्लैट बेच कर करोड़ों की रिश्वत कमाई है उनको कमर में रस्सी बांध कर घूमाया जाना चाहिए, पश्चिम बंगाल देश का सबसे बदतर शासित राज्य है, सरकार ने बंगाल को कत्लगाह बना दिया है---यह बानगी है पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वाममोर्चा और तृणमूल कांग्रेस की ओर से एक-दूसरे के खिलाफ लग रहे आरोपों की. बदलाव की कथित हवा के बीच हो रहे विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान में सचमुच बदलाव नजर आ रहा है. इस दौरान सत्ता के दोनों प्रमुख दावेदारों यानी वाममोर्चा और तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस गठबंधन ने एक-दूसरे पर निजी हमलों और अशालीन व कटु टिप्पणियों का जो दौर शुरू किया है उससे बेशर्मी और बेहयाई की तमाम हदें टूट गईं है. दोनों दलों के नेताओँ के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर ऐसे स्तर पर पहुंच गया है जिससे सड़क छाप गुंडे-मवाली भी शर्मा सकते हैं. कुछ नेता अपने विरोधियों के चरित्र हनन में इस कदर डूबे हैं कि उनको भाषा की गरिमा का भी ख्याल नहीं रहा. माकपा के एक पूर्व सांसद ने तो तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी की तुलना सोनागाछी की वेश्या से कर सारी हदें तोड़ दी हैं.&lt;br /&gt;पहले भी चुनाव में दोनों दलों के नेता अपने विरोधियों के खिलाफ तमाम आरोप तो लगाते थे. लेकिन उनकी भाषा संयत रहती थी. लेकिन इस बार यही नेता आप से तुम पर उतर आए हैं. इनके बीच तू-तू,मैं-मैं  का जो दौर शुरू हुआ है वह आम वोटरों की कल्पना से परे है. दोनों पक्ष एक-दूसरे पर चुनाव प्रचार में काले धन के इस्तेमाल का आरोप लगा रहे हैं. मौजूदा चुनाव अभियान के दौरान इसकी शुरूआत माकपा नेता और आवासन मंत्री गौतम देव ने की. उन्होंने तृणमूल कांग्रेस पर चुनाव अभियान के दौरान अपने उम्मीदवारों को 34 करोड़ का काला धन बांटने का आरोप लगाया. बाद में यह भी जोड़ा कि यह पैसा अमेरिका से मिला है. इसके जवाब में तृणमूल के नेताओं ने कहा कि गौतम देव ने चुनावों के एलान के बाद भी महानगर से सटे राजारहाट में फ्लैटों की अवैध बिक्री से लगभग दो सौ करोड़ रुपए कमाए हैं और वही पैसा चुनाव प्रचार में इस्तेमाल किया जा रहा है. तृणमूल ने कहा कि इस मामले में देव को गिरफ्तार कर उनकी कमर में रस्सी बांध कर उनको सड़कों पर घूमाना चाहिए. &lt;br /&gt;इसके बाद देव ने फिर जवाबी हमला बोला. उन्होंने कहा कि ममता अपनी चुनावी रैलियों में नाच-नाच कर भाषण देती हैं. उन्होंने तृणमूल कांग्रेस पर उन कूपनों को जलाने का आरोप लगाया जिनके जरिए पार्टी ने अपने कथित काले धन को सफेद किया था. लेकिन उन्होंने अपने किसी भी आरोप के समर्थन में कोई सबूत नहीं दिया है. उनका कहना है कि समय आने पर वे सबूत पेश करेंगे. दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने भी गौतम के खिलाफ लगाए आरोपों पर कोई सबूत नहीं पेश किया है. उसकी दलील है कि पहले गौतम सबूत पेश करें, तब वह भी सबूत देगी.&lt;br /&gt;गौतम देव बनाम तृणमूल कांग्रेस के बीच निहायत ओछी छींटाकशी का यह दौर चल ही रहा था कि हुगली जिले के आरामबाग से पूर्व माकपा सांसद अनिल बसु ने सारी हदें तोड़ दीं. उन्होंने कहा कि ममता को देश के विभिन्न हिस्सों से चुनाव खर्च के लिए पैसे मिल रहे थे. लेकिन उन्होंने मना कर दिया. दरअसल, उनको अमेरिका से इसके लिए पैसा मिल रहा है. बसु का कहना था कि जिस तरह सोनागाछी की वेश्याएं मालदार ग्राहक मिल जाने पर छोटे ग्राहकों को छोड़ देती हैं, ममता ने भी वैसा ही किया है. आखिर किस ग्राहक ने ममता को 34 करोड़ रुपए दिए हैं. बसु की इस टिप्पणी से यहां राजनीतिक हलके में तूफान खड़ा हो गया है. तृणमूल कांग्रेस ने उनके भाषण की सीडी के साथ चुनाव आयोग को शिकायत भेजी है. तृणमूल नेता पार्थ चटर्जी ने इस टिप्पणी के लिए बसु की गिरफ्तारी की मांग की है. दूसरी ओर, बसु की इस टिप्पणी से माकपा नेतृत्व भी सकपका गया. यही वजह है कि प्रदेश सचिव विमान बसु और मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अलग-अलग बयान जारी कर बसु की उक्त टिप्पणी की निंदा की. भट्टाचार्य ने अभद्र भाषा इस्तेमाल करने पर अनिल बसु को कड़ी फटकार लगाते हुए भविष्य में सतर्क रहने को कहा है. मुख्यमंत्री ने कहा कि इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल क्षमा करने लायक नहीं है और एक वामपंथी नेता के नाते यह अनुचित है. भट्टाचार्य ने पार्टी नेतृत्व से इस मामले को गंभीरता से देखने और आवश्यक कदम उठाने को कहा.&lt;br /&gt;भट्टाचार्य की फटकार पर दो दिन बाद बसु ने इस टिप्पणी के लिए माफी मांगने की औपचारिकता निभा ली. वैसे, सात बार सांसद रहे बसु की शालीनता का यह पहला मामला नहीं है.यह माकपा सांसद इससे पहले सिंगुर मामले पर टिप्पणी करते हुए कह चुके हैं कि वे नैनो कारखाने के सामने धरना मंच पर बैठी ममता को बाल पकड़ कर खींचते हुए नीचे उतार सकते थे.&lt;br /&gt;दूसरी ओर, गौतम देव के तेवर जस के तस हैं.बीते सप्ताह एक स्थानीय चैनल पर इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा दिया था कि माकपा समेत हर पार्टी में अमेरिकी खुफिया एजंसी सीआईए के एजंट हैं.वे ममता की सादगी और हवाई चप्पलों की खिल्ली उड़ाते हुए कह चुके हैं कि पैरों में हवाई और चुनाव प्रचार के लिए हेलीकाप्टर—इन दोनों के बीच कोई तालमेल नहीं है.&lt;br /&gt;इस सप्ताह चुनाव प्रचार के लिए आए केंद्रीय गृह मंत्री पी.चिदंबरम ने बंगाल को देश का सबसे बदतर शासित राज्य बताते हुए सरकार पर राज्य को कत्लगाह बनाने का आरोप जड़ दिया. इससे तिलमिलाए वामपंथियों ने कहा कि चिदंबरम पहले अपने गिरेबां में झांकें. &lt;br /&gt;यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि राज्य में चुनावों के दौरान निजी हमले तो पहले भी होते रहे हैं.लेकिन इस बार यह हमला जिस ओछे स्तर पर शुरू हो गया है वह बेमिसाल है.दरअसल, इस बार दोनों ही दावेदार चुनावी नतीजों को लेकर काफी डरे हुए हैं। एक को सत्ता हाथ से निकलने का डर सता रहा है तो दूसरा यह सोचकर आशंकित है कि इतनी उम्मीदों के बावजूद अगर सत्ता हाथ में नहीं आई तो क्या होगा. ऐसे में निजी हमलों और चरित्रहनने का यह दौर चुनावी नतीजों तक कम होने की बजाय और बढ़ेगा ही.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-1026290507862807267?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/1026290507862807267/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2011/04/blog-post_1174.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/1026290507862807267'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/1026290507862807267'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2011/04/blog-post_1174.html' title='&lt;em&gt;&lt;strong&gt;बेशर्मी और बेहयाई की हदें टूटीं बंगाल चुनाव में&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-7573438853166811710</id><published>2011-04-26T22:41:00.001+05:30</published><updated>2011-04-26T22:44:03.052+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बंगाल चुनाव'/><title type='text'>बंगाल चुनाव में ओबामा !</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-1TnrWYAxqqc/Tbb9Roz7DDI/AAAAAAAAAcM/SwDAGn2D0c8/s1600/arup%2BBiswas%2BTMC%2BMLA.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 176px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-1TnrWYAxqqc/Tbb9Roz7DDI/AAAAAAAAAcM/SwDAGn2D0c8/s200/arup%2BBiswas%2BTMC%2BMLA.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5599941666136591410" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बीच भला क्या संबंध है? इसका जवाब है कुछ नहीं. ओबामा तो कभी बंगाल के दौरे पर भी नहीं आए हैं. वीकलीक्स के ताजे खुलासे में भले ममता के अमेरिका के लिए बेहतर साबित होने की बात कही गई हो, ओबामा यहां तृणमूल के पक्ष में चुनाव प्रचार नहीं कर रहे हैं. लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं चाहते हुए भी हजारों मील दूर कोलकाता में दिलचस्प चर्चा का मुद्दा बन गए हैं. विधानसभा चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस का एक उम्मीदवार ओबामा के सहारे चुनाव प्रचार कर रहा है. कोलकाता की टालीगंज विधानसभा सीट के तृणमूल उम्मीदवार अरूप विश्वास अपने चुनाव अभियान के दौरान इस बात का जम कर प्रचार कर रहे हैं कि पिछले साल दुर्गापूजा के दौरान उन्होंने पर्यावरण पर मंडराते खतरों को उजागर करते हुए जो थीम रखी थी उसकी प्रशंसा ओबामा ने भी की है. इस सीट पर मतदान 27 अप्रैल को होना है.&lt;br /&gt;विश्वास महानगर के अलीपुर इलाके की सुरुचि संघ आयोजन समिति के प्रमुख हैं. इस क्लब ने पिछले साल बारिश के पानी के संरक्षण (रेन वाटर हारवेस्टिंग) की थीम पर दुर्पापूजा आयोजित की थी. विश्वास विधायक के तौर पर अपने पांच साल के कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाते हुए जो परचा बांट रहे हैं, उसमें ओबामा की ओर से लिखे गए प्रशंसा पत्र की बात मोटे अक्षरों में लाल स्याही से छपी है. विश्वास ने पर्यावरण की थीम की जानकारी देते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति को जो पत्र लिखा था उसी के जवाब में ओबामा ने यह पत्र भेजा था. &lt;br /&gt;विश्वास कहते हैं, ‘हमने पूजा की थीम के बारे में और बाद में इसके सफल आयोजन के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए ओबामा को दो पत्र लिखे थे. उसके जवाब में उन्होंने एक निजी पत्र भेजा था.’ वह कहते हैं कि यह मेरी उपलब्धियों में से एक है.&lt;br /&gt;लेकिन सीपीएम इसे हास्यापास्द करार दे रही है. वैसे, सीपीएण के तमाम नेता पहले ही कह चुके हैं कि अमेरिका यहां लेफ्ट फ्रंट को सत्ता से हटाने के लिए तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस गठजोड़ की सहायता कर रहा है. सीपीएम के उम्मीदवार पार्थ प्रतिम विश्वास सवाल करते हैं, ‘आखिर दुर्गापूजा के बारे में ओबामा के पत्र का इस्तेमाल वोट मांगने के लिए कैसे किया जा सकता है? इससे साफ है कि विपक्ष मानसिक तौर पर दिवालिया हो चुका है.’&lt;br /&gt;लेकिन अरूप विश्वास इससे परेशान नहीं हैं. वह कहते हैं, ‘हम इलाके में हरियाली फैलाने की दिशा में कई ठोस योजनाएं शुरू करेंगे. इसके अलावा पर्यावरण पर बढ़ते खतरों के बारे में भी लोगों को आगाह किया जाएगा.’ पर्यावरण को बचाने के लिए वह प्लास्टिक पर पाबंदी लगा कर जूट और मिट्टी के बने थैलों और कपों को बढ़ावा देना चाहते हैं. विश्वास कहते हैं कि इस कानून के चलते बेरोजगार होने वाले प्लास्टिक निर्माण उद्योग से जुड़े लोगों को वैकल्पिक रोजगार मुहैया कराया जाएगा.&lt;br /&gt;प्रभाकर,कोलकाता&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-7573438853166811710?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/7573438853166811710/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2011/04/blog-post_26.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/7573438853166811710'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/7573438853166811710'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2011/04/blog-post_26.html' title='&lt;em&gt;&lt;strong&gt;बंगाल चुनाव में ओबामा !&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-1TnrWYAxqqc/Tbb9Roz7DDI/AAAAAAAAAcM/SwDAGn2D0c8/s72-c/arup%2BBiswas%2BTMC%2BMLA.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-5367480583185159987</id><published>2011-04-25T22:45:00.002+05:30</published><updated>2011-04-25T22:47:51.050+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सुंदरबन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पश्चिम बंगाल'/><title type='text'>डूबते द्वीप को बचाने के लिए वोट देंगे</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-0n_QDBJsB3c/TbWssqzRknI/AAAAAAAAAcE/c1pWq1G0k1M/s1600/transport.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 134px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-0n_QDBJsB3c/TbWssqzRknI/AAAAAAAAAcE/c1pWq1G0k1M/s200/transport.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5599571595108651634" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पश्चिम बंगाल में सुंदरबन डेल्टा के लगातार धंसते द्वीपों में से एक मौसुनी के लगभग 10 हजार मतदाता जब विधानसभा चुनाव के तीसरे दौर में अपना वोट डालने के लिए मतदान केंद्रों तक पहुंचेंगे तो बिजली, पानी और सड़क जैसे आधारभूत मुद्दे उनकी चिंता का विषय नहीं होंगे. यह लोग इस बार मौसुनी को बंगाल की खाड़ी में डूबने से बचाने की उम्मीद में वोट देंगे. दक्षिण 24-परगना जिले के मथुरापुर संसदीय क्षेत्र में बसे 24 वर्गकिलोमीटर में फैले इस द्वीप में बिजली, सड़क और पानी के दर्शन दुर्लभ हैं. लेकिन इस द्वीप के लोगों के लिए यह चुनाव वजूद की लड़ाई बन गया है. जिस तेजी से यह द्वीप समुद्र में समा रहा है उससे यह तय करना मुश्किल है कि यह कब तक बचेगा.&lt;br /&gt;इस द्वीप के गोपाल मंडल कहते हैं कि ‘हमें सड़क, पानी, बिजली या दूसरी कोई सुविधा नहीं चाहिए. हम चाहते हैं कि इस बार यहां से जीतने वाला विधायक इस द्वीप को बचाने के लिए समुद्र तट पर तटबंध बनवा दे.’ मंडल के परिवार के पास इस डूबते द्वीप पर रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. बीते साल कोई पांच सौ लोग यहां से सुरक्षित स्थानों पर जा चुके हैं. बीते साल अक्तूबर में द्वीप पर बना तीन किलोमीटर लंबा तटबंध टूट गया था. उसके बाद समुद्र के खारे पानी ने इलाके में खेत और उसमें खड़ी फसलों को लील लिया. अब खारे पानी के चलते वह जमीन उपजाऊ नहीं रही.&lt;br /&gt;समुद्र के बढ़ते जलस्तर की वजह से मौसुनी और घोड़ामारा जैसे द्वीप लगातार पानी में समा रहे हैं. मौसुनी के जलालुद्दीन कहते हैं कि ‘हमारे वोट बायकाट से भी कोई खास अंतर नहीं पड़ने वाला. इसलिए हम इस द्वीप को बचाने की उम्मीद में वोट दे रहे हैं. शायद जीतने वाला उम्मीदवार तटबंध बनवाने की दिशा में पहल करे.’ मथुरापुर संसदीय क्षेत्र का 60 फीसद हिस्सा सुंदरबन डेल्टा में है. वहां मौसुनी और घोड़ामारा जैसे डूबते द्वीपों से लोगों का पलायन लगातार बढ़ रहा है. घोड़ामारा द्वीप की आबादी पहले पांच हजार थी. लेकिन वहां अब डेढ़ हजार लोग ही बचे हैं. यह द्वीप नौ वर्गकिलोमीटर के मुकाबले बीते कुछ वर्षों में घट कर आधा रह गया है.&lt;br /&gt;इस बार सीपीएम और तृणमूल कांग्रेस ने इन द्वीपों को बचाने के लिए ठोस पहल करने का वादा तो किया है. लेकिन लोगों को उन पर भरोसा कम ही है. इलाके में ज्यादातर ग्राम पंचायतों पर तृणमूल कांग्रेस का कब्जा है. द्वीपों की  इस समस्या के लगातार गंभीर होने की जिम्मेवारी दोनों राजनीतिक दल एक-दूसरे पर डाल रहे हैं. मथुरापुर के तृणमूल सांसद और केंद्रीय मंत्री चौधरी मोहन जटुआ कहते हैं कि ‘इलाके के माकपा सांसद बासुदेव बर्मन ने पहले संसद में एक बार भी इन द्वीपों का मुद्दा नहीं उठाया. हम इसे बचाने का प्रयास कर रहे हैं.’ दूसरी ओर, सीपीएम नेता और सुंदरबन विकास मंत्री कांति गांगुली कहते हैं कि ‘इन डूबते द्वीपों की समस्या इतनी गंभीर है कि राज्य सरकार अकेले कुछ नहीं कर सकती. इस समस्या पर राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान दिया जाना चाहिए.’ दिलचस्प बात यह है कि इस इलाके में किसी भी पार्टी ने अपने चुनाव घोषणापत्र में सुंदरबन में होने वाले जलवायु परिवर्तन या डूबते द्वीपों का कोई जिक्र तक नहीं किया है. यहां भी खेती और औद्योगिकीकरण जैसे मुद्दे ही हावी रहे हैं.&lt;br /&gt;मौसुनी ग्राम पंचायत के सदस्य रामकृष्ण मंडल कहते हैं कि ‘पंचायतें इस समस्या से निपटने में सक्षम नहीं हैं. तटबंध बनाने में करोड़ों का खर्च है. इतना पैसा आएगा कहां से?’ इलाके के लोगों कि शायद इस बार कहीं से इस द्वीप को बचाने की कोई शुरूआत हो. ऐसा नहीं हुआ तो यह द्वीप पूरी तरह डूब जाएगा और यहां के लोग भी पर्यावरण के शरणार्थियों की लगातार बढ़ती तादाद में शामिल हो जाएंगे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-5367480583185159987?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/5367480583185159987/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2011/04/blog-post_25.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/5367480583185159987'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/5367480583185159987'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2011/04/blog-post_25.html' title='&lt;em&gt;&lt;strong&gt;डूबते द्वीप को बचाने के लिए वोट देंगे&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-0n_QDBJsB3c/TbWssqzRknI/AAAAAAAAAcE/c1pWq1G0k1M/s72-c/transport.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-331566447281893623</id><published>2011-04-25T22:41:00.002+05:30</published><updated>2011-04-25T22:44:57.643+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चुनाव बंगाल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='माकपा'/><title type='text'>अब मीडिया से भी दो-दो हाथ करने पर तुली माकपा</title><content type='html'>विधानसभा चुनाव में से हमारी लड़ाई तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस गठबंधन नहीं है। वह तो हमारे लिए ब्रेकफास्ट है। यानी हम उसे नाश्ते में ही चट कर जाएंगे। हमारी असली लड़ाई तो कुछ मीडिया घरानों से है। यह टिप्पणी है हाल के महीनों में माकपा के सबसे बड़े प्रवक्ता और झंडाफरमबदार के तौर पर उभरे आवासन मंत्री गौतम देव की। देव की इस हुंकार से साफ है कि अबकी माकपा ने मीडिया से भी दो-दो हाथ करने का मन बना लिया है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। यानी जबरा मारे और रोने भी न दे।&lt;br /&gt;राज्य में अबकी विधानसभा चुनाव हकीकत में घमासान साबित हो रहा है। सत्ता के दोनों दावेदारों में एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने की होड़ लगी है। इनमें वाममोर्चा की ओर से माकपा सबसे मुखर है। दूसरी ओर ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस हैं। गौतम देव को माकपा के आला नेताओँ का समर्थन भी हासिल है। ऐसा खुद उनका कहना है और माकपा जैसी अनुशासित पार्टी में ऐसा होना स्वाभाविक ही है। दरअसल, गौतम और उनकी पार्टी की नाराजगी हाल में एक बड़े मीडिया घराने की ओर से किया गया वह सर्वेक्षण है जिसमें वाममोर्चा के 294 में से महज 74 सीटों पर सिमटने की बात कही गई है और तृणमूल कांग्रेस गठबंधन को 215 सीटें दी गई हैं। माकपा नेता ने इस सर्वेक्षण को सिरे से ही खारिज कर दिया है। लेकिन इसके साथ वे अनजाने में अपना और अपनी पार्टी का डर भी बयान कर गए। उन्होंने कहा कि अगर इस सर्वेक्षण रिपोर्ट के चलते दो फीसद वोट भी इधर से उधर हो गए तो कुछ वोटर हाथ से निकल सकते हैं। इसके साथ ही वे यह जोड़ना भी नहीं भूले कि किसी भी मीडिया हाउस से उनकी जाती दुश्मनी नहीं है। यानी वे जो कुछ भी कह या कर रहे हैं वह माकपा के प्रदेश मुख्यालय अलीमुद्दीन स्ट्रीट के इशारे पर।&lt;br /&gt;कोलकाता प्रेस क्लब हर बार चुनावों के मौके पर तमाम राजनीतिक दलों के नेताओँ को बुलाकर प्रेस से मिलिए कार्यक्रम आयोजित करता है। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के अलावा तमाम दलों के प्रमुख नेता इसमें शिरकत कर चुके हैं। ममता ने लाख कोशिशों के बावजूद समय ही नहीं दिया। इसी सिलसिले में बारी थी गौतम देव की। तीन-चार महीने पहले महानगर से सटे राजारहाट इलाके में जमीन अधिग्रहण पर उभरे विवाद के बाद गौतम देव माकपा के सबसे बड़े प्रवक्ता के तौर पर उभरे हैं। वे बहस अच्छी कर लेते हैं और तार्किक तरीके से सबूतों और आंकड़ों के हवाले अपनी बात रखते हैं। लेकिन शनिवार को उन्होंने दो-टूक शब्दों में मीडिया और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए। &lt;br /&gt;यह एक खुला रहस्य है कि चुनावों के मौके पर तमाम राजनीतिक दलों की ओर से अपने पक्ष में प्रायोजित सर्वेक्षण कराए जाते रहे हैं। लेकिन अब तक किसी पार्टी ने इन सर्वेक्षणों के खिलाफ इतने उग्र तरीके से प्रतिक्रिया नहीं जताई थी। इस सर्वेक्षण के बहाने मीडिया को कटघरे में खड़ा करने के दौरान गौतम ने बस पेड न्यूज शब्द का इस्तेमाल नहीं किया। लेकिन इसके अलावा सब कुछ कह दिया। &lt;br /&gt;यह सही है कि बीते पांच-छह सालों के दौरान कोलकाता समेत पूरे बंगाल के मीडिया में जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ है। कोई वाममोर्चा के पक्ष में तटस्थ है तो कोई तृणमूल कांग्रेस के। इनमें से ज्यादातर तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में हैं। लेकिन एकाध चैनल और कुछ अखबार तो माकपा के पक्ष में भी जबरदस्त तरीके से लामबंद हैं। इन अखबारों में कई बार भारी बहुमत के साथ वाममोर्चा के सत्ता में लौटने की बात छप चुकी है। लेकिन विपक्ष ने कभी इनका विरोध या खंडन नहीं किया है। लेकिन अपने विरोध में पहला सर्वेक्षण छपते ही माकपा आक्रामक मुद्रा में नजर आ रही है। दिलचस्प बात यह है कि गौतम ने जितने जबरदस्त तरीके से सर्वेक्षण का विरोध किया, उस विरोध को रविवार को किसी अखबार ने छापने लायक ही नहीं समझा। उस समूह ने भी नहीं, जिसने इसे कराया और छापा था। माकपा के मुखपत्र गणशक्ति और उसके समर्थक कुछ अखबारों में यह खबर जरूर सुर्खियों में रही।&lt;br /&gt;अपनी उसी प्रेस कांफ्रेंस में गौतम ने तृणमूल कांग्रेस पर चुनावों में करोड़ों के कालेधन के इस्तेमाल होने का भी आरोप लगाया। उनकी दलील थी कि तृणमूल के एक के अलावा सभी उम्मीदवारों को पार्टी दफ्तर से 15-15 लाख रुपए दिए गए हैं। उनका कहना था कि वे उस एक उम्मीदवार का नाम नहीं बताएंगे। लेकिन मीडिया चाहे तो सीबीआई के पूर्व अधिकारी उपेन विश्वास से बात कर सकता है। चारा घोटाले की जांच के लिए चर्चित विश्वास तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर उत्तर 24-परगना जिले के बागदा से चुनाव मैदान में हैं। माकपा नेता ने पत्रकारों को उपेन विश्वास की मोबाइल नंबर भी दिया। उनकी सहूलियत के लिए। लेकिन बाद में उपेन विश्वास ने साफ कह दिया कि उनको तृणमूल की ओर से चुनाव खर्च के तौर पर न तो कोई पैसे दिए गए हैं और न ही कभी इस बारे में कोई बात हुई है।&lt;br /&gt;यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि माकपा फिलहाल आक्रमण ही बचाव का सबसे बेहतर तरीका है की कहावत पर चल रही है। ऐसे में एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने का दौर अभी और तेज होने का अंदेशा है। अब इसके साथ ही पार्टी ने मीडिया को भी लपेटे में ले लिया है। चुनावी बिसात पर बाजी बिछने से पहले ही माकपा मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी दबाब का खेल खेल रही है। यह लड़ाई चुनाव मैदान से बाहर की है। और गौतम देव के मुताबिक असली लड़ाई यही है। वरना उनके शब्दों में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस गठबंधन से मुकाबला तो उनके लिए महज ब्रेकफास्ट यानी नाश्ता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-331566447281893623?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/331566447281893623/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2011/04/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/331566447281893623'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/331566447281893623'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='&lt;em&gt;&lt;strong&gt;अब मीडिया से भी दो-दो हाथ करने पर तुली माकपा&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-1187875599667424878</id><published>2010-09-05T23:18:00.002+05:30</published><updated>2010-09-05T23:20:51.237+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पत्रकारिता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>चुनाव, प्रेस क्लब, पत्रकार</title><content type='html'>यह चुनाव भी बड़ी दिलचस्प चीज है. वह चाहे लोकसभा का हो या फिर प्रेस क्लब का. बीते आठ-दस दिनों से कोलकाता में प्रेस क्लब के चुनावों की गहमागहमी रही. सुबह से लेकर देर रात तक उम्मीदवारों के फोन, संदेश और ईमेल आते रहे. गुवाहाटी में प्रेस क्लब का सदस्य बना था. तब वहां बस बना ही था क्लब. वहां से कोलकाता आए दस साल से ज्यादा हो रहे हैं. लेकिन यहां के माहौल को देखते हुए कभी मन में सदस्यता लेने की इच्छा ही नहीं हुई. शाम ढलते ही पीने वालों की भीड़ जुटने लगती है. ऐसा नहीं है कि मैं शराब नहीं छूता. लेकिन अब तक न तो इसका आदी हुआ हूं और न ही कभी देर रात कर प्रेस क्लब में बैठ कर पीने के बाद लड़खड़ाते कदमों से घर लौटने की कोई इच्छा मन में उभरी है. दफ्तर से निकलने के बाद सीधे मेट्रो पकड़ता हूं. घर के लिए. यही वजह है कि अपने साथ काम कर चुके कई लोगों के कहने और दबाव डालने के बावजूद बीते साल तक इसका सदस्य नहीं बना. लेकिन बीते साल मार्च में आखिर बुझे मन से ही मैंने भी क्लब की सदस्यता ले ही ली. बीते अगस्त में पहली बार चुनाव में वोट डाला. उसके बाद कभी दोबारा सूरज ढलने के बाद क्लब का रुख नहीं किया था. &lt;br /&gt;इस साल यह चुनाव चार सितंबर को थे. लेकिन अगस्त के आखिरी सप्ताह से ही लगातार फोन आने लगे--भाई साहब, याद रखिएगा. सर, भूले तो नहीं हैं न. सर, मेरा नाम याद है न अमुक नंबर पर है. इनमें से ज्यादातर तो ऐसे थे जिनसे कभी औपचारिक परिचय नहीं रहा. कई बार तो हंसी भी आती थी यह सोच कर कि अरे भाई, जब तुमसे कोई परिचय ही नहीं है तो भूलने या याद करने का सवाल कहां से पैदा हो गया. खैर, प्रेस क्लब पहुंचा तो दरवाजे से ही उम्मीदवारों ने घेरना शुरू कर दिया. वहां यह देख कर और अच्छा लगा कि कल तक फोन पर याद रखने की बात कहने वाले शक्ल देख कर पहचान तक नहीं सके. उनके शब्दों में मैं प्रेस क्लब नियमित जाने वालों में नहीं था. सो, बेचारे शक्ल कैसे याद रखें. फोन नंबर तो प्रेस क्लब की डायरेक्टरी में दर्ज है. इसलिए वहां से मिल गया. दूसरों के परिचय कराने पर कुछ उम्मीदवारों ने लपक कर पर्ची पकड़ा दी. &lt;br /&gt;मतदान का समय शाम छह बजे तक था. वोट देने के बाद दफ्तर चला गया और रात को जब खाने-पीने के लिए लौटा तो तिल धरने की जगह नहीं थी. कई लोग आकंठ डूब चुके थे. कुछ डूबने की तैयारी में थे. कुछ पहले राउंड में हार के गम में पी रहे थे तो कुछ बढ़त हासिल करने की खुशी में. &lt;br /&gt;यह शराब भी बड़ी अजीब चीज है. इसे पीने तक तो ठीक है. लेकिन जब यह पीने लगती है तो लोग इसके लिए अपना दीन-ईमान और इज्जत तक घोल कर पी जाते हैं. किसी शाम क्लब में अगर आप हाथ में गिलास लेकर बैठें तो ज्यादा नहीं तो दो-चार लोग तो यह कहते हुए आपकी मेज पर आ ही जाएंगे कि अरे भाई साहब आपने वह खबर क्या जबरदस्त लिखी थी. कौन-सी खबर यह पूछने पर बगलें झांकते हुए कहते हैं कि अरे वही जो पहले पेज पर छपा था. यह बात अलग है कि उन्होंने शायद कभी कोई ऐसी खबर नहीं देखी होगी. अगर आपने बिठा लिया तो कहेंगे कि एक पैग मिलेगा. प्रेस क्लब नियमित जाने वाले ऐसे किस्से सुनाते रहते हैं. कभी कोई रिटायर पत्रकार मिल गया तो आपको भागने की जगह नहीं मिलेगी. वह अपने इतने संस्मरण सुनाएगा कि चाहे पूरी बोतल डकार लें, नशा हो ही नहीं सकता.&lt;br /&gt;अब किस्सों का क्या? तेजी से बदलते इस दौर में कई सहयोगी कहां से कहां पहुंच गए हैं. गुवाहाटी में साथ या प्रतिद्वंद्वी अखबारों में काम कर चुके कई सज्जन इनपुट और आउटपुट हेड बन गए हैं तो कुछ लाखों में कमा रहे हैं. यह सब किसी किस्से-कहानी से कम थोड़े लगता है. अभी हाल में एक पुराने सहयोगी ने फोन किया-फलां चैनल में आउटपुट हेड बन कर जा रहा हूं. बहुत मोटा पैकेज है. जहां तक मुझे याद है, जब तक मैंने देखा था उनका इनपुट घर के लिए सब्जियां खरीदना होता था और आउटपुट अपने दो महीने के बेटे को नहलाना-धुलाना और नैपी बदलना. बाकियों में प्रतिभा रही होगी, लेकिन इन सज्जन को तो मैंने दो-ढाई साल तक देखा था. जब भी मिले हमेशा बदहवास से, हड़बड़ी में. बाद में पता चला कि पत्नी एक-एक मिनट का हिसाब लेती थी कि इतनी देर कहां लगा दी. मुन्ना कब से रो रहा है. अब ऐसे इनपुट और आउटपुट प्रमुख होंगे तो चैनल की प्रगति तो तय ही है.&lt;br /&gt;कभी साथ रहे एक सज्जन तो इससे भी आगे बढ़ गए. एक प्रकाशन कंपनी के मालिक की बेटी से शादी कर खुद उस कंपनी के मालिक बन गए. जिनको कभी एक पैरा शुद्ध लिखना नहीं आता था वो अब दूसरों के लिखे में हजार किस्म की गलतियां निकालते रहते हैं. कभी मेरे तहत ट्रेनी के तौर पर काम करने वाले एक अन्य सहयोगी कभी-कभार फोन कर बताते हैं कि आपकी वह रिपोर्ट अच्छी थी. लेकिन उसमें यह एंगिल भी होता तो वह लाजवाब बन जाती. सबकी सुन लेता हूं. दिल्ली में नहीं रहता न. इसलिए लेखन में गलतियां स्वाभाविक हैं. सीख रहा हूं. कुछ प्रखर लोग इसे अंगुर खट्टे हैं....वाली कहावत दोहराते हुए कंधे भी उचका सकते हैं. मैंने अभी कंधे उचकाना नहीं सीखा है. शायद कभी दिल्ली जाने पर सीख लूं. तब तक तो जहां हूं जैसा हूं के आधार पर ही गाड़ी चलती रहेगी.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-1187875599667424878?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/1187875599667424878/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/09/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/1187875599667424878'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/1187875599667424878'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;चुनाव, प्रेस क्लब, पत्रकार&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-4130541024509025579</id><published>2010-08-11T22:53:00.002+05:30</published><updated>2010-08-11T22:54:13.534+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>शिरीन ने जीती बुर्के के खिलाफ जंग</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/TGLcsoRMKFI/AAAAAAAAAaM/FWVrv7PerXo/s1600/SIRIN+MIDDYA.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 140px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/TGLcsoRMKFI/AAAAAAAAAaM/FWVrv7PerXo/s200/SIRIN+MIDDYA.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5504204353882040402" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;चार महीनों तक चली खींचतान के बाद आखिर शिरीन मिद्या ने बुर्का पहन कर विश्वविद्यालय में पढ़ाने के छात्र संघ के फरमान के खिलाफ जंग जीत ली है. अब आलिया विश्वविद्यालय प्रबंधन ने उनको बिना बुर्का पहने ही मुख्य परिसर में पढ़ाने की अनुमति दे दी है. अब तक शिरीन विश्वविद्यालय के साल्टलेक परिसर में स्थित लाइब्रेरी में काम कर रही थी. शिरीन ने अब विश्वविद्यालय में बिना बुर्के के पढ़ाने के लिए अपनी सुरक्षा की मांग की है.&lt;br /&gt;राज्य का यह पहला मुस्लिम विश्वविद्यालय वर्ष 2008 में स्थापित हुआ था. विश्वविद्यालय के संविधान में बुर्का पहन कर पढ़ाने का कोई प्रावधान नहीं है. लेकिन मदरसा छात्र संघ ने सभी शिक्षिकाओं के लिए बुर्का पहनना अनिवार्य कर रखा है. शिरीन ने इसी साल मार्च में अतिथि लेक्चरर के तौर पर नौकरी शुरू की थी. अप्रैल के दूसरे सप्ताह में ही छात्र संघ ने उनसे कह दिया कि वे बिना बुर्का पहने छात्रों को नहीं पढ़ा सकती. विश्वविद्यालय की बाकी सात शिक्षिकाओं ने तो यह फरमान मान लिया था. लेकिन शिरीन ने इसके आगे घुटने टेकने से इंकार कर दिया था. इस मुद्दे पर विवाद रोकने के लिए विश्वविद्यालय प्रबंधन ने उनको दूसरे परिसर में बनी लाइब्रेरी में भेज दिया था. लेकिन उनको वेतन लेक्चरर का ही मिलता था.&lt;br /&gt;अब जुलाई के आकिरी सप्ताह से नया शिक्षण सत्र शुरू होने के बाद शिरीन ने वाइस-चांसलर से मुख्य परिसर में पढ़ाने की अनुमति देने का अनुरोध किया था. उन्होंने 31 जुलाई को वाइस-चांसलर को एक ई-मेल भेजा था और फिर दो दिन बाद उनको एक लिखित ज्ञापन सौंपा था. उसके एक सप्ताह बाद विश्वविद्याल प्रबंधन ने उनको पढ़ाने की अनुमति दे दी है.&lt;br /&gt;शिरीन कहती है, ‘विश्वविद्यालय प्रबंधन ने मुझे पढ़ाने की अनुमति तो दे दी है. लेकिन फिलहाल इसके लिए कोई तारीख नहीं बताई है कि मैं कब से मुख्य परिसर में पढ़ाने जा सकती हूं.’ वह कहती है कि पढ़ाने के लिए विश्वविद्यालय जाने पर मुझे सुरक्षा मिलनी चाहिए ताकि कोई अप्रिय स्थिति नहीं पैदा हो.&lt;br /&gt;इस मामले को तूल पकड़ते देख कर अब छात्र संघ ने भी कहा है कि शिक्षिका इस बात के लिए बिल्कुल स्वतंत्र है कि उसे क्या पहनना है. पश्चिम बंगाल मदरसा छात्र संघ के सचिव हसनुर जमान मानते हैं कि विश्वविद्यालय में ड्रेस कोड जैसा कोई नियम नहीं है. जमान के मुताबिक, मिद्या बिना वजह ही मीडिया के पास गई और इसे एक मुद्दा बना दिया.&lt;br /&gt;चार महीने से यह मामला ऐसे ही चल रहा था. लेकिन मीडिया में इसकी खबरें आने के बाद सरकार की नींद टूटी और उसने इस मामले की जांच के आदेश दिए. अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा के प्रभारी मंत्री अब्दुस सत्तार ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए वाइस-चांसलर से कहा कि मिद्या को पढ़ाने की इजाजत दी जानी चाहिए. सत्तार कहते हैं, ‘हम पहले ही यह नोटिस दे चुके हैं कि विश्वविद्यालय में कोई ड्रेस कोड नहीं है.’&lt;br /&gt;विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार शेख अशफ़ाक अली कहते हैं, ‘अब शिरीन पहले की तरह ही कलकत्ता मदरसा परिसर में छात्रों को पढ़ाएगी. इस समय दाखिले की प्रक्रिया चल रही है. इसलिए शिरीन के वहां जाकर पढ़ाने में कोई समस्या नहीं है.’&lt;br /&gt;शिरीन को बुर्का पहनने पर कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन कहती हैं कि वह ऐसा अपनी मर्जी से करेंगी, किसी की जोर-जबरदस्ती से नहीं. फिलहाल छात्र संघ के फ़रमान के &lt;br /&gt;खिलाफ पहली जंग तो उन्होंने जीत ही ली है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-4130541024509025579?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/4130541024509025579/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/08/blog-post_11.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/4130541024509025579'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/4130541024509025579'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/08/blog-post_11.html' title='&lt;em&gt;&lt;strong&gt;शिरीन ने जीती बुर्के के खिलाफ जंग&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/TGLcsoRMKFI/AAAAAAAAAaM/FWVrv7PerXo/s72-c/SIRIN+MIDDYA.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-3237988701238696641</id><published>2010-08-04T12:06:00.001+05:30</published><updated>2010-08-04T12:08:33.971+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्वास्थ्य'/><title type='text'>ताकि हर आंगन में गूंजे किलकारी</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/TFkK0BtigrI/AAAAAAAAAaE/KYA21iNAKrI/s1600/TEST+TUBE-4.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 142px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/TFkK0BtigrI/AAAAAAAAAaE/KYA21iNAKrI/s200/TEST+TUBE-4.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5501440308738687666" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आधुनिकता के इस दौर में भी भारतीय समाज में बांझपन को सबसे बड़ा अभिशाप समझा जाता है. अब टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक के रूप में इस अभिशाप से मुक्ति दिलाने के साधन तो मौजूद हैं. लेकिन इस तरीके से इलाज अब भी आम लोगों की पहुंच से बाहर ही है. ऐसे में कोलकाता के एक चिकित्सक ने यह तकनीक गरीबों तक पहुंचाने की दिशा में एक पहल की है.&lt;br /&gt;कोलकाता में टेस्ट ट्यूब तकनीक के अगुवा और घोष दस्तीदार इंस्टीट्यूट फार फर्टिलिटी रिसर्च के निदेशक डा. सुदर्शन घोष दस्तीदार ने इस दिशा में पहल करते हुए रेल मंत्री ममता बनर्जी को एक पत्र लिखा है. उन्होंने अपने पत्र की प्रतियां केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और दूसरे संबंधित विभागों को भी भेजी हैं. वे केंद्र सरकार की भारतीय चिकित्सा शोध परिषद की ओर से कृत्रिम प्रजनन तकनीक पर गठित विशेषज्ञ समिति और यूरोपियन सोसाइटी आफ ह्यूमन रिप्रोडक्शन के भी सदस्य हैं. उन्होंने अपनी इस पहल के बारे में यहां पत्रकारों को इसकी जानकारी दी.&lt;br /&gt;महानगर के विशेषज्ञों की राय में अब आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) यानी टेस्ट ट्यूब तकनीक से बच्चे पैदा करने के लिए भी काफी तादाद में विकसित देशों के लोग कोलकाता आ रहे हैं. यह हेल्थ टूरिज्म यानी स्वास्थ्य पर्यटन का नया पहलू है.भारतीय व खास कर कोलकाता के चिकित्सकों और उनकी काबिलियत के प्रति विदेशियों में आस्था बढ़ी है. इसके अलावा विदेशों के मुकाबले यह तकनीक यहां बेहद सस्ती है. विदेशों में जहां आईवीएफ तकनीक के जरिए गर्भधारण की प्रक्रिया पर 10 से 15 हजार डालर का खर्च आता है. वहीं यहां यह प्रक्रिया अधिकतम दो हजार डालर में पूरी हो जाती है.&lt;br /&gt;डा. घोष दस्तीदार, जिन्होंने वर्ष 1981 में इनफर्टिलिटी के क्षेत्र में शोध की पहल की थी, ने तीन साल पहले आरुषा (तंजानिया) ने आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में ही खासकर विकासशील देशों में गरीब तबके के लोगों तक आईवीएफ या टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक पहुंचाने की पुरजोर वकालत की थी. उन्होंने सम्मेलन में एक परचा भी पढ़ा था. उन्होंने बताया कि भारत जैसे विकासशील देश में तीन से चार करोड़ लोग बांझपन की बीमारी से पीड़ित हैं. समाज में उनको हेय नजरों से देखा जाता है. लेकिन अब यह साबित हो चुका है कि बांझपन एक बीमारी है. टेस्ट ट्यूब तकनीक से इसका इलाज संभव है. लेकिन यह तकनीक महंगी होने की वजह से ज्यादातर लोगों को इसका फायदा नहीं मिलता और वे इस अभिशाप को भोगने पर मजबूर हैं.&lt;br /&gt;डा. घोष दस्तीदार ने पत्र में लिखा है कि टेस्ट ट्यूब तकनीक में इस्तेमाल होने वाले 60 से ज्यादा उपकरण विदेशों से आयात किए जाते हैं. अगर केंद्र सरकार महज गरीबों के लिए इन पर आयात ड्यूटी की छूट दे दे तो यह तकनीक बेहद सस्ती और आम लोगों के पहुंच के भीतर हो सकती है. वे बताते हैं कि टेस्ट ट्यूब तकनीक में 50 से 80 हजार तक का खर्च आता है. अगर केंद्र सरकार आयात ड्यूटी में छूट दे दे तो यह खर्च घट कर आधा रह जाएगा. वे कहते हैं कि अब बांझपन को बीमारी मानते हुए इसको आंशिक तौर पर चिकित्सा बीमा के तहत शामिल किया जाना चाहिए. इससे देश को बांझपन से काफी हद तक निजात मिल सकती है. उन्होंने कहा कि बांझपन का इलाज सस्ता होने की स्थिति में देश में चिकित्सा पर्यटन को भी काफी बढ़ावा मिलेगा. इससे विदेशी मुद्रा की आय बढ़ेगी.&lt;br /&gt;उन्होंने पत्र में लिखा है कि बांझपन और इसके इलाज को राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में शामिल कर उसे तरजीह दी जानी चाहिए. तमाम सरकारी अस्पतालों में भी निजी क्षेत्र की सहायता से टेस्ट ट्यूब तकनीक की शुरूआत करनी चाहिए ताकि समाज के गरीब व कमजोर तबके के लोग इसका फायदा उठा सकें. फिलहाल एम्स के अलावा देश के किसी भी सरकारी अस्पताल में यह सुविधा उपलब्ध नहीं है.&lt;br /&gt;डा. घोष दस्तीदार ने बताया कि अब विश्व बैंक समेत कई संगठन विकासशील देशों में कम खर्च में आईवीएफ तकनीक को बढ़ावा देने वाली योजनाओं को सहायता देने में दिलचस्पी ले रहे हैं. उनका प्रस्ताव है कि धनी लोगों से तो पूरी रकम ली जाए. लेकिन गरीबों के लिए संबंधित उपकरणों के आयात में तमाम करों में छूट दी जाए.&lt;br /&gt;घोष दस्तीदार के संस्थान ने अब ऐसे मरीजों के लिए मुफ्त सलाहकार सेवा भी शुरू की है. इसके लिए sudarsan.ivf@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-3237988701238696641?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/3237988701238696641/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/08/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/3237988701238696641'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/3237988701238696641'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='&lt;em&gt;&lt;strong&gt;ताकि हर आंगन में गूंजे किलकारी&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/TFkK0BtigrI/AAAAAAAAAaE/KYA21iNAKrI/s72-c/TEST+TUBE-4.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-96439037879644882</id><published>2010-07-15T19:05:00.000+05:30</published><updated>2010-07-15T19:06:26.009+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भूली-बिसरी-3'/><title type='text'>वे दिन ही सबसे अच्छे थे</title><content type='html'>पत्रकारिता में लगभग 25 साल पूरे करने के बाद जब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो लगता है कि पूर्वांचल प्रहरी में बिताए दिन ही सबसे अच्छे थे. शुरूआती दिनों में जो टीम और टीम भावना बनी, वह आज कल दुर्लभ ही है. जाने कहां-कहां से आए लोग बहुत जल्द एक-दूसरे से ऐसे घुल-मिल गए मानों बरसों से जानते हों. मैंने भांगागढ़ में मकान लिया था. तब दो कमरों के उस असम टाइप मकान का किराया था छह सौ रुपए. बिजली के लिए साठ रुपए अलग से. सामान के नाम पर एक चौकी थी और बिस्तर. वहीं स्टोव खरीद कर गृहस्थी बसाने का काम शुरू हुआ. दफ्तर में काम करने वालों में कोई राजनीति या टांग खिंचाई नहीं. अब आज के माहौल में इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती. होली-दीवाली या कोई त्योहार हो, तमाम लोग सपत्नीक मेरे घर जुटते थे. पत्नी जनता स्टोव पर ही सबके लिए खाना बना देती थी बिना कोई उफ किए. लगभग सबकी शादी हाल में ही हुई थी. इसलिए किसी को बच्चा नहीं था. सो, सार्वजनिक छुट्टियों के दिन देर रात गए तक मेरे घर ही महफिल जमती थी.&lt;br /&gt;हां, पूर्वांचल प्रहरी और सेंटिनल के मालिकों में भले प्रतिद्वंद्विता हो, इन दोनों अखबारों में काम करने वाले लोगों में ऐसी कोई भावना नहीं थी. इसलिए मेरे घर दोनों अखबारों के लोग आते थे. सेंटिनल के सुधीर सुधाकर, मधु व जयप्रकाश मिश्र और उसके संपादक मुकेश जी भी. इनमें से ही एक थे सत्य नारायण मिश्र. उन्होंने तब जनसत्ता जैसे अखबार में लिखने के लिए मुझे काफी प्रोत्साहित किया था. उनके कहने पर मैंने खास खबर और खोज खबर जैसे स्तंभों के लिए कई लेख लिखे. उनसे कुछ अतिरिक्त आय भी हो जाती थी. तब जनसत्ता में ज्योतिर्मय जी इन स्तंभों के इंचार्ज थे. लेकिन मिश्र में कुछ अक्खड़पन भी था. एक बार उन्होंने अपना ब्लैक एंड व्हाइट टीवी मेरे घर रख दिया. यह कह कर कि मुझे तो देखने का समय नहीं मिलता. तुम लोग देखना. उनकी तब तक शादी नहीं हुई थी. दफ्तर के समय के बाद इधर-उधर घूमते रहते थे. टीवी मेरे घर रखने के बाद बाद लगभग रोज मेरे घर ही खाते रहे. लेकिन एक बार जब बीमारी के चलते पत्नी ने कुछ दिनों तक खाना नहीं बनाया खिलाया तो बोले अब मैं अपना टीवी घर ले जाऊंगा. तब लगा कि शायद वे इतने दिनों से टीवी का किराया वसूल रहे थे. वह तो भला हो उदय चंद्र आचार्य का. पूर्वांचल प्रहरी में काम करने वाले आचार्य ने अपने किसी परिचित से कह कर पहले मुझे एक टीवी दिलाया किश्तों पर. उसके बाद फिर एक टेप रिकार्डर भी दिलाया.&lt;br /&gt;तब एकमुश्त इतने पैसे नहीं होते थे कि पंखा खरीद सकूं. एक बार सेंटिनल के कार्यकारी संपादक मुकेश कुमार घर आए. उन्होंने कहा कि आखिर इतनी गर्मी में आप लोग पंखे के बिना रहते कैसे हैं. खैर, कुछ दिनों बाद किसी तरह जुगाड़ कर हमने एक पंखा खरीद लिया. पंखा खरीदने से एक रोचक किस्सा भी जुड़ा है. फैंसी बाजार से पंखा खरीदने के बाद मैंने सोचा कि बहुत गर्मी है. कहीं चल कर जूस वगैरह पिया जाए. पत्नी के साथ जूस की दुकान पर पहुंच कर दो गिलास मौसमी के जूस पिए. जब पैसे देने की बारी आई तो दुकानदार ने कहा चालीस रुपए हुए. इतना सुनते ही जूस का स्वाद फीका हो गया और गर्मी अचानक ही गायब हो गई. वह अफसोस बहुत दिनों तक रहा. बाद में सोचते रहे कि उन पैसों में यह आ सकता था या वह खरीद सकते थे. अब भी अक्सर हम उस वाकए का याद कर हंसते हैं.&lt;br /&gt;पूर्वांचल प्रहरी के पास ही सेवेंथ हैवेन नामक एक रेस्तरां था. कभी छुट्टी के दिन रात को जब खाना बनाने या घर का खाना खाने की इच्छा नहीं होती तो हम पति-पत्नी टहलते हुए वहीं चले जाते. पांच-पांच रुपए का डोसा खाकर हमारा डिनर हो जाता. और वह भी भरपेट. वेतन के तौर पर कुल मिला कर दो हजार रुपए मिलते थे. लेकिन महंगाई कम थी. मैं रोजाना दो रुपए लेकर दफ्तर जाता. उसमें से बारह आने या एक रुपया सिगरेट पर खर्च होता. एक सिगरेट तब पच्चीस पैसे में आती थी. पैदल दफ्तर जाने में सात-आठ मिनट लगते थे. कभी धूप तेज हो या बारिश हो रही हो तो रिक्शा ले लेता था. किराया था एक रुपए. लेकिन वह अखर जाता था.&lt;br /&gt;हमारे संपादक कृष्ण मोहन अग्रवाल भी बड़े खुले दिल के थे. अक्सर चाय या खाने पर घर बुलाते रहते थे. संपादक नहीं, सहयोगी की तरह व्यवहार करते. इससे अखबार में काम करने का मजा ही कुछ और था. अखबार हमारी रगों में बस गया था. इसलिए कई बार पत्नी के मायके जाने पर मैं सुबह 10-11 बजे ही दफ्तर चला जाता. भले ही मेरी ड्यूटी शाम या रात की शिफ्ट में हो. वहीं शर्मा जी की कैंटीन में खाना खा कर गप्पें लड़ाता रहता.&lt;br /&gt;पूर्वांचल प्रहरी में तब तक कई लड़कियां भी काम करने लगी थी. और हां, साल भर बाद बाहर से कुछ नए लोगों के आने के बाद राजनीति भी शुरू हो गई थी. इनकी चर्चा अगली बार.....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-96439037879644882?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/96439037879644882/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/07/blog-post_15.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/96439037879644882'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/96439037879644882'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/07/blog-post_15.html' title='&lt;strong&gt;वे दिन ही सबसे अच्छे थे&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-4055151503256404843</id><published>2010-07-08T18:33:00.000+05:30</published><updated>2010-07-08T18:34:37.381+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धोनी पुराण'/><title type='text'>बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना !</title><content type='html'>यह पुरानी कहावत बार-बार चरितार्थ होती रही है. इस बार इसे पूरी तरह नहीं बल्कि बुरी तरह चरितार्थ किया टीवी चैनलों ने. भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने सगाई और शादी क्या की, टीआरपी के लिए तरसते चैनलों की मानो बांछे ही खिल गईं. कई चैनलों के रिपोर्टर और एंकर तो इतने प्रसन्न नजर आए जितने शायद अपनी शादी में भी नहीं हुए होंगे. वैसे तो हर चैनल के पास तुर्रम खां टाइप खोजी रिपोर्टर हैं. लेकिन किसी को भी पहले से धोनी की सगाई की भनक तक नहीं लगी. बाद में भनक लगते ही सबमें एक-दूसरे को पछाड़ने की होड़ मच गई. एक से बढ़ कर एक्सक्लूसिव कहानियां थी सबके पास. और यह सिलसिला अब तक थमा नहीं है.&lt;br /&gt;हर चैनलों का दावा था कि धोनी की शादी की खबर तो उसके पास पहले से ही थी और यह भी शादी की तस्वीरें सिर्फ हमारे चैनल पर ही नजर आएंगी. सबके पास एक ही तस्वीरें थीं. कुछ एक समाचार एजंसी की तो कुछ स्थानीय फोटोग्राफरों की. किसी के पास दो सेकेंड का वीडियो फुटेज तक नहीं? भाई लोगों ने खाने के मेन्यू के अलावा घोड़ी, बाजे वाले, होटल के वेटर, टेंट वाले और मेंहदी वाले से एक्सक्लूसिव बातचीत दिखा दी. क्या करें, आखिर भरपाई करनी थी और दर्शकों को अपने भ्रमजाल में उलझाना जो था. सो, मेरी साड़ी तेरी वाली से सफेद की तर्ज पर सब अपनी पीठ खुद ठोकते रहे. इससे पहले अभिषेक बच्चन और एश्वर्या राय की शादी पर ही चैनलों के लोग स्वयंभू बाराती के तौर पर नजर आए थे. वर के पिता अमिताभ बच्चन ने तो खैर चैनल वालों को खाना-पीना भिजवा दिया था. लेकिन धोनी ने तो किसी को पानी तक नहीं पूछा. पानी तो दूर किसी कैमरे वाले को उस होटल के आसपास तक नहीं फटकने दिया जहां शादी होनी थी. अरे भाई, उससे क्या होता है. अपनों को कहीं न्योता दिया जाता है, इसी ब्रह्मवाक्य के सहारे तमाम चैनल अब्दुल्ला बन कर नाचने लगे. &lt;br /&gt;वैसे, निजी बातचीत में ढेर सारे खेल संपादक और रिपोर्टर धोनी से निजी संबंधों का दावा करते मिल जाते हैं. इस साल ईडेन गार्डेन में आपीएल मैचों को कवर करते हुए भी ऐसे दो-तीन सज्जन मिले थे. उनमें से दो की तो धोनी से सुबह-शाम बात होती थी. अब मेरे पास उनके मोबाइल की काल डिटेल तो थी नहीं. लेकिन कम से कम उन्होंने तो यही दावा किया था. बावजूद इसके उनको भी कार्ड नहीं मिला. यह तो सरासर नाइंसाफी है. ऐसे दोस्तों को शादी-ब्याह के मौके पर कोई भूलता है भला? अब इसकी खुन्नस तो निकालनी ही थी. आखिर समझा क्या है मीडिया को. शादी और सगाई की कोई फुटेज नहीं थी तो अब बात आगे कैसे बढ़ाएं. सबने राग पकड़ लिया कि टीम इंडिया में नाराजगी है, मतभेद हैं. इसलिए धोनी ने किसी को नहीं बुलाया. बुलाया भी तो कोई नहीं आया. कुछ चैनलों ने अपने खोजी रिपोर्टरों को धोनी के आगे के कार्यक्रम का पता लगाने के लिए दौड़ा लिया और उनकी मेहनत से बनाई रिपोर्ट को एक्सक्लूसिव की पट्टी के सहारे दिखाते हुए बताया कि धोनी अपने जन्मदिन पर मुंबई में रिसेप्शन आयोजित करेंगे. कोई कहने लगा कि दिल्ली में भी होगा. कोई रांची बता रहा था तो कोई कोलकाता. जितने चैनल उतने ही दावे. लेकिन धोनी शादी की अगली सुबह ही दिल्ली पहुंच गए. ठीक तमाम चैनलों की नाक के नीचे. किसी को खबर तक नहीं.&lt;br /&gt;चैनलों की धोनी का असली विजुअल तब मिला जब वे रांची पहुंचे. तीन-चार सेकेंड का वह विजुअल ही चलता रहा हर जगह. उसके बाद एक्सक्लूसिव के चक्कर में एक चैनल ने कथित तौर पर टीम इंडिया के कुछ खिलाड़ियों से बातचीत कर उनकी नाराजगी भी बता दी. पहले ‘आफ द रिकार्ड और नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा’ जैसी बातें प्रिंट मीडिया में ही चलती थी. अब चैनलों ने भी शुरूआत कर दी. नाम बताए बिना खिलाड़ियों की नाराजगी जता दी. यानी अब टीवी पर भी लोग आफ द रिकार्ड बोल सकते हैं. बढ़िया है. इससे कई और खबरें ब्रेक की जा सकती हैं.&lt;br /&gt;धोनी शादी के बाद लगातार यात्राएं करते रहे और दिल्ली के बाद रांची से कोलकाता आए. इसबीच, एक चैनल ने एक्सक्लूसिव बना दिया और एंकर गला फाड़ने लगे कि पांच हजार किलोमीटर का सफर करने वाले कप्तान श्रीलंका में टीम इंडिया को कैसे आगे ले जा सकते हैं. वे तो काफी थक चुके होंगे, श्रीलंका पहुंचते-पहुंचते. वह तो भला हो हरियाणा-पंजाब में बरसात और बाढ़ का, वरना किसी भी कीमत पर सबसे तेज खबरें देने का दावा करने वाले तमाम चैनल अब तक वेटर, कार के ड्राइवर, विमान के पायलट और न जाने किस-किस का इंटरव्यू कर चुके होते.&lt;br /&gt;चैनलों का यह धोनी पुराण कुछ कम तो हुआ है, लेकिन थमा नहीं है. अब श्रीलंका में अगर उनका प्रदर्शन जरा भी खराब होता है तो सब एक स्वर में शोर मचाएंगे कि हमने तो पहले ही कहा था कि थका-मांदा इंसान खेल कैसे सकता है. सच तो यह है कि अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद अब तक कोई भी चैनल धोनी के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकाल सका है. इसलिए तमाम चैनल अपने स्तर पर तमाम किस्से-कहानियां बना रहे हैं. पता नहीं अब तक किसी ने यह क्यों नहीं दिखाया है कि अब युवराज समेत तमाम क्रिकेटर, जिनको धोनी ने नहीं बुलाया था, भी अपनी शादी में धोनी को नहीं बुलाएंगे. हो सकता है, जल्दी ही यह कहानी भी आने लगे. &lt;br /&gt;तो देखते रहिए टेलीविजन पर हमारा खास कार्यक्रम. हम बताएंगे कि आखिर धोनी क्यों हैं टीम इंडिया के सभी खिलाड़ियों से नाराज.....और उन्होंने क्यों नहीं दी अपनी शादी का पार्टी....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-4055151503256404843?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/4055151503256404843/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/07/blog-post_08.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/4055151503256404843'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/4055151503256404843'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/07/blog-post_08.html' title='&lt;strong&gt;बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना !&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-1104509445016668097</id><published>2010-07-03T12:59:00.002+05:30</published><updated>2010-07-03T13:08:46.082+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भूली-बिसरी-2'/><title type='text'>नई जगह, नया अखबार, नए साथी</title><content type='html'>कर्मचारियों की हड़ताल के बाद आखिर सिलीगुड़ी में जनपथ समाचार बंदी के कगार पर पहुंच गया था. उसी समय गुवाहाटी से जी.एल.अग्रवाल वहां आए. वे गुवाहाटी से पूर्वांचल प्रहरी नामक एक हिंदी दैनिक निकालना चाहते थे और उनको पत्रकारों और कंप्यूटर आपरेटरों, जिनको तब कंपोजिटर कहा जाता था, कि जरूरत थी. वहां बात हुई और बात बन गई. उन्होंने हम लोगों को गुवाहाटी आने का न्योता दे दिया. घर में विचार-विमर्श करने के बाद मैंने भी गुवाहाटी जाने की हामी भर दी. पहले कई बार गुवाहाटी गया था. अक्सर कामाख्या मंदिर में दर्शन करने. बचपन की धुंधली यादें थी. लेकिन अब पहली बार नौकरी के लिए जा रहा था. हमारी टीम में छह-सात लोग थे. न्यू जलपाईगुड़ी से चलकर शाम को गुवाहाटी स्टेशन पर उतरे तो लगा कि कहां पहुंच गए. तब उग्रवाद चरम पर था. हर ओर, सेना और सुरक्षा बल के मुश्तैद जवान. अब तक ऐसी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच रहने या गुजरने की आदत जो नहीं थी. खैर, वहां से जीएल परिसर में पहुंचे. वहां कुछ देर बातचीत के बाद हमको दिसपुर स्थित हास्टलनुमा आवास में भेज दिया गया. जीएल ने वहीं सबके रहने की व्यवस्था की थी. मैं और सत्यानंद पाठक एक ही कमरे में जम गए.&lt;br /&gt;दूसरे दिन सुबह-सबरे नए उत्साह के साथ दफ्तर पहुंचे. वहां एक शर्मा जी कैंटीन चलाते थे. तीन से पांच रुपए में भरपेट भोजन. किसी मारवाड़ी ढाबे जैसे स्वादिष्ट खाना. सुबह नाश्ता, दिन में खाना और रात में वहीं से खाकर अपने कमरे पर. दफ्तर में कई नए साथियों से मुलाकात हुई. देश के कई हिस्सों से उभरते पत्रकार वहां पहुंचे थे. राकेश सक्सेना, अरुण अस्थाना, विवेक पचौरी, प्रशांत, फजल इमाम मल्लिक, जय नारायण प्रसाद उर्फ कुमार भारत समेत बाकी लोग थे. कइयों के नाम अब याद नहीं आ रहे. मुकेश कुमार वहां मुख्य उप-संपादक थे. (अब मौर्या टीवी में समाचार निदेशक) बेहद सरल स्वभाव. पहला दिन तो परिचय आदि में ही बीत गया. बीच-बीच में चाय-पानी का दौर. एक बड़ी से गोल मेज के चारों और तमाम लोग बैठ कर शुरूआती रूपरेखा के बारे में बातें कर रहे थे. हमारे संपादक थे कृष्ण मोहन अग्रवाल. थे तो गोरखपुर के लोकिन इलाहाबाद में अमृत प्रभात में लंबे अरसे तक काम किया था. बेहद सीधे-सादे तो थे ही एक पेशेवर फोटोग्राफर भी थे. एक से एक तस्वीरें खींची थी उन्होंने. हां, उनमें महिलाओं की तस्वीरें ही ज्यादा थीं. अब का दौर होता तो फैशन फोटग्राफर कहलाते.पहले दिन वहां का माहौल बेहद पसंद आया. उसके बाद यही दिनचर्या बन गई. रोजाना सुबह से शाम तक खबरें बनती और एडिट होती. &lt;br /&gt;यूं ही दिन बीतते रहे और अखबार के प्रकाश की तारीख टलती रही. इसबीच हमने डमी निकालना भी शुरू कर दिया. पहले 14 अप्रैल को बिहू के दिन अखबार निकलना था. वह टलता रहा. इसबीच, वहीं के एक प्रतिद्वंद्वी अखबार समूह सेंटिनल के मालिक को लगा कि यह बढ़िया मौका है. देश भर के पत्रकार यहां हैं तो क्यों न उनको तोड़ कर जीएल प्रकाशन से पहले ही अपना अखबार निकाल लिया जाए. तब उसके अंग्रेजी और असमिया अखबार थे. हां, खासी भाषा में भी एक अखबार निकलता था. बस, उसने मुकेश जी को पकड़ा और कार्यकारी संपादक बनने का प्रस्ताव दिया. मुकेश जी ने हम लोगों से बात की और हमारी आधी से ज्यादा टीम अगले दिन जीएल परिसर की बजाय सेंटिनल परिसर में पहुंच गई. पैसे ज्यादा मिल रहे थे. दो-तीन दिन वहां काम किया. अखबार के मालिक ने एक मकान में हमारे रहने की व्यवस्था की थी. लेकिन वहां पंखा नहीं था. अप्रैल के आखिर की गर्मी रात को सहना मुश्किल होता था. राजखोवा ने पहले दिन कहा था कि कल तक हर कमरे में पंखा लग जाएगा. लेकिन दूसरे दिन इस बात की याद दिलाने पर उसने कहा कैसा पंखा. वह आपलोग खरीद लीजिए. हमें झटका लगा. जब पहले ही अपनी बात से मुकर रहा है तो बाद में क्या होगा. पाठक जी और मैंने पूर्वांचल प्रहरी लौटने का फैसला किया. हमने वहां तब के महाप्रबंधक पुरकायस्थ से बात की और रातोंरात कार में अपना सामान समेट कर लौट आए. अबकी हमारा ठिकाना बना जीएल परिसर के पीछे ही एक मकान. वहां कई और लोग रहते थे. बाद में सेंटिनल पहले निकला और पूर्वांचल प्रहरी बाद में. यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि सेंटिनल शुरू से ही कभी पूर्वांचल प्रहरी को पछाड़ नहीं सका. लेआउट के मामले में बेहतर रहने के बावजूद. जीएल अग्रवाल ने इसबीच कई और लोगों को बुलवा लिया था बिहार और दिल्ली से. &lt;br /&gt;इन बाद में आने वालों में मनोरंजन सिंह उर्फ अपूर्व गांधी के अलावा अमरनाथ और ओंकारेश्वर पांडेय जैसे लोग थे जो प्रशिक्षु के तौर पर पटना से आए थे. इनके अलावा माया (इलाहाबाद) से आए प्रीतिशंकर शर्मा और कल्याण कुमार भी थे. कई संपादकीय सलाहकार भी आ गए. इनमें विनोदानंद ठाकुर थे तो बद्रीनाथ तिवारी (अब स्वर्गीय) भी थे. तिवारी जी हमारे पड़ोस के मकान में ही रहते थे. उनके साथ रहने कुछ दिनों के लिए रामदत्त त्रिपाठी (अब बीबीसी में उत्तर प्रदेश संवाददाता) भी आए. लेकिन वे कुछ महीनों में ही लौट गए. विनोदानंद ठाकुर तमाम लोगों को लिखने के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे. श्रीलंका में लिट्टे की समस्या पर संपादकीय पेज पर मेरा पहला अग्रलेख भी उन्होंने ही छापा था.&lt;br /&gt;अप्रैल में असम में बिहू बेहद धूमधाम से मनाया जाता है. पूरा राज्य लगभर एक सप्ताह तक इसके रंग में रंग जाता है. हमारे लिए बिहू नृत्य एक नया अनुभव था. दफ्तर से लौट कर हमने न जाने कितनी ही रातें बिहू नृत्य देखते हुए बिताईं. पाठख जी हमेशा साथ रहते थे.&lt;br /&gt;शुरूआती छह महीने बड़े तकलीफदेह रहे. सुबह 10-11 बजे दफ्तर पहुंचते थे और रात दो-ढाई बजे के पहले घऱ लौटना नहीं होता था. इतने तरह के लोग थे कि व्यवस्था बनाने में महीनों लग गए. बाद में चीजें धीरे-धीरे ढर्रे पर आने लगीं. इस दौरान पूर्वांचल से कई लोगों का सेंटिनल आना-जाना लगा रहा. उसी दौरान एक तीसरा हिंदी अखबार उत्तरकाल भी निकला जो घुनों के बल चलना सीखने से पहले ही असामयिक मौत का शिकार हो गया. वहां के कुछ लोगों को भी इन दोनों अखबारों में खपाया गया.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-1104509445016668097?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/1104509445016668097/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/07/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/1104509445016668097'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/1104509445016668097'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;नई जगह, नया अखबार, नए साथी&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-5840433497327314919</id><published>2010-06-30T12:14:00.000+05:30</published><updated>2010-06-30T12:15:28.815+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अतीत. यादें'/><title type='text'>होता है वही जो हम नहीं चाहते</title><content type='html'>अक्सर जीवन और रोजमर्रा के कामकाज में जाने-अनजाने वही सब हो जाता है जो हम नहीं चाहते. इसकी एक मिसाल काफी है. कई बार दुकान पर कपड़े या कोई सामान खरीदते समय हम दस में नौ बार वही सामान खरीद लेते हैं जो हमें कम पसंद होता है. खरीदने के बाद रास्ते भर अफसोस करते रहते हैं कि वो दूसरा वाला खऱीदा होता तो अच्छा होता. ऐसी न जाने कितनी ही घटनाएं होती रहती हैं जो जीवन की भागमभाग में मन से बिसर जाती हैं. मेरा पत्रकारिता में आना भी कुछ ऐसी ही घटना है. हां, लेकिन मुझे इसका कोई अफसोस नहीं है.&lt;br /&gt;अस्सी के दशक में उत्तरार्ध में मैं सिलीगुड़ी में रह कर इलेक्ट्रानिक्स का डिप्लोमा कर रहा था. स्कूल के दिनों का मेरा एक सहपाठी था. श्रवण कुमार अग्रवाल. उसका वहां सीमेंट का कारोबार था. हमने सिलीगुड़ी हिंदी स्कूल में कक्षा पांच से दसवीं तक पढ़ाई साथ ही की थी. अब भी हम लगभग रोज ही मिलते थे. सुबह हिंदी स्कूल के मैदान में सैर करना हमारी दिनचर्या बन गई थी. उससे दुनिया-जहान की तमाम बातों पर चर्चा होती थी. एक दिन उसने यूं ही कहा कि अरे भाई तुम्हारी हिंदी और अंग्रेजी इतनी अच्छी है. शाम को खाली समय भी है. तुम जनपथ समाचार में काम क्यों नहीं करते. उस समय सिलीगुड़ी से यही एक हिंदी अखबार निकलता था. अब भी यह नंबर वन है वहां. उसके मालिक हैं राजेंद्र बैद. तब उनका लड़का विवेक छोटा था. राजेंद्र बाबू ( सब लोग उको इसी संबोधन से पुकारते थे) ही सब काम देखते थे. श्रवण ने बात चलाई तो मैंने भी सोचा देखने में हर्ज ही क्या है. जंचा तो ठीक वरना अपने इलेक्ट्रानिक्स वाला रास्ता तो खुला ही है. &lt;br /&gt;खैर, श्रवण अगले दिन मुझे साथ लेकर राजेंद्र वैद के पास पहुंचा. उन्होंने मुझे एक पन्ना दिया. अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद के लिए. मैंने वहीं फौरन उसका अनुवाद कर दिया. अनुवाद देखते ही उन्होंने कहा कि कल से काम पर आ जाओ. चार सौ रुपए वेतन मिलेंगे. चार सौ रुपए तब बड़ी बात थी. मैंने हामी भऱ दी. अगले दिन ठीक समय पर काम पर पहुंच गया. उस दिन राजेंद्र बाबू ने मुझे मध्यकालीन इतिहास की एक पुस्तक थमा दी. वह अंग्रेजी में थी. राजेंद्र बाबू ने कहा कि तुम रोज इसका अनुवाद करोगे और वही पहले पेज की बाटम स्टोरी होगी. फिर क्या था. इतिहास के पन्नों से शीर्षक वह कालम चार रोज बाद से शुरू हो गया. वह कोई तीन महीने चला. इसबीच, मैंने पूरी किताब का अनुवाद कर दिया.&lt;br /&gt;उस समय दार्जिलिंग में अलग गोरखालैंड आंदोलन का दौर था. वहां एक साथी थे मनोज राउत. वे गोरखालैंड आंदोलन को शुरू से ही कवर करते आ रहे थे. वे बांग्ला में अपनी कापी लिखते थे. उसके अनुवाद का जिम्मा भी मेरे कंधों पर आ गया. राजेंद्र बाबू अक्सर कहते थे कि यार तुम इतनी जल्दी हाथ से इतने पेज कैसे लिख लेते हो. खैर, काम चलता गया, पांव जमते गए. मेरे आने से कुछ एकाध पुराने लोगों को दिक्कत होने लगी. एक साथी थे. उनका नाम नहीं लूंगा. अब संपादक पद पर पहुंच गए हैं. काम जानते तो थे. लेकिन परले दर्जे के आलसी और फांकीबाज. दफ्तर से एडवांस लेकर बैग समेत टूर के लिए निकलते और फिर घर चले जाते. वहां से दो दिनों बाद टूर पर जाते. लौट कर दो दिन घर पर आराम फरमाने के बाद दफ्तर आ जाते. बैग हाथों में होता था. यह जताने के लिए कि सीधे टूर से ही आ रहा हूं. उसके बाद थके होने की बात कह कर घर चले जाते थे. यानी उस दिन की भी छुट्टी.&lt;br /&gt;एक बार बड़ा मजेदार वाकया हुआ. वे दफ्तर से पैसे लेकर टूर के लिए निकले और अपनी आदत के मुताबिक घर पहुंच गए. अगले दिन उन्होंने राजेंद्र बाबू को बाकायद फोन पर बताया कि मैं सकुशल फलां जगह पहुंच गया हूं. लेकिन आधे घंटे बाद राजेंद्र बाबू किसी काम से निकले तो देखा वह सज्जन महानंदा ब्रिज पर पान चबाते हुए स्कूटर पर तफरीह कर रहे हैं. उनकी पोल खुल गई. इन तमाम चीजों के बावजूद दफ्तर से बाहर हम दोनों की दोस्ती बनी रही बल्कि और प्रगाढ़ हो गई थी.&lt;br /&gt;राजेंद्र वैद बड़े भुलक्कड़ थे. पान पराग बहुत खाते थे. हमेशा हाथ में बड़ा सा डिब्बा रखते थे. जब संपादकीय विभाग में आते थे तब भी. और दस में से नौ बार डिब्बा हमारी मेज पर छोड़ जाते थे. उनके जाते ही हम लोग टूट पड़ते उस डिब्बे पर. जिसको जितना मिला मुंह में दबा लेते थे. बाद में चपरासी से डिब्बा उन तक भिजवा देते थे. इसी तरह उन्होंने दर्जनों कलमें संपादकीय में छोड़ी होंगी. यह बात अलग है कि उनमें से कोई भी कलम दोबारा उन तक नहीं पहुंची. पैसे के मामले में दरियादिल. जितना एडवांस चाहिए, दे देते थे. फिर धीरे-धीरे वेतन में कटता रहता था. कई बार तो देकर काटना तक भूल जाते थे. वहीं रहते उन्होंने मुफ्त में नई साइकिल दिलाई और बाद में जमीन खरीदने के लिए रुपए भी दिए.&lt;br /&gt;जनपथ में काम करते दोस्ती तो बनी रही. लेकिन व्यस्तता की वजह से श्रवण कुमार से मुलाकातें कम हो गई थी. उसने मेरा परिचय अखबारी दुनिया से कराया था. इस बात के लिए मैं उसका हमेशा आभारी रहा. बाद में एक छोटी से घटना की वजह से दोस्ती टूट गई. एक दिन में हमेशा की तरह मैं उसके दफ्तर पहुंचा तो उसने कहा कि तुम अभी चले जाओ, मेरा भाई आ रहा है. उसकी यह बात सुनते ही मैं उल्टे पांव लौट आया. इस बात को 23-24 साल बीत गए. लेकिन मैंने दोबारा उसके दफ्तर में पांव नहीं रखा. आकिर मैं न तो कोई चोर-उचक्का था और न ही उससे कुछ मांगने गया था. बाद में गलती का अहसास होने पर उसने दर्जनों बार मेरे घऱ के चक्कर काटे. लेकिन न जाने क्यों दोबारा उसके दफ्तर की ओर जाने की इच्छा तक नहीं हुई. &lt;br /&gt;बाद में जनपथ समाचार में हड़ताल हुई. कर्मचारियों ने अखबार का प्रकाशान हाथ में ले लिया. हमने महीने भर तक आधे पैसों में काम कर के अखबार निकाला. उसी दौरान गुवाहाटी से जीएल अग्रवाल आए. वे वहां से हिंदी अखबार निकालना चाहते थे और इसी सिलसिले में आए थे. जनपथ की लगभग पूरी टीम ही उनके साथ पूर्वोत्तर की राह पर निकल पड़ी. यह मार्च, 1989 की बात है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-5840433497327314919?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/5840433497327314919/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/06/blog-post_30.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/5840433497327314919'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/5840433497327314919'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/06/blog-post_30.html' title='होता है वही जो हम नहीं चाहते'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-1735151445259084917</id><published>2010-06-25T23:50:00.003+05:30</published><updated>2010-06-26T11:19:42.394+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पुरी का समुद्रतट'/><title type='text'>अद्भुत है पुरी का समुद्र तट</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/TCTzt14UG2I/AAAAAAAAAZ0/wKI1ScLMFxg/s1600/PURI-2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/TCTzt14UG2I/AAAAAAAAAZ0/wKI1ScLMFxg/s200/PURI-2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5486778214927047522" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पहली बार कोई 17 साल पहले पुरी गया था. बिना किसी योजना के ही. वह महज एक संयोग था और उसके पीछे कोलकाता में रहने वाले एक रिश्तेदार की प्रेरणा थी. पत्नी के साथ इलाज के सिलसिले में सिलीगुड़ी से कोलकाता आया था. डाक्टर ने कोई जांच कराने को कहा था और उसकी रिपोर्ट सात दिनों के बाद आनी थी. अब समस्या यह कि क्या करें. सिलीगुड़ी लौट जाएं या कोलकाता में ही घर बैठे बोरियत से जूझते रहें. इसी उधेड़बुन में फंसा था कि उन रिश्तेदार ने ही हमारी मुश्किल आसान कर दी. यह कह कर कि आप लोग दो-चार दिनों के लिए पुरी क्यों नहीं घूम आते. घूमना भी हो जाएगा और तीर्थ भी. इसके अलावा समय का सदुपयोग भी हो जाएगा. यानी आम के आम और गुठली के दाम. उन्होंने ही होटल और पंडे का पता दे दिया. खैर, थोड़ी सी कोशिश के बाद पुरी जाने-आने का रिजर्वेशन भी हो गया. बस चल पड़े हावड़ा से जगन्नाथ एक्सप्रेस में बैठ कर पुरी की ओर.&lt;br /&gt;वह दिसंबर का महीना था. सिलीगुड़ी से हालांकि हम गर्म कपड़े और चादर वगैरह ले आए थे. लेकिन कोलकाता में सर्दी वैसे भी नहीं पड़ती. हमारे रिश्तेदार और मित्रों ने बताया कि पुरी में समुद्र होने की वजह से वहां भी सर्दी नहीं पड़ती. बस क्या था. हमने तमाम गर्म कपड़े कोलकाता में रख दिए और एक छोटी अटैची लेकर चल दिए. इसका अफसोस तो रास्ते में ट्रेन में तब हुआ जब सर्दी के मारे दांत बजने लगे. खैर, अपनी गलती पर खुद को मन ही मन डांटते हुए सुबह पुरी पहुंचे. स्टेशन के बाहर निकल कर पुरी होटल की बस में बैठ गए. वहां जाते ही कमरा भी मिल गया. ऐन समुद्र के सामने है पुरी होटल. कमरे की बालकनी से ही समुद्र की लहरें. दो-तीन दिन ठहर कर कोणार्क और दूसरे जगहों की सैर की. इतिहास में ही पढ़ा था कोणार्क. सूर्य मंदिर को सजीव देख कर मन मानो बरसों पहले स्कूली दिनों की ओर लौट गया.&lt;br /&gt;हमारी वह यात्रा यादगार थी. इसलिए भी वहां से लौटने के बाद ही मेरी पत्नी मां बनी. वहां रहते हमने जगन्नाथ मंदिर के भी दर्शन किए. हमारे पंडे का नाम था चकाचक पंडा. उसका पूरा नाम तो था चकाचक रामकृष्ण प्रतिहारी. लेकिन चकाचक पंडा के नाम से ही उसे सब जानते थे. अपने उत्तर भारतीय पंडों के उलट वहां लूट-खसोट वाली प्रवृत्ति नहीं है. जो दे दिया, पंडा उसी में खुश.&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/TCWU0xbHVVI/AAAAAAAAAZ8/3pP2h1xJXV4/s1600/PURI-3.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/TCWU0xbHVVI/AAAAAAAAAZ8/3pP2h1xJXV4/s200/PURI-3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5486955355361989970" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;उसके बाद कोई आठ-नौ साल पुरी नहीं जा सका. लेकिन तबादले पर कोलकाता आने के बाद बीते दस सालों में पांच बार पुरी हो आया हूं. एक बार तो नया साल भी वहीं मना चुका हूं. तब कोई सात दिन रहा था वहां. अब सबसे ताजा पुरी दौरे का कार्यक्रम बना जून के पहले सप्ताह में. अचानक. शादी की वर्षगांठ करीब थी. बेटी की कोचिंग की वजह से दो-तीन दिनों से ज्यादा समय नहीं निकलता था कि घर जाया जा सके. सो, पुरी जाने का कार्यक्रम बना लिया. होटल की भारी दिक्कत. पुरी में होटलों की तादाद जितनी बढ़ी है पर्यटकों की तादाद उससे कई गुना ज्यादा बढ़ गई है. दर्जनों फोन के बाद एक मित्र के जरिए होटल में कमरा मिल गया. पहले भुवनेश्वर पहुंचा. वहां कुछ देर आराम करने के बाद लिंगराज मंदिर होते हुए पुरी.&lt;br /&gt;पुरी का समुद्र हमेशा आकर्षित करता रहा है. यह पूर्वी भारत के सुंदरतम और साफ-सुथरे समुद्र तटों में से एक है. लेकिन अबकी समुद्र का मिजाज बदला हुआ लगा. पुरी होटल के सामने तो समुद्र अपने तट को ही खा गया था. वहां गहराई पहले के मुकाबले ज्यादा हो गई है. अभी बीते साल मार्च में वहां गया था तब ऐसा नहीं था. तब हमने वहां नहाते हुए घंटों बिता दिए थे. लेकिन अब वह जगह खतरनाक हो गई है. ग्लोबल वार्मिंग का असर यहां नजर आने लगा है. लहरें लौटते हुए अपने साथ जबरन भीतर खींचने का प्रयास करती नजर आईं. पहले मैं जिस स्वर्गद्वार इलाके को सुनसान मानता था वही अब गुलजार हो गया है. पुरी होटल या उसके आसपास कोई दूसरा होटल नहीं मिल पाने की वजह से मन में कुछ निराशा थी. लेकिन वह निराशा वहां जाकर दूर हो गई. अब तो जहां होटल था वहीं नहाने वालों की भीड़ थी सामने. रात को समुद्री वस्तुओं का बाजार भी वहीं लगता था.&lt;br /&gt;पहले दिन तो दोपहर को पहुंचवे के बाद होटल में खाना खाकर कमरे से ही समुद्री लहरों का नजारा लेते रहे. शाम को मंदिर की ओर निकले. दूसरे दिन शादी की वर्षगांठ थी. उस दिन सुबह-सुबह मंदिर में दर्शन करने के बाद भोग चढ़ाया. गर्मी काफी थी. ऐसे में मंदिर से लौटने के बाद समुद्र की ओर जाने की हिम्मत नहीं हुई. पहले कई बार तपते बालू पर अपने पैर जला चुका हूं. इस बार नहीं, मैने सोचा. तीसरे दिन वापसी थी. लेकिन ट्रेन रात को 11 बजे थी और पूरे दिन हमारे पास करने के लिए कुछ था नहीं. तड़के होटल से निकले सूर्योदय का नजारा देखने के लिए. लेकिन बादल ने सूरज को अपनी ओट में ढक रखा था. जब तक बादल छंटे, सूरज काफी ऊपर आ गया था. खैर, वहीं बैठ कर चाय पीते रहे. कुछ देर बाद होटल से कपड़े बदल कर नहाने पहुंचे. कोई घंटे भर नहाया. पत्नी और बेटी के साथ. लेकिन लहरें काफी तेज थीं. वह तो बाद में पता चला कि अंडमान में उसी दिन भूकंप आया था. शायद उसी का असर हो.&lt;br /&gt;शाम को भी हम घंटों समुद्र के किनारे घूमते रहे. पुरी की सुबह अगर खूबसूरत है तो शाम का भी कोई जवाब नहीं. बंगाली पर्यटकों की भरमार. खासकर समुद्री मछलियां बेचने वाले ठेलों और उड़ीसा हैंडलूम की दुकानों पर. पुरी जाने पर लगता है कि कोलकाता के ही किसी कोने में हैं. बस एक समुद्र भर का ही अंतर है.&lt;br /&gt;पुरी अब तक जितनी बार गया हूं, वहां की खूबसूरती से मन नहीं भरा है. हर बार, वापसी के दौरान दोबारा जल्दी ही लौटने का संकल्प मन ही मन दोहराते हुए आता हूं. लेकिन अब तो शायद अगले कम से कम दो साल कहीं जाना संभव ही नहीं, बिटिया 11वीं में है. उसका स्कूल, कोचिंग और सौ सांसरिक झमेले. लेकिन जब भी मौका मिला, जल्दी ही जाऊंगा. समुद्र में नहाने नहीं, तो वहां उस पर ग्लोबल वार्मिंग का असर देखने.कोलकाता से सात-आठ घंटे का ही तो सफर है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-1735151445259084917?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/1735151445259084917/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/06/blog-post_6095.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/1735151445259084917'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/1735151445259084917'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/06/blog-post_6095.html' title='&lt;strong&gt;अद्भुत है पुरी का समुद्र तट&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/TCTzt14UG2I/AAAAAAAAAZ0/wKI1ScLMFxg/s72-c/PURI-2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-1736206289626072967</id><published>2010-06-04T12:57:00.004+05:30</published><updated>2010-06-04T13:01:12.236+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><title type='text'>माकपा अब घटक दलों के भी निशाने पर</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/TAirJSBoyZI/AAAAAAAAAZE/VRuBI41bm0c/s1600/BIMAN+BASU+CPIM+SEC..jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 132px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/TAirJSBoyZI/AAAAAAAAAZE/VRuBI41bm0c/s200/BIMAN+BASU+CPIM+SEC..jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5478817122642086290" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पश्चिम बंगाल के शहरी निकाय के लिए हुए चुनाव में जबरदस्त हार से माकपा सकते में है. नतीजों के एलान के चौबीस घंटे बाद भी वह इस सदमे से उबर नहीं सकी है. लेकिन इस हार के बावजूद माकपाइयों के तेवर ढीले नहीं पड़े हैं. यानी रस्सी भले जल गई हो, उसकी ऐंठन नहीं गई है. उसका दावा है कि पार्टी का प्रदर्शन उतना खराब नहीं रहा है. वैसे, माकपा के दिग्गज नेता भले कुछ भी दावा करें, हकीकत यह है कि इतनी करार हार का उनको कोई अंदेशा नहीं था.  जिन 81 नगरपालिकाओं के लिए चुनाव हुए उनमें से 54 पर वामपंथियों का कब्जा था. लेकिन अब उसकी झोली में इनमें से सिर्फ 17 ही आई हैं. शायद इसलिए नतीजों के एलान के बाद मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की बोलती बंद हो गई.  इस चुनावी सदमे से पंगु बनी माकपा पर अब वाममोर्चा के उसके सहयोगी भी हमला करने लगे हैं. उन्होंने इस हार का ठीकरा माकपा के सिर पर ही फोड़ा है.&lt;br /&gt;इन नतीजों के बाद माकपा के प्रदेश सचिव विमान बसु ने एक बार फिर हार की वजहों की समीक्षा करने और आम लोगों से बढ़ी दूरी कम करने की बात कही है. वैसे, उन्होंने बीते साल लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद भी यही कहा था. लेकिन इन नतीजों से साफ है कि माकपा और वोटरों के बीच की दूरी घटने की बजाय और बढ़ गई है. गुरुवार को हार की वजहों की समीक्षा के लिए आयोजित प्रदेश माकपा सचिव मंडल की बैठक में भी कोई ठोस चर्चा नहीं हो सकी. इसमें शामिल कुछ नेता अपने-अपने तर्क देते रहे. लेकिन ज्यादातर तो सुझाव के नाम पर बगलें ही झांकते रहे. बैठक में शामिल एक नेता ने बताया कि बैठक के दौरान माहौल गमगीन रहा. तमाम नेताओं की बोलती बंद थी.&lt;br /&gt;शहरी निकाय चुनाव में हार का सदमा अभी कम नहीं भी हुआ है कि वाममोर्चा में उसके दो सहयोगी दलों ने इस हार के लिए सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और राज्य सरकार की गलत नीतियों को जिम्मेवार ठहराते हुए माकपा को कटघरे में खड़ा कर दिया है. आरएसपी नेता और राज्य के लोक निर्माण मंत्री क्षिति गोस्वामी ने कहा है कि जनादेश बदलाव के पक्ष में है. चुनावी नतीजों से यह बात शीशे की तरह साफ हो गई है. उन्होंने आरोप लगाया कि लंबे अरसे तक सत्ता में रहने की वजह से वाममोर्चा के कई वर्गों में भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया है.&lt;br /&gt;आरएसपी नेता ने कहा कि माकपा वाममोर्चा की सबसे बड़ी घटक है. इसलिए हमारे मुकाबले उसमें भ्रष्टाचार की जड़ें भी ज्यादा गहरी हैं. उधर, मोर्चा की एक अन्य घटक वेस्ट बंगाल सोशलिस्ट पार्टी ने कहा है कि वर्ष 1977 से लगातार सत्ता में रहने की वजह से वाममोर्चा ने लोगों का भरोसा खो दिया है. पार्टी के नेता और मत्स्य पालन मंत्री किरणमय नंद ने कहा कि वर्ष 2008 के पंचायत चुनाव से ही आम लोग हमारे खिलाफ हैं. इसलिए मौजूदा हालात में इससे बेहतर नतीजों की उम्मीद नहीं की जा सकती. उन्होंने कहा कि सरकार की गलत नीतियों और आम लोगों के प्रति माकपा की बेरुखी ने ही निकाय चुनाव में वामपंथियों की लुटिया डुबो दी. हमने लोगों का भरोसा खो दिया है.&lt;br /&gt;नंदा ने कहा कि बीते साल लोकसभा चुनाव में मोर्चा की दुर्गति के बाद उन्होंने सरकार के इस्तीफा देकर नए सिरे से जनादेश हासिल करने का सुझाव दिया था. लेकिन मेरा वह प्रस्ताव तब खारिज कर दिया गया था. गोस्वामी व नंदा विभिन्न मुद्दों पर पहले भी सरकार और माकपा की गलत नीतियों के खिलाफ मुखर रहे हैं.&lt;br /&gt;शहरी निकाय के चुनावी नतीजों ने माकपा के दिग्गज नेताओं के तमाम पूर्वानुमान व समीकरण गड़बड़ा दिए हैं. चुनाव से पहले कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस के बीच कोई तालमेल नहीं होने से माकपाई बेहद खुश थे. उनका सीधा हिसाब था कि इससे वाम-विरोधी वोटों का विभाजन होगा और वामपंथियों का बेड़ा पार हो जाएगा. लेकिन वे शायद भूल गए कि राजनीति में हमेशा दो और दो चार नहीं होता. अब हर चुनाव की तरह इस बार भी माकपाई हार की वजह की समीक्षा और लोगों के नजदीक जाने का पुराना राग ही अलाप रहे हैं. लेकिन पार्टी के भ्रष्ट नेताओं व कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई के सवाल पर पार्टी ने अब तक चुप्पी साध रखी है. बीते साल लोकसभा चुनाव के बाद उसने ऐसे नेताओं से पल्ला झाड़ कर पार्टी की छवि सुधारने के लिए शुद्धिकरण अभियान चलाने का फैसला किया था. लेकिन पार्टी के ही एक गुट के दबाव में उस फैसले को ठंढे बस्ते में डाल दिया गया. अब लाख टके का सवाल यह है कि क्या माकपा अतीत की गलतियों से कोई सबक लेगी. फिलहाल तो इसकी उम्मीद कम ही नजर आती है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-1736206289626072967?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/1736206289626072967/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/06/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/1736206289626072967'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/1736206289626072967'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;माकपा अब घटक दलों के भी निशाने पर&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/TAirJSBoyZI/AAAAAAAAAZE/VRuBI41bm0c/s72-c/BIMAN+BASU+CPIM+SEC..jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-3124729759562509617</id><published>2010-05-31T00:14:00.000+05:30</published><updated>2010-05-31T00:15:16.417+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अतीत. यादें'/><title type='text'>वो प्यार नहीं कुछ और था</title><content type='html'>बरसों पुरानी बात है. बल्कि तीन दशक पुरानी. लेकिन सोचता हूं तो लगता है कि अभी कल की ही हो. वर्ष 1978 में सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) से हाईस्कूल की परीक्षा पास करने के बाद पढ़ने के लिए अपने माम के घर देवरिया पहुंचा. मेरे मामा देवरिया में खूखुंदू स्थित शिवाजी इंटर कालेज में पढ़ाते थे. वहीं दाखिला लिया. बड़े ही मजे में गुजरे दो साल. कई नए दोस्त मिले. शहर से जाने के बाद गांव का माहौल बेहद पसंद आया. मामा के पास काफी जमीन थी. वहां अरहर, धान और गन्ने के खेत में घूमना-काटना, कंपकपाती ठंढ में गेहूं की फसल में पानी चलाना यानी सिंचाई करना, यह सब वहीं सीखा. हम लोग (मेरे कई सहपाठी भी थे) रोजाना सोलह किलोमीटर साइकिल चलाकर कालेज जाते थे. कई बार तो स्कूल से ही सीधे देवरिया चले जाते थे. और वहां फिल्मे देख कर गांव लौटते थे. यानी दिन भर में औसतन 50 किलोममीटर तक साइकिल चलती थी. वहां दो साल कैसे बीत गए, यह पता ही नहीं चला और इंटर की परीक्षा के लिए फार्म भरने का समय आ गया. मैंने भी दूसरों के साथ फार्म भरा. &lt;br /&gt;मामा के वरिष्ठ शिक्षक होने की वजह से कालेज का सारा स्टाफ मुझे दूसरी नजर से देखता था. वैसे, मैं छात्र जीवन में बेहद अनुशासित भी था. तो इस वजह से कालेज के कार्यालय से लेकर प्रिसिंपल के आफिस तक मेरी पहुंच थी. नर्बदेश्वर मिश्र उन दिनों वहां प्रिंसिपल हुआ करते थे. हां, पूरे इंटर में हमारे बैच में एक ही लड़की पढ़ती थी. उसका नाम लेना यहां ठीक नहीं होगा. हम सबकी तरह उसने भी परीक्षा का फार्म भरा था. मेरे दोस्तों को न जाने क्या सूझी कि उन्होंने मुझे एक दिन चुनौती दे दी. उन्होंने कहा कि बड़े तीसमार खां बनते हो तो उस लड़की की फोटो उसके फार्म से निकाल कर दिखाओ. मैंने भी हामी भर ली. और अपने मामा के शिक्षक होने की वजह से अपनी पहुंच का फायदा उठाते हुए फाइल से उस लड़की की तस्वीर नोच ली. शर्त तो मैं जीत गया. लेकिन अगले ही दिन पूरे कालेज में हड़कंप मच गया. फार्म से फोटो आखिर कैसे गायब हो गई. वह लड़की उसी गांव के एक बड़े व्यक्ति की रिश्तेदार थी जहां हमारा कालेज था. कालेज के प्रिसिंपल से लेकर सारा स्टाफ सन्न. आखिर उसे यह बात बता कर दोबारा फोटो कैसे मांगी जाए. &lt;br /&gt;मैंने वह फोटो निकाल कर मामा के घर ही अपने सूटकेश में रख दी थी और उसे एक छोटी घटना मानकर भूल भी गया था. लेकिन मेरे मामा को न जाने कैसे मुझ पर शक हो गया. उन्होंने मेरा सूटकेश चेक किया और वह फोटो ले जाकर कालेज में दे दी. कालेज की इज्जत को बच गई, लेकिन मेरी इज्जत के परखचे उड़ गए. खैर, वह तो मुझे बाद में पता चला. वह भी तब जब मेरी मामी ने मुझसे पूछा कि आपने कालेज की किसी लड़की की फोटो रखी थी सूटकेश में. मामा की सज्जनता का आलम यह कि उन्होंने न तो उस समय उस बात की मुझसे कोई चर्चा की और न ही बाद में कभी इस बारे में जिक्र किया.&lt;br /&gt;बाद में कालेज के दोस्त मुझे उस लड़की और फोटो वाला प्रसंग लेकर चिढ़ाते भी रहे. लेकिन अब पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि वह प्यार नहीं था. प्यार होता तो उस फोटो को मैं अपनी जेब में रखता सूटकेश में नहीं. और फिर 16 साल की उम्र में जब इंटरनेट और टेलीविजन की कौन कहे, रेडियो भी नहीं था तो प्यार-मोहब्बत का ख्याल तक दिल में नहीं आ सकता था. अब सोचता हूं तो अपनी उस बचकानी हरकत पर हंसी आती है. लेकिन साथ ही एक खुशी भी होती है. इस बात पर कि मैं अपने दोस्तों से एक रुपए की शर्त जीत गया था. तीस साल पहले एक रुपए बहुत होते थे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-3124729759562509617?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/3124729759562509617/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/05/blog-post_31.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/3124729759562509617'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/3124729759562509617'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/05/blog-post_31.html' title='&lt;strong&gt;वो प्यार नहीं कुछ और था&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-4888395377154870974</id><published>2010-05-30T23:49:00.000+05:30</published><updated>2010-05-30T23:50:40.771+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अतीत. यादें'/><title type='text'>शादी के बाद अकेले होने का फायदा</title><content type='html'>कई बार अकेला होना भी अच्छा लगता है. खासकर शादी के बाद. इन दिनों पत्नी और बेटी रांची में हैं. मेरी बड़ी साली की तीसरी बेटी की शादी है. मैं तो जा नहीं सका. बंगाल में शहरी निकायों के चुनाव थे आज. इनको अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल कहा जा रहा था. सो, मेरा जाना संभव नहीं था. वैसे, मेरी इन साली की बेटियों की शादी हमेशा उसी समय होती है जब कहीं न कहीं कोई चुनाव होते हैं. मसलन पहली बेटी की शादी के समय बंगाल में विधानसभा चुनाव थे. वर्ष 2001 में. खैर, पहली शादी थी. किसी तरह गया. दो-तीन दिनों के लिए. उसके बाद दूसरी बेटी की शादी भी हुई 2006 में. तब भी बंगाल में विधासनसभा चुनाव थे. नहीं जा सका. पत्नी और बेटी ही गई थी पटना. और इस बार भी यही हुआ. शनिवार को पत्नी और बेटी को रांची शताब्दी पर चढा़ कर घर लौटा तो अचानक कई काम नजर आने लगे.&lt;br /&gt;लेकिन अकेले रहने का फायदा यह है कि आप घर में अक्सर कुछ ऐसी फिल्में भी देख लेते हैं जिनको देखने के लिए कभी सिनेमाहाल या मल्टीप्लेक्स में जाना संभव नहीं होता. पत्नी और बेटी के रहते मैं मूक-बधिर फिल्में देखने का आदी हो गया हूं. यानी रात को जब फिल्में देखता हूं तो इस डर से आवाज बंद रखता हूं कि उनकी नींद खऱाब न हो जाए. वह तो भला हो स्टार मूवीज वालों का कि नीचे अंग्रेजी में सब-टाइटिल्स दे देते हैं. लेकिन अकेले होने पर आप वाल्यूम जितना चाहें बढ़ा सकते हैं. तो इसी क्रम में मैंने आज यानी रविवार को वेकअप सिड देखी. गजब की फिल्म है यह. &lt;br /&gt;जीवन में दोस्त तो कम ही मिले हैं. जो मिले भी हैं वे मुझे समझ नहीं सके. जिन दो-चार लोगों ने समझा था वो अब मेरे दोस्त नहीं रहे. मेरी नहीं, बल्कि उनकी अपनी गलती की वजह से. मेरी इच्छाओं, जरूरतों और दुख-सुख से किसी को कोई खास मतलब नहीं रहा. हालांकि मैंने अपने करीबियों की खुशी का हमेशा ध्यान रखा है. कभी सोचता हूं तो दुख होता है. लेकिन लगता है कि यही तो दुनिया की रीति है. इसका बुरा क्या मानना. कुछ दोस्त जिनको मैं अपना मानता था वे अब मेरे अपने नहीं रहे. दो-एक बढ़िया दोस्तों से बरसों से मुलाकात ही नहीं हो सकी. न जाने वे कहां हैं. पहले तो फोन और मोबाइल भी नहीं होता था. ई-मेल आदि की कौन कहे. अब मद्रास के एक दोस्त से शायद 25 साल बाद इस साल दुर्गापूजा के दौरान मुलाकात हो जाए. कौन जाने क्या होगा. इलाहाबाद पालीटेकनिक में मेरे साथ रहे रवि प्रताप साही और मद्रास में रूम पार्टनर रहे हेमंत वषिष्ठ बहुत याद आते हैं. इसी तरह सिल्चर वाला निर्मल भौमिक भी. लेकिन उनका कोई पता-ठिकाना नहीं है मेरे पास. शायद कहीं मिलना हो. जैसे इतने साल गुजरे, वैसे ही उनकी यादों के सहारे कुछ साल और सही.यादें ही तो जीने का सहारा होती हैं. किसी ने सच ही कहा है कि अतीत चाहें कितना भी दुखद हो, उसकी यादें मीठी होती हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-4888395377154870974?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/4888395377154870974/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/05/blog-post_30.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/4888395377154870974'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/4888395377154870974'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/05/blog-post_30.html' title='&lt;strong&gt;शादी के बाद अकेले होने का फायदा&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-5352837972582844535</id><published>2010-05-08T17:09:00.001+05:30</published><updated>2010-05-08T17:10:46.755+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्म'/><title type='text'>रे की कहानी को परदे पर उतारेंगे संदीप</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S-VNsdXoNnI/AAAAAAAAAYo/q0nqn-ldZd4/s1600/satyajit-1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 173px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S-VNsdXoNnI/AAAAAAAAAYo/q0nqn-ldZd4/s200/satyajit-1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5468862748704650866" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बांग्ला सिनेमा को एक नई पहचान दिलाने वाले स्व. फिल्मकार सत्यजित रे की मशहूर फेलूदा सीरिज़ की अगली कड़ी जल्दी ही परदे पर नजर आएगी. इस महान फिल्मकार के पुत्र संदीप रे, जो खुद भी जाने-माने निर्देशक हैं, ने अपने पिता की जयंती के मौके पर यह एलान किया है. सत्यजित रे अगर जीवित होते तो दो मई को उम्र के नौवें दशक में कदम रखते. सत्यजित ने फेलूदा सीरिज़ के जासूसी उपन्यास और लघु कहानियां लिखी थीं. उन्होंने अपनी कहानियों और फिल्मों में फेलूदा नामक जासूस के चरित्र को अमर कर दिया था. अब संदीप उनकी इस परंपरा को आगे बढ़ाएंगे. वे इसे अपने पिता और इस महान फिल्मकार के प्रति श्रद्धांजलि मानते हैं.संदीप कहते हैं कि ‘हमने फेलूदा सीरिज के मशहूर उपन्यास गोरोस्थाने सावधान (कब्रिस्तान में सावधान) पर फिल्म बनाने का फैसला किया है. इसकी शूटिंग अगले महीने शुरू होगी. यह फेलूदा सीरिज़ की लोकप्रिय कहानियों में से एक है.’&lt;br /&gt;इससे पहले फेलूदा सीरिज़ की ‘सोनार केल्ला (सोने का किला)’, ‘जय बाबा फेलूनाथ’, ‘बोंबेर बोंबेटे (बंबई के डकैत),’ ‘कैलाशे केलेंकारी (कैलाश पर अफरातफरी)’ समेत कुछ कहानियों पर बनी फिल्में काफी सफल रही हैं. ‘सोनार केल्ला’ और ‘जय बाबा फेलूनाथ’ का निर्देशन तो खुद सत्यजित रे ने ही किया था. बाकी फिल्मों का निर्देशन उनके पुत्र संदीप ने किया था. फेलूदा सीरिज़ की कई कहानियों पर टेलीविजन धारावाहिक भी बन चुके हैं.‘पथेर पांचाली (सड़क का गीत)’ जैसी सदाबहार फिल्मों के जरिए भारतीय सिनेमा को एक नई राह दिखाने वाले रे की जयंती के मौके पर कोलकाता में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया गया. तमाम स्थानीय टीवी चैनलों ने रे को श्रद्धांजलि के तौर पर उनकी फिल्मों का प्रसारण किया. कुछ चैनलों ने इस मौके पर विशेष कार्यक्रमों का भी प्रसारण किया.संदीप कहते हैं कि ‘गोरोस्थाने सावधान’ के बाद वे अपने पिता के विज्ञान उपन्यास प्रोफेसर शोंकू के अभियान पर भी एक फिल्म का निर्देशन करना चाहते हैं.  अगले दो साल में ऐसा करने की योजना है. रे ने अपनी पहली तीन फिल्मों- पथेर पांचाली, अपराजिता और अपूर संसार के जरिए बांग्ला सिनेमा में संभावनाओं की नई राह खोल दी थी. उसके बाद उन्होंने ‘देवी’ और ‘जलसाघर’ बनाई थी. वर्ष 1977 में प्रेमचंद की कहानी पर बनी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ के जरिए भारतीय सिनेमा की मुख्यधारा के दर्शकों से उनका परिचय हुआ. अपनी हर फिल्म से रे नई ऊंचाईयां छूते रहे. वर्ष 1992 में उनको लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड से भी सम्मानित किया गया. तब तक रे की फिल्में फिल्म प्रशिक्षण स्कूलों में पाठ्यक्रम का हिस्सा बन चुकी थी. नए निर्देशक भी उनसे प्रेरणा लेते थे. ऐसे निर्देशकों में कुमार साहनी, मणि कौल, अदूर गोपालाकृष्णन और श्याम बेनेगल शामिल हैं. रे को भारतरत्न के अलावा फ्रांस के सर्वोच्च सम्मान से भी सम्मानित किया गया.बांगाला सिनेमा में अब भी सत्यजित रे का कोई सानी नहीं है. उन्होंने अपनी फिल्मों में बंगाल के  ग्रामीण और शहरी जीवन का यथार्थ चित्रण किया था. रे के पुत्र संदीप कहते हैं कि ‘पिता जी की बाकी कहानियों और उपन्यासों को सिनेमा के परदे पर उतारना ही उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी.’ उन्होंने इस दिशा में काम भी शुरू कर दिया है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-5352837972582844535?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/5352837972582844535/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/05/blog-post_08.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/5352837972582844535'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/5352837972582844535'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/05/blog-post_08.html' title='&lt;strong&gt;रे की कहानी को परदे पर उतारेंगे संदीप&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S-VNsdXoNnI/AAAAAAAAAYo/q0nqn-ldZd4/s72-c/satyajit-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-373667661159915938</id><published>2010-05-08T17:07:00.000+05:30</published><updated>2010-05-08T17:08:07.841+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><title type='text'>ऐसे सिखाई नेता को वक्त की पाबंदी !</title><content type='html'>वक्त की पाबंदी और अनुशासन सिखाने का शायद यह भी एक तरीका है! नगरपालिका चुनाव के लिए परचा दाखिल करने के लिए एक उम्मीदवार जब सब-डिवीज़नल अफसर (एसडीओ) के कार्यालय में तय समय से देर से पहुंचा तो वहां पहले से इंतजार कर रहे पार्टी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं ने अपने उस नेता की ही धुनाई कर दी. यह दिलचस्प घटना पश्चिम बंगाल में नदिया जिले के कल्याणी में हुई. हालांकि मार खाने और कपड़े फड़वाने के बाद उस नेता ने अपना परचा दाखिल कर दिया. लेकिन यह सबक उनको आगे चुनाव प्रचार के दौरान भी शायद नहीं भूलेगा. बंगाल में 81 नगरपालिकाओं के लिए 30 मई को चुनाव होने हैं. &lt;br /&gt;पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि तृणमूल कांग्रेस की स्थानीय शाखा के अध्यक्ष पी.के.सूर को नगरपालिका चुनाव के लिए अरना परचा दाखिल करना था. तय समय से पहले ही पार्टी के एक हजार से ज्यादा समर्थक अपने नेता की अगवानी के लिए एसडीओ के कार्यालय के सामने जमा हो गए थे. लेकिन नेता तो ठहरे नेता. वे तय समय से कोई दो घंटे देर से अपने तीन साथियों के साथ वहां पहुंचे. इस दौरान कड़ी धूप में नारेबाजी करने वाले समर्थकों का पारा चढ़ गया था. नेताजी को एअरकंडीशंड गाड़ी से उतरते देख कर लोगों ने आव देखा न ताव, उन पर पिल पड़े. उसके तीन साथी भी अपने समर्थकों की मार से नहीं बच सके. वह तो कुछ देर तक चली पिटाई के बाद पुलिस और दूसरे लोगों ने बीच-बचाव कर मामला शांत किया. लेकिन तब तक नेताजी का चेहरा बदल गया था और कपड़े भी फट गए थे.&lt;br /&gt;खैर, सूर ने बाद में एसडीओ कार्यालय में जाकर अपना परचा दाखिल कर दिया. सूर कहते हैं कि ‘पार्टी कार्यालय में नेताओं के साथ विचार-विमर्श करने की वजह से उनको कुछ देर हो गई.’ उनका आरोप है कि यह माकपा के लोगों की हरकत है. वे कहते हैं कि ‘माकपा के कुछ समर्थक हमारे कार्यकर्ताओं में शामिल हो गए थे. उन्होंने ही मुझ पर हमला किया.’&lt;br /&gt;पुलिस ने इस मामले में एक मामला दर्ज कर लिया है. लेकिन फिलहाल किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है. वैसे, परचा भरने से पहले ही मिले इस सबक को नेताजी कम से कम चुनाव प्रचार के दौरान तो जरूर याद रखेंगे!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-373667661159915938?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/373667661159915938/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/05/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/373667661159915938'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/373667661159915938'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;ऐसे सिखाई नेता को वक्त की पाबंदी !&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-5482039807068828219</id><published>2010-02-17T23:12:00.002+05:30</published><updated>2010-02-17T23:13:54.587+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><title type='text'>उनको सालता है जीत का गम!</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3wqzQWFnoI/AAAAAAAAAWo/1XAkcnhQhzI/s1600-h/SIBAPADA+1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 130px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3wqzQWFnoI/AAAAAAAAAWo/1XAkcnhQhzI/s200/SIBAPADA+1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5439269510006021762" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;गम और खुशी, यह दो शब्द क्रमशः हार और जीत के साथ जुड़े हैं। लेकिन क्या किसी को अपनी जीत का गम भी हो सकता है? जी हां, ऐसा भी होता है जब किसी को अपनी जीत का गम कोई 38 साल बाद भी साल रहा हो। ऐसे ही एक सज्जन का नाम है शिवपद भट्टाचार्य । पश्चिम बंगाल के तत्कालीन 24-परगना जिले में बरानगर के रहने वाले 74 वर्षीय भट्टाचार्य को वर्ष 1972 के विधानसभा चुनावों में अपनी जीत आज भी सालती है। वजह---उन्होंने उस चुनाव में भाकपा उम्मीदवार के तौर पर बरानगर विधानसभा से सीट पर माकपा नेता ज्योति बसु को हराया था। बसु इससे पहले वर्ष 1952 से उस सीट से लगातार छह बार चुनाव जीत चुके थे. लेकिन 1972 में वे वहां भट्टाचार्य से हार गए थे। दिलचस्प तथ्य यह है कि शिवपद ने वर्ष 1957 और 1962 के विधानसभा चुनावों में उसी बरानगर सीट पर बसु के समर्थन में चुनाव प्रचार किया था। लेकिन अब बसु के निधन के बाद भट्टाचार्य अपनी उस जीत से खुश नहीं हैं। उनको अपनी जीत का गम लगातार साल रहा है।&lt;br /&gt;शिवपद कहते हैं कि ज्योति बसु हमारे नेता थे.अब लगता है कि अगर मैं उनके खिलाफ चुनाव मैदान में नहीं उतरा होता तो बेहतर होता। वे बताते हैं कि बसु बालीगंज में रहते थे और बरानर में चुनाव के दौरान अपनी कार से यहां आते थे। मुझे बरानगर की जिम्मेवारी मिली थी। बसु हमेशा यहां से भारी अंतर के साथ जीतते थे। अतीत के पन्ने पलटते हुए भट्टाचार्य बताते हैं कि 1957 में बरानगर में बसु का मुकाबला कांग्रेस के कानाईलाल ढोले से था। बसु ने मुझसे पूछा कि क्या होगा? मैंने कहा कि आप कम से कम 10 हजार वोटों के अंतर से जीतेंगे और वे जीत गए।&lt;br /&gt;1972 में हार का मुंह देखने के बाद बसु ने अपना चुनाव क्षेत्र बदल लिया और सातगछिया चले गए। 1977 से 1996 तक वे वहां से लगातार जीतते रहे। शिवपद बताते हैं कि 1972 के विधानसभा चुनावों के बाद बसु के साथ उनकी कभी बातचीत नहीं हुई। वे कहते हैं कि ‘मैंने उनके साथ कई कार्यक्रमों में शिरकत की। वे मेरी ओर देख कर मुस्करा देते थे। लेकिन हमारे बीच कभी कोई बात नहीं होती थी। &lt;br /&gt;शिवपद फिलहाल भाकपा की राज्य समिति के सदस्य हैं। वे कहते हैं कि बसु की नीतियां मौजूदा मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की नीतियों से बेहतर थीं। भट्टाचार्य मानते हैं कि बंगाल में वामपंथी आंदोलन अब गलत राह पर चल रहा है। वे कहते हैं कि राज्य सरकार अब जमीन के अधिग्रहण, माओवादियों पर पाबंदी और केंद्र की कांग्रेस सरकार का सहारा लेकर पूंजीवादी नीतियों को बढ़ावा दे रही है।&lt;br /&gt;शिवपद कहते हैं कि ज्योति बसु कामकाजी तबके के असली नेता थे. वे पहले ऐसे नेता थे जिसने संसदीय लोकतंत्र और वामपंथ के बीच बेहतर तालमेल बनाया था। बसु के राजनीति से संन्यास लेने के बाद ही वामपंथियों ने आम लोगों को समर्थन खो दिया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-5482039807068828219?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/5482039807068828219/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/02/blog-post_7150.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/5482039807068828219'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/5482039807068828219'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/02/blog-post_7150.html' title='&lt;strong&gt;उनको सालता है जीत का गम!&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3wqzQWFnoI/AAAAAAAAAWo/1XAkcnhQhzI/s72-c/SIBAPADA+1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-7700392810957278835</id><published>2010-02-17T23:09:00.001+05:30</published><updated>2010-02-17T23:11:06.856+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>हौसले ने बनाया रोल मॉडल</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3wqKCgUw_I/AAAAAAAAAWg/5ZsC4IizMYI/s1600-h/SUNITA,REKHA+AND+AFSANA.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3wqKCgUw_I/AAAAAAAAAWg/5ZsC4IizMYI/s200/SUNITA,REKHA+AND+AFSANA.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5439268801916224498" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कच्ची उम्र में अपनी शादियां रोकने के लिए घरवालों और समाज के खिलाफ आवाज उठाते समय इन तीनों लड़कियों ने शायद सोचा भी नहीं होगा कि वे देश में बाल विवाह के खिलाफ अभियान में रोल मॉडल बन जाएंगी। पश्चिम बंगाल के सबसे पिछड़े जिलों में शुमार पुरुलिया के बीड़ी मजदूर और हाकरों के परिवार की रेखा कालिंदी (13), सुनीता महतो 13) और अफसाना खातून (14) को बाल विवाह की प्रथा के खिलाफ आवाज बुलंद करने और लोगों में जागरुकता फैलाने के लिए गणतंत्र दिवस के मौके पर दिल्ली में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह पहला मौका है जब बंगाल के किसी एक जिले की तीन लड़कियों को यह पुरस्कार मिला है।&lt;br /&gt;तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली सुनीता कहती है कि एक साल पहले मेरे मात-पिता ने मेरा विवाह तय कर दिया था। इसकी जानकारी मिलने पर मैंने यह बात अपने साथ पढ़ने वाली दूसरी युवतियों को बताई। उनलोगों ने इसकी सूचना हमारी क्लासटीचर को दी। उसके बाद हम सबने मिल कर घरवालों को यह शादी नहीं करने के लिए मनाया। सुनीता आगे चल कर शिक्षिका बनना चाहती है।&lt;br /&gt;रेखा ने भी अपने मात-पिता के दबाव के बावजूद कम उम्र में शादी करने से मना कर दिया. उसकी बड़ी बहन की शादी 11 साल की कच्ची उम्र में ही हो गई थी। रेखा कहती है कि इस पुरस्कार ने हमारे हौसले और मजबूत कर दिए हैं। अब पूरा भरोसा हो गया है कि हम जो कर रहे हैं वह सही है।&lt;br /&gt;अब पुरुलिया जिले की यह तीन युवतियां इलाके में मिसाल बन गई हैं। इन तीनों ने सिर्फ अपना बाल विवाह रोका, बल्कि जिले की कई दूसरी युवतियों को भी घरवालों की मर्जी के अनुसार कम उम्र में शादी करने से रोक दिया। अब ऐसी 35 लड़कियां चाइल्ड एक्टीविस्ट इनिशिएटिव (सीएआई) के तौर पर काम कर रही हैं। यह सब गांव-गांव घूम कर लड़कियों को बाल विवाह से इंकार करने के लिए तैयार कर रही हैं। इनकी कोशिशों की वजह से इलाके में दर्जनों बाल विवाह रोके जा चुके हैं।&lt;br /&gt;शिक्षा की व्यवस्था नहीं होने और गरीबी के चलते पुरुलिया जिले के कई हिस्सों में बाल विवाह की प्रथा अब भी कायम है। पुरुलिया के सहायक श्रम आयुक्त प्रसेनजीत कुंडू कहते हैं कि किसी ने भी इन लड़कियों को बाल विवाह के खिलाफ अभियान चलाने की सलाह नहीं दी थी। इन लोगों ने खुद ही एकजुट होकर गांव-गांव जाकर ऐसा करने का फैसला किया था। इन लड़कियों को हौसले से कुंडू भी अचरज में हैं। वे कहते हैं कि ‘पारिवारिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए इन लड़कियों के लिए कच्ची उम्र में विवाह से इंकार करना और अपने हक के लिए आवाज उठाना बेहद मुश्किल है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-7700392810957278835?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/7700392810957278835/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/02/blog-post_17.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/7700392810957278835'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/7700392810957278835'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/02/blog-post_17.html' title='&lt;strong&gt;हौसले ने बनाया रोल मॉडल&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3wqKCgUw_I/AAAAAAAAAWg/5ZsC4IizMYI/s72-c/SUNITA,REKHA+AND+AFSANA.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-6206189534936031790</id><published>2010-02-02T15:45:00.004+05:30</published><updated>2010-02-02T15:56:16.598+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यादें'/><title type='text'>बिग बी और मैं !</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S2f7wYfWewI/AAAAAAAAAWY/H8BiXN2df7E/s1600-h/P1000375.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S2f7wYfWewI/AAAAAAAAAWY/H8BiXN2df7E/s200/P1000375.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5433588284072033026" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;यह शीर्षक भ्रामक है. इससे यह आभास हो सकता है कि मैं बिग बी यानी अमिताभ बच्चन के साथ किसी फिल्म में काम कर रहा हूं या फिर उनकी किसी फिल्म की पटकथा लिख रहा हूं. ऐसा कुछ भी नहीं है. पत्रकार हूं. लेकिन फिल्म की पटकथा लिखने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. वैसे, यह बात अंगूर खट्टे होने जैसी भी लग सकती है. फिर भी सच तो सच है. &lt;br /&gt;आज से कोई 31 साल पहले 1979 में पहली बार कलकत्ता आया था. तब यह कलकत्ता ही था कोलकाता नहीं. घूमने आया था. एक परिचित के घर रहा. उसी समय जीवन का पहला कैमरा खरीदा-आगफा क्लिक थ्री. वही उस समय सबसे बेहतर था. फिल्म का एक रोल लगाने पर उससे बारह ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें खींची जा सकती थी. तब मैंने कलकत्ता के ज्यादातर दर्शनीय स्थल देखे थे. विक्टोरिया मेमोरियल और बिड़ला प्लेनेटोरियम के सामने उस कैमरे से खिंचवाई गई तस्वीर अब भी एक फोटो प्रेम में सुरक्षित रखी है. लेकिन उस बार एक चीज नहीं देख पाया. नेताजी इंडोर स्टेडियम. हालांकि उसमें देखने लायक कोई बात थी भी नहीं. लेकिन उसे नहीं देखने का मुझे काफी गहरा अफसोस हुआ दो साल बाद. क्यों? इस सवाल का जवाब आगे चल कर.&lt;br /&gt;बचपन में मुझे फिल्में देखने का भारी शौक था. सातवीं-आठवीं कक्षा में कुछ दोस्त भी ऐसे ही मिल गए थे. हर नई फिल्म पहले दिन पहले शो में देखना तो आदत-सी बन गई थी. इसके लिए स्कूल से गायब रहने लगा. कई बार जेबखर्च के पैसे जुटा कर फिल्में देखता था कई बार स्कूल की फीस से. चरस, महबूबा और ऐसी ही न जाने कितनी फिल्में पहले शो में देखी थी उस दौर में. टिकट की खिड़की पर चाहे जितनी भी भीड़ हो हमें टिकटें जरूर मिल जाती थीं. किनारे से धक्का-मुक्की कर किसी तरह टिकट खिड़की के भीतर हाथ पहुंचाने की कला में मैं धीरे-धीरे उस्ताद हो गया था. अपनी इसी कला की वजह से हर बार टिकट कटाने का जिम्मा मुझे ही मिलता था. &lt;br /&gt;फिल्में देखने लगा तो जाहिर है हीरो-हीरोइनों के प्रति दिलचस्पी भी बढ़ने लगी. आखिर में जेबखर्च के तौर पर मिलने वाले पैसों में से बचा कर मैं हर हफ्ते धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन से लेकर जितेंद्र और विनोद खन्ना तक को पत्र भेजने लगा. हजारों नहीं तो सैकड़ों पोस्टकार्ड तो जरूर भेजे होंगे. लेकिन अफसोस कि किसी ने एक पत्र का भी जवाब तक नहीं दिया. लेकिन इससे मेरा हौसला कम नहीं हुआ. पत्र भेजना जारी रहा. लेकिन इसबीच, एक दिन फिल्म देखने के लिए स्कूल से पेट दर्द का बहाना बना कर निकलते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया. घर आने पर पिता जी ने छाते के बेंत से ऐसी धुलाई की कि मां को बेंत के दाग और दर्द दूर करने के लिए कई दिनों तक देशी शराब मेरे बदन पर मलनी पड़ी थी. उसके बाद पढ़ाई पर ध्यान दिया. लेकिन मेरी संगत के चलते ही पिता जी ने तय कर लिया था कि हाईस्कूल के बाद इंटर के लिए मुझे देवरिया भेजना है. वहां शिवाजी इंटर कालेज में मेरे मामा पढ़ाते थे. मैं परीक्षा देकर वहां चला गया. वहीं 12वीं में पढ़ते हुए पहली बार घूमने के लिए कलकत्ता आया था. &lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S2f7ngV2FPI/AAAAAAAAAWQ/35o56zbG7RQ/s1600-h/P1000282.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S2f7ngV2FPI/AAAAAAAAAWQ/35o56zbG7RQ/s200/P1000282.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5433588131560822002" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कलकत्ता से लौटने के कोई दो साल बाद जब बिग बी की फिल्म याराना देखी तब मुझे नेताजी इंडोर स्टेडियम नहीं देखने का भारी अफसोस हुआ. फिल्म का एक गीत उसी स्टेडियम में फिल्माया गया था. खैर, जीवन की जद्दोजहद कई यादों और दर्द को धूमिल कर देती है. यही मेरे साथ भी हुआ. बीते दस सालों से कलकत्ता में रहते हुए कई बार नेताजी इंडोर स्टेडियम में जाना हुआ. कभी पत्रकार के तौर पर तो कभी बेटी के स्कूल के सालाना समारोह में. लेकिन बीते महीने बेटी के स्कूल के समारोह में जाने पर मेरा 29 साल पुराना अफसोस खत्म हो गया. अशोक हाल ग्रुप आफ स्कूल्स की ओर से हर चार साल पर बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक समारोह का आयोजन किया जाता है-स्पेक्ट्रम. अबकी स्पेट्रक्म में बिग बी ही मुख्य अतिथि थे. जगह थी नेताजी इंडोर स्टेडियम. वहां बैठे हुए लग रहा था मानो समय का पहिया एक पल में तीन दशक पीछे घूम गया.&lt;br /&gt;बिग बी उस समारोह में पूरे ढाई घंटे बैठे रहे. उन्होंने भी अपने भाषण में इस स्टेडियम में हुई अपनी शूटिंग के दौर को याद किया. और मैंने भी एक अफसोस को मिटा लिया. जगह भी वही थी, आदमी (अमिताभ) भी वही, बस समय का पहिया तीन दशक आगे बढ़ गया था. लेकिन कहते हैं न कि देर आयद दुरुस्त आयद. जीवन में कई अफसोस रहेंगे. लेकिन अब उनमें से कम कम एक तो कम हो गया है. बस, इसी का संतोष है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-6206189534936031790?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/6206189534936031790/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/02/blog-post_02.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/6206189534936031790'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/6206189534936031790'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/02/blog-post_02.html' title='&lt;strong&gt;बिग बी और मैं !&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S2f7wYfWewI/AAAAAAAAAWY/H8BiXN2df7E/s72-c/P1000375.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-3854124101117601838</id><published>2010-02-02T14:11:00.001+05:30</published><updated>2010-02-02T14:14:54.188+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><title type='text'>मौत के बाद राजनीति का मुद्दा बने बसु</title><content type='html'>&lt;strong&gt;प्रभाकर मणि तिवारी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आजीवन सिद्धांतों की राजनीति करने वाले माकपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु मौत के बाद अपने राज्य यानी बंगाल में राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बन गए हैं। सत्तारुढ़ वाममोर्चा से लेकर विपक्षी तृणमूल कांग्रेस तक उनको अपने सियासी हित में लगातार भुनाने में जुटी है। माकपा बसु की मौत से उपजी सहानुभूति को कम से कम अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों तक बनाए रखना चाहती है। उसकी मंशा इसी के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की है। व्यक्ति-पूजा पर भरोसा नहीं करने वाले वामपंथी राज्य में फिलहाल बसु के महिमामंडन में जुटे हैं। लेकिन दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने माकपा की इस रणनीति की काट के लिए बसु के मुख्यमंत्रित्व के कथित अंधेरे पक्ष को उजाले में लाने का प्रयास कर रही है।&lt;br /&gt;ज्योति बसु मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने और सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने के बावजूद आखिरी सांस तक माकपा और उसकी अगुवाई वाले वाममोर्चा के मसीहा बने रहे। बीते लोकसभा चुनावों में उन्होंने अपने भाषण के वीडियो टेप के जरिए दूर-दराज के मतदाताओं से वाममोर्चा को समर्थन देने की अपील की थी। लेकिन उनकी यह अपील कामयाब नहीं रही।  बाद में होने वाले विधानसभा उपचुनावों में तो बसु ने तृणमूल कांग्रेस की सहयोगी कांग्रेस और उसके समर्थकों से भी वाममोर्चा उम्मीदवारों से समर्थन की अपील कर दी थी। उनकी इस अपील से राजनीतिक हलकों में हैरत हुई थी। अब माकपा की अगुवाई वाली सरकार अपने लंबे कार्यकाल की दो सबसे अहम चुनौतियों के सामने खड़ी है। इसी साल कोलकाता नगर निगम के चुनाव होने हैं। निगम पर फिलहाल वाममोर्चा का कब्जा है। अगले साल विधानसभा चुनाव होंगे। लेकिन राज्य में दो साल पहले शुरू हुई बदलाव की लहर से खुद वामपंथी भी आशंकित हैं। इसलिए उसने बसु की मौत से उफजी सहानुभूति को चुनावी हित में भुनाने की रणनीति बनाई है। &lt;br /&gt;बसु के निधन और उनकी अंतिम यात्रा को मीडिया में व्यापक कवरेज मिला था। उसके बाद एक हफ्ते के भीतर ही बसु की श्रद्धांजलि सभा का आयोजन कर दिया गया। इसके अलावा महानगर समेत राज्य के तमाम इलाकों में बसु की तस्वीरों वाले विशालकाय बैनर और पोस्टर लगाए गए हैं। इन पर मोटी रकम खर्च की गई है। राज्य के विभिन्न स्थानों पर बसु की याद में होने वाली श्रद्धांजलि सभाओं का दौर अब तक जारी है। जाहिर है पार्टी बसु की यादों को जिलाए रख कर सियासी फायदा उठाना चाहती है।&lt;br /&gt;दूसरी ओर, वामपंथियों की इस रणनीति को समझने के बाद तृणमूल कांग्रेस ने भी इसकी काट खोज ली है। वह वाममोर्चा के कार्यकाल में हुए कथित अत्याचारों के साथ ही अब बसु के 23 साल लंबे मुख्यमंत्रित्व के कथित काले पक्षों को लोगों के सामने लाने का प्रयास कर रही है। यह वजह है कि बीते रविवार को जब माकपा ने बसु की याद में महानगर में एक विशाल रैली आयोजित की तो ठीक उसी समय तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी मरीचझापी के शहीदों के परिजनों को सम्मानित कर रही थीं। उत्तर 24-परगना जिले के बारासत के पास मरीचझापी में वर्ष 1979 में बांग्लादेश से भारी तादाद में आए शऱणार्थियों पर पुलिस ने फायरिंग की थी और उनको राज्य से खदेड़ दिया था। तब बसु ही मुख्यमंत्री थे। &lt;br /&gt;ममता बनर्जी ने मरीचझापी की घटना की नए सिरे से जांच कराने और पुलिसिया अत्याचार के शिकार लोगों को न्याय दिलाने की मांग की है। मरीचझापी का मुद्दा उठा कर पार्टी एक तीर से दो निशाने साधने का प्रयास कर रही है। वह इसके जरिए बसु की मौत से सहानुभूति बटोरने में जुटी माकपा की रणनीति का जवाब देना चाहती हैं। ममता ने वाममोर्चा सरकार के कार्यकाल के दौरान हुए कथित अत्याचारों की सूची में अब मरीचझापी का नाम भी जोड़ दिया है।&lt;br /&gt;इससे पहले भी ममता वामपंथियों का एक मुद्दा छीन चुकी हैं। बीते साल तृणमूल की ओर से आयोजित शहीद रैली के दौरान ममता ने तेभागा आंदोलन और खाद्य आंदोलन के दौरान मारे गए लोगों के परिजनों को मंच पर बिठा कर उनको सम्मानित किया था। वर्ष 1946 में भाकपा के संगठन किसान सभा ने किसानों के हक में तेभागा आंदोलन शुरू किया था। उस समय किसानों को आधी फसल खेत के मालिक को देनी पड़ती थी। तेभागा (तीसरा हिस्सा) आंदोलन की मांग थी कि यह हिस्सा घटा कर एक तिहाई कर दिया जाए। राज्य में खाद्यान्नों की भारी किल्लत होने पर भाकपा ने 1959 में खाद्य आंदोलन शुरू किया था।&lt;br /&gt;यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि ज्योति बसु अपने संन्यास के बावजूद हर चुनाव में अहम भूमिका निभाते रहते थे। वे वामपंथियों की ढाल बने हुए थे। अब वामपंथी बसु की मौत से उपजी सहानुभूति के जरिए ही चुनावी वैतरणी पार करने के प्रयास में जुटे हैं। उनकी मंशा अगले चुनावों तक लोगों के दिलों में बसु को जिंदा रखने की है। यही वजह है कि पोस्टरों व बैनरों के जरिए बसु के सिद्धांतों का जम कर प्रचार किया जा रहा है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस भी इसकी काट की दिशा में काम कर रही है। इस अभियान से किसे कितना फायदा होगा, यह तो चुनावी नतीजे ही बताएंगे। लेकिन राजनीति का मुद्दा बने बसु पर खींचतान फिलहाल दिलचस्प होती जा रही है। &lt;strong&gt;जनसत्ता&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-3854124101117601838?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/3854124101117601838/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/02/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/3854124101117601838'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/3854124101117601838'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;मौत के बाद राजनीति का मुद्दा बने बसु&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-4283750517547551420</id><published>2010-01-18T00:11:00.001+05:30</published><updated>2010-01-18T00:11:57.109+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ज्योति बसु'/><title type='text'>नहीं होगा बसु का अंतिम संस्कार</title><content type='html'>&lt;strong&gt;प्रभाकर मणि तिवारी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री और माकपा के वरिष्ठ नेता ज्योति बसु का अंतिम संस्कार नहीं होगा। उन्होंने अपना शरीर पहले ही दान कर दिया था। उनकी इच्छा के अनुरूप मंगलवार को अंतिम यात्रा के बाद उनका शव यहां सरकारी एसएसकेएम अस्पताल को सौंप दिया जाएगा। बसु के पार्थिव शरीर को मंगलवार को सुबह साढ़े नौ बजे केंद्र पीस हैवन से प्रदेश के सचिवालय राइटर्स बिल्डिंग ले जाया जाएगा।&lt;br /&gt;माकपा के प्रदेश सचिव बिमान बोस ने बताया कि बसु के पार्थिव शरीर को चार घंटे के लिए, साढ़े 10 बजे से दोपहर ढाई बजे तक प्रदेश विधानसभा परिसर में रखा जाएगा, ताकि लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे सकें।&lt;br /&gt;उन्होंने बताया कि इस दौरान बांग्लादेश समेत देश-विदेश के नेता बसु को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। बोस ने बताया कि इसके बाद उनकी देह को दोपहर तीन बजे अलीमुद्दीन स्ट्रीट स्थित पार्टी मुख्यालय ले जाया जाएगा। वहां से अंतिम यात्रा के तौर पर उन्हें एसएसकेएम अस्पताल ले जाएंगे। बसु की देह को पार्टी मुख्यालय में एक घंटे के लिए रखा जाएगा।&lt;br /&gt;उन्होंने बताया कि इस दौरान वहां माकपा पोलितब्यूरो और केंद्रीय समिति के सभी सदस्य आएंगे। पार्टी मुख्यालय में आने वाले लोग शब्दों के माध्यम से अपनी संवेदनाएं प्रकट कर सकें, इसलिए वहां एक श्रद्धांजलि पुस्तिका भी रखी जाएगी।&lt;br /&gt;ज्योति बाबू के पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा क्योंकि उन्होंने इसे दान करने का फैसला किया था। उनके शरीर का उपयोग चिकित्सा संबंधी शोध के लिए किया जाएगा। &lt;br /&gt;बसु ने करीब सात साल पहले ऐलान किया था कि उनकी मौत के बाद 'गणदर्पण' नामक एनजीओ को उनका शव दान कर दिया जाए। माकपा नेता राबिन देब ने बताया कि उनकी इस इच्छा के अनुरूप मंगलवार को 'पीस हेवेन' नामक फ्यूनरल पार्लर से उनका आखिरी सफर शुरू होगा। इसके बाद उनका पार्थिव शरीर सचिवालय व विधानसभा होते हुए पार्टी मुख्यालय और फिर एसएसकेएम अस्पताल ले जाया जाएगा।&lt;br /&gt;बसु नेत्रदान कर चुके थे इसलिए एक नेत्र अस्पताल के डॉक्टरों ने उनकी आंखें निकाल कर सुरक्षित रख ली हैं। पश्चिम बंगाल सरकार ने दिवंगत नेता के सम्मान में सोमवार को अवकाश की घोषणा की है। &lt;br /&gt;ज्योति बसु की अंतिम इच्छा थी कि वह साल्ट लेक स्थित इंदिरा भवन में अपनी आखिरी सांस लें। बसु के निजी सचिव जय कृष्ण घोष ने नम आंखों से कहा कि अस्पताल में भर्ती किए जाने के बाद वह लगातार कहते थे कि उन्हें इंदिरा भवन ले जाया जाए। वह मुझसे लगातार पूछा करते थे कि मुझे घर कब लेकर जाओगे। वह कहते थे कि तुमने मुझसे वादा किया था कि एक दिन अस्पताल में रखने के बाद तुम मुझे घर ले चलोगे। घोष ने कहा कि उनकी अंतिम इच्छा इंदिरा भवन में आखिरी सांस लेने की थी। उन्होंने कहा कि मैं उन्हें कभी नहीं भूल सकता। उन्होंने मुझे बहुत प्यार दिया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-4283750517547551420?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/4283750517547551420/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/01/blog-post_7909.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/4283750517547551420'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/4283750517547551420'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/01/blog-post_7909.html' title='&lt;strong&gt;नहीं होगा बसु का अंतिम संस्कार&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-9018337450153552791</id><published>2010-01-18T00:08:00.001+05:30</published><updated>2010-01-18T00:10:56.956+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ज्योति बसु'/><title type='text'>बसु पर बना था वृत्तचित्र</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S1NZsAdnaEI/AAAAAAAAAV4/JI0x0BZfN_c/s1600-h/JB-13.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S1NZsAdnaEI/AAAAAAAAAV4/JI0x0BZfN_c/s200/JB-13.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5427780588484913218" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बांग्लादेश में बचपन, लंदन में छात्र जीवन और उसके बाद पश्चिम बंगाल में सात दशक लंबे राजनीतिक जीवन की कितनी ही भूली-बिसरी यादें और घटनाएं।  कोई पांच साल पहले अपने जीवन पर बनी दो घंटे लंबी डाक्यूमेंट्री को देखते हुए माकपा के वरिष्ठ नेता और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु मानों अतीत में डूब गए थे।&lt;br /&gt;जाने-माने फ़िल्मकार गौतम घोष की इस फ़िल्म का शो खत्म होने के बाद उन्होंने कहा था कि मुझे भी याद नहीं था कि मैंने इतनी बातें कहीं थी। मेरी यादें ताजा हो गई हैं।&lt;br /&gt;वर्ष 1997 से 2004 यानी पूरे आठ साल की शूटिंग के बाद बनी ‘ज्योति बसुर संगे (ए जर्नी विथ ज्योति बसु) यानी ज्योति बसु के साथ एक सफर’ में पहली बार बसु के जीवन के छुए-अनछुए कई पहलू आम लोगों के सामने आए थे।&lt;br /&gt;बंगाल के कुछ चुनिंदा सिनेमाघरों में पहली मई, 2005 को यह डाक्यूमेंट्री रिलीज हुई थी। अपना पूरा जीवन मेहनतकश लोगों के हितों की लड़ाई में बिताने वाले नेता के जीवन पर बनी फिल्म के लिए शायद पहली मई यानी मजदूर दिवस से बेहतर कोई मौका हो ही नहीं सकता था।&lt;br /&gt;कोलकाता के नंदन सिनेमाघर में इस डाक्यूमेंट्री का प्रीमियर शो आयोजित किया गया था। इसके दर्शकों में ज्योति बसु, मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, उनके मंत्रिमंडल के सदस्य और फिल्मकार मृणाल सेन समेत कई जानी-मानी हस्तियां शामिल थीं। &lt;br /&gt;खुद बसु का कहना था कि यह फिल्म एक ऐतिहासिक दस्तावेज साबित होगी। फिल्म की शूटिंग पश्चिम बंगाल के अलावा विदेशों खासकर लंदन में की गई है।&lt;br /&gt;इसमें बसु ने बचपन के कई ऐसे क्षणों को याद किया था जो राजनीतिक जीवन की आपाधापी में वे कब के भूल चुके थे।&lt;br /&gt;इस फिल्म की शूटिंग हालांकि अलग-अलग टुकड़ों में आठ वर्षों तक हुई, लेकिन इसके लिए गौतम घोष ने बसु का इंटरव्यू वर्ष 2004 में लिया था।&lt;br /&gt;घोष कहते हैं कि उन्होंने बसु पर फिल्म बनाने का फैसला इसलिए किया कि वे उन गिने-चुने राजनीतिज्ञों में से हैं जिन्होंने बीते सात दशकों के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य को देखा है. &lt;br /&gt;वे बताते हैं कि मैं उनके नजरिए को समझने का प्रयास करना चाहता था। फिल्म पूरी करने के लिए मैंने ज्योति बसु के सत्ता से रिटायर होने तक इंतजार करने का फैसला किया था ताकि वे उन सब मुद्दों पर खुल कर अपनी बात कह सकें जिन पर सत्ता में रहते कुछ नहीं कहा था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-9018337450153552791?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/9018337450153552791/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/01/blog-post_2523.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/9018337450153552791'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/9018337450153552791'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/01/blog-post_2523.html' title='&lt;strong&gt;बसु पर बना था वृत्तचित्र&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S1NZsAdnaEI/AAAAAAAAAV4/JI0x0BZfN_c/s72-c/JB-13.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-268134422594882058</id><published>2010-01-18T00:07:00.000+05:30</published><updated>2010-01-18T00:08:40.963+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ज्योति बसु'/><title type='text'>आखिरी सांस तक मोर्चा के मसीहा बने रहे बसु</title><content type='html'>माकपा के बुजुर्ग नेता और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु अपनी आखिरी सांस तक वाममोर्चा और अपनी पार्टी माकपा के मसीहा और संकटमोचक बने रहे। कोई नौ साल पहले सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने के बावजूद उनकी राजनीतिक सक्रियता में कहीं कोई कमी नहीं आई थी। वे दो साल पहले तक नियमित तौर पर अलीमुद्दीन सट्रीट स्थित पार्टी के मुख्यालय आते थे और हर मसले पर सरकार और पार्टी को सलाह देते थे। वाममोर्चा सरकार और माकपा जब भी किसी मुसीबत में फंसती थी तो बसु ही उसे उबारते थे। मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के बाद बीते नौ वर्षों में ऐसे अनगिनत मौके आए जब उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर पार्टी को संकट से बचाया। वाममोर्चा के बाकी घटकों में भी बसु का वही स्थान था जो उनकी अपनी पार्टी में। घटक दलों के विवाद के समय भी बसु ही पंचायत करते थे। अब तक ऐसी कोई मिसाल नहीं मिलती जब घटक दल के किसी नेता ने बसु के फैसले पर एतराज जताया हो। बसु की बात सबके लिए पत्थर की लकीर साबित होती थी। &lt;br /&gt;बीते लगभग पांच वर्षों के दौरान सिंगुर, नंदीग्राम, जमीन अधिग्रहण, सोमनाथ चटर्जी के माकपा से निष्कासन और राजनीतिक हिंसा समेत न जाने कितनी ऐसी समस्याएं पैदा हुईं जब बसु ने पार्टी व सरकार को सही रास्ता दिखाया। बसु आखिरी दम तक मार्क्सवाद के सिद्धांतों पर चलते रहे। यही नहीं, उन्होंने इन सिद्धांतों का पालन करते हुए इसके व्यवहारिक पक्ष का भी ध्यान रखा। सरकार और पार्टी की गलती के समय वे उनकी खिंचाई करने से भी नहीं चूके। बसु हमेशा कहते थे कि सरकार के कामकाज की सकारात्मक आलोचना जरूरी है। राज्य में औद्योगिकीकरण की बयार चलने पर सरकार ने जब बड़े पैमाने पर जमीन का अधिग्रहण शुरू किया तो सबसे पहले बसु ने ही इसके खिलाफ आवाज उठाई थी। उन्होंने तब दलील दी थी कि खेती की जमीन पर उद्योग नहीं लगाए जाने चाहिए। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर अपनी नाराजगी जताई थी। बाद में विपक्ष ने इस मुद्दे को लपक लिया। हालांकि माकपा नेतृत्व ने तब बसु को विकास की दुहाई देकर समझा लिया था। लेकिन अगर सरकार ने उस समय उनकी नसीहत पर ध्यान दिया होता तो शायद सिंगुर और नंदीग्राम की फांस उसके गले में नहीं चुभती।&lt;br /&gt;इसी तरह जब लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के निष्कासन के मुद्दे पर प्रदेश माकपा के नेता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से बगावत पर उतारू थे तब बसु ने उनको समझाया था। इस पूरे मामले में बसु की वजह से ही पार्टी की ज्यादा थुक्का-फजीहत नहीं हुई। अगर बसु ने तब नेताओं को नहीं समझाया होता तो शायद यहां महासचिव प्रकाश करात के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर नारे लगने लगते।&lt;br /&gt;बसु ने अपने जीवन में पद के लिए कभी कोई समझौता नहीं किया। अगर वे चाहते तो वर्ष 1996 में प्रधानमंत्री बन सकते थे। लेकिन उन्होंने पार्टी के फैसले का सम्मान करते हुए वह कुर्सी ठुकरा दी। यह जरूर है कि उनको आखिरी दम तक इस बात का मलाल रहा। बाद में हालांकि पार्टी ने भी मान लिया कि वह फैसला गलत था। वे केंद्र की पूर्व यूपीए सरकार से वामदलों के समर्थन वापसी के भी खिलाफ थे। उन्होंने पार्टी में अपने स्तर पर इसका पूरा विरोध किया था। लेकिन केंद्रीय नेतृत्व समर्थन वापस लेने पर आमादा था। उसके बावजूद बसु ने नेताओं से कहा कि समर्थन भले वापस ले लें, लेकिन सरकार नहीं गिरनी चाहिए। उनकी दलील थी कि देश एक मध्यावधि चुनाव झेलने की हालत में नहीं है। &lt;br /&gt;सोमनाथ चटर्जी प्रकरण में हर ओर से हताश होने के बाद माकपा का केंद्रीय नेतृत्व भी बसु की शरण में आया और उनको इस्तीफे के लिए मनाने की जिम्मेवारी बसु को सौंपी। सोमनाथ को बसु का करीबी माना जाता रहा है। बसु ने ही सोमनाथ से इस मामले को ज्यादा तूल नहीं देने की सलाह दी।&lt;br /&gt;सिंगुर और नंदीग्राम जैसे मुद्दों पर भी बसु ने हमेशा उसी बात का समर्थन किया जो उचित था। उन्होंने पार्टी के दूसरे नेताओं की तरह कभी कोई चुभने वाली टिप्पणी नहीं की। अपने लगातार गिरते स्वास्थ्य की वजह से बसु बीते दो चुनावों में पार्टी के लिए चुनाव प्रचार नहीं कर सके थे। उससे पहले 1977 के बाद वही स्टार प्रचारक हुआ करते थे। लेकिन पार्टी ने बीते चुनावों में भी उनका सहारा लिया। बसु के भाषण के वीडियो कैसेट तैयार कर दूर-दराज के गांवों में भेजे गए। ब्रिगेड रैली में भी बसु के भाषण का वीडियो कैसेट चलाया गया। &lt;br /&gt;माकपा के विवादास्पद नेता और पूर्व खेल मंत्री सुभाष चक्रवर्ती बसु के खास लोगों में थे। वे जब तक जिए अपनी टिप्पणियों और कामकाज से सरकार और पार्टी के लिए मुसीबतें पैदा करते रहे। लेकिन बसु का संरक्षण होने की वजह से ही गंभीर से गंभीर गलती करने के बावजूद पार्टी नेतृत्व को कभी सुभाष के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का साहस नहीं हुआ। सुभाष कहते भी थे कि बसु उनको राजनीतिक गुरू हैं। वे उनके अलावा दूसरे किसी नेता की बात को कोई तवज्जों नहीं देते थे। सुभाष और उनकी पत्नी ही हर साल बसु के साल्टलेक स्थित आवास पर धूमधाम से उनका जन्मदिन मनाते थे। बीते साल सुभाष की मौत से बसु काफी दुखी हुए थे। उन्होंने तब कहा था कि जाना मुझे चाहिए था. लेकिन चले गए सुभाष।&lt;br /&gt;बसु अपने जीते-जी ही एक किंवदंती बन गए थे। उनके राजनीतिक कद की वजह से उनको अपनी पार्टी ही नहीं बल्कि विपक्ष का भी पूरा सम्मान हासिल था। माकपा और राज्य सरकार की नाक में दम करने वाली तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी भी बसु का उतना ही सम्मान करती थी जितना कोई माकपा नेता। वे कई बार बसु के बुलावे पर उनके घर गई थीं। सिंगुर व नंदीग्राम आंदोलन के चरम पर होने के समय भी बसु ने ममता को घर पर बुला कर उसे राज्य के हित में समझौता करने का अनुरोध किया था। अब माकपा में बसु के कद का ऐसा कोई दूसरा नेता नहीं हो जिसे घटक दलों का भी पूरा सम्मान हासिल हो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-268134422594882058?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/268134422594882058/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/01/blog-post_5695.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/268134422594882058'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/268134422594882058'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/01/blog-post_5695.html' title='&lt;strong&gt;आखिरी सांस तक मोर्चा के मसीहा बने रहे बसु&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-2822082055442073098</id><published>2010-01-18T00:06:00.000+05:30</published><updated>2010-01-18T00:07:42.375+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ज्योति बसु'/><title type='text'>खूबियों और खामियों भरा रहा कार्यकाल</title><content type='html'>माकपा के सबसे बुजुर्ग नेता ज्योति बसु कोई एक चौथाई सदी तक बंगाल के मुख्यमंत्री रहने के दौरान कई तरह के आंदोलनों और चुनौतियों से जूझते रहे। उनकी बैलेंस शीट में अगर कुछ कामयाबियां रहीं तो कुछ नाकामियां भी थीं। बसु अपने कार्यकाल के दौरान होने वाले तमाम आंदोलनों से अपनी राजनीतिक सूझ-बूझ से निपटते रहे। ऐसे आंदोलनों में अस्सी के दशक में दार्जिलिंग की पहाड़ियों में हुए गोरखालैंड आंदोलन और नब्बे की दशक की शुरूआत में कूचबिहार जिले में हुए तीनबीघा आंदोलन का जिक्र किया जा सकता है।&lt;br /&gt;वर्ष 1985 में सुभाष घीसिंग और उनके समर्थकों ने गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के बैनर तले अलग राज्य की मांग में जोरदार आंदोलन शुरू किया था। लगभग तीन साल तक चले इस आंदोलन के दौरान सैकड़ों लोग मारे गए और करोड़ों की सरकारी संपत्ति नष्ट हो गई। आखिर 14-15 अगस्त, 1988 को केंद्र, राज्य और जीएनएलएफ के बीच तितरफा करार के जरिए पर्वतीय परिषद के गठन पर सहमित बनी। उसके बाद भी घीसिंग जब-जब बेकाबू होते रहे, बसु ने अपने कौशल से उनको शांत किया। कभी धमका कर , कभी फुसला कर तो कभी विकास कार्यों के लिए परिषद को ज्यादा धन दे कर। हांलाकि उस धन से पर्वतीय इलाके का विकास कम हुआ, घीसिंग और उनके करीबियों का ज्यादा। इसे बसु की नाकामी ही माना जाएगा कि पहाड़ी इलाके में शांति बहाल रखने के मकसद से उन्होंने कभी घीसिंग की कार्यशैली पर न तो कोई सवाल उठाया और न ही उस रकम का कोई हिसाब मांगा।&lt;br /&gt;इसी तरह यह बसु की अगुवाई वाली सरकार का ही कौशल था कि 26 जून 1992 को खून का एक कतरा बहाए बिना तीनबीघा गलियारा बांग्लादेश को सौंप दिया गया। उससे पहले तक इस आंदोलन की आक्रामकता देख कर तो लगता था कि उस दिन सैकड़ों लाशें बिछ जाएंगी। आंदोलनकारियों का नारा ही था कि रक्त देबो, प्राण देबों, तीन बीघा देबो ना (खून देंगे, जान देंगे, लेकिन तीनबीघा नहीं देंगे)।&lt;br /&gt;लेकिन बसु के कार्यकाल में राज्य में हजारों की तादाद में कल-कारखाने बंद हुए, लाखों मजदूर बेरोजगार हुए। पढ़े-लिखे बेरोगारों की फौज भी लगातार बढ़ती रही। सरकारी कर्मचारियों में कार्यसंस्कृति लगभग खत्म हो गई। प्राथमिक स्तर पर अंग्रेजी खत्म करने का बसु सरकार का फैसला आज भी बंगाल के पिछड़ेपन की सबसे अहम वजह माना जाता है। कभी पढ़ाई में अव्वल रहने वाला बंगाल लगातार फिसड्डी होता गया। शिक्षा के अलावा इस दौरान स्वास्थ्य सेवाएं भी बदहाल होती गईं। बसु के कार्यकाल में ही उस बंगाल की ऐसी हालत हो गई जिसके बारे में कहा जाता रहा है कि बंगाल जो आज सोचता है, वह बाकी देश कल सोचता है।&lt;br /&gt;बसु की अगुवाई वाली सरकार अपने पूरे कार्यकाल के दौरान भूमि सुधारों का ही ढिंढोरा पीटती रही। हर साल अपनी विदेश यात्राओं को लेकर भी बसु विवादं में फंसते रहे। उनकी उन यात्राओं के दौरान राज्य में अरबों डालर के विदेशी निवेश के सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किए गए। लेकिन उनमें से कितनों पर अमल हुआ और कितनी विदेशी पूंजी का बंगाल में निवेश हुआ, यह पता लगाने के लिए किसी शोध की जरूरत नहीं है। बसु के कार्यकाल में राज्य में ट्रेड यूनियन आंदोलन मजबूत से आक्रामक हो गया। हर जगह लाल झंडे लेकर काम बंद किए गए। हड़ताल व रैलियां रोजमर्रा की बात बन गई। अपने इकलौते पुत्र चंदन बसु की संपत्ति और उनके कारनामों को लेकर भी बसु की कम छीछालेदर नहीं हुई। लेकिन इन सबसे जूझते हुए वे बने रहे और बंगाल में मुख्यमंत्री पद का पर्याय बन गए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-2822082055442073098?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/2822082055442073098/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/01/blog-post_396.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/2822082055442073098'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/2822082055442073098'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/01/blog-post_396.html' title='&lt;strong&gt;खूबियों और खामियों भरा रहा कार्यकाल&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-8642212228606860710</id><published>2010-01-18T00:00:00.004+05:30</published><updated>2010-01-18T00:15:15.245+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ज्योति बसु'/><title type='text'>वामपंथ के एक युग का अवसान</title><content type='html'>&lt;strong&gt;(इस बात का अंदेशा तो पहली जनवरी को उस समय ही पैदा हो गया था जब ज्योति बसु कोलकाता के एक निजी अस्पताल में दाखिल हुए थे. लेकिन बीते शुक्रवार को यह अंदेशा गहरा गया था. आखिर इस जुझारू नेता ने रविवार को अंतिम सांस ली.बसु के निधन पर जनसत्ता के लिए विभिन्न पहलुओं पर कई रिपोर्ट्स लिखी है. उनको साभार यहां दे रहा हूं ताकि ब्लाग पर भी बसु के जीवन के कई अनछुए पहलू सामने आ सकें.----प्रभाकर मणि तिवारी)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;विलक्षण व्यक्तित्व के धनी थे ज्योति बसु&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;वर्ष 1920—महानगर कोलकाता (तब कलकत्ता) में धर्मतल्ला स्थित लोरेटो स्कूल की पहली कक्षा में एक दुबला-पतला, शर्मीला और गोरा लड़का पढ़ता है। कक्षा में उसके अलावा बाकी लड़कियां ही हैं। शायद यह भी उसके शर्मीलेपन की एक वजह है। दूसरे किसी स्कूल में दाखिला नहीं मिला तो पिता ने यह कर उसे यहां भर्ती कर दिया था कि एक साल बर्बाद करने से तो लड़कियों के स्कूल में पढ़ना ही बेहतर है। इसलिए उसे एक साल वहीं पढ़ना पड़ता है।&lt;br /&gt;वर्ष 1930—आक्टर लोनी मोनुमेंट (शहीद मीनार) के पास नेताजी सुभाष चंद्र बोस का भाषण होने वाला है। वह शर्मीला लड़का, जो अब सोलह साल का किशोर हो चुका है और उसकी मसें भींगने लगी हैं, अपने चचेरे भाई के साथ खादी के कपड़े पहने नेताजी को सुनने वहां पहुंच जाता है। मौके पर पुलिस का भारी इंतजाम है। पुलिस लोगों पर लाठियां भांजती है। लोग भागने लगते हैं। लेकिन वे दोनों तय कर लेते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, भागना नहीं है। इस नहीं भागने के निश्चय की वजह से कई लाठियां उसकी पीठ पर भी बरसती हैं। घर पहुंचने पर मां उन चोटों पर हल्दी-चूना लगा देती है।&lt;br /&gt;वर्ष 1946—वामपंथी दल ने कुछ साल पहले ही इंग्लैंड से बैरिस्टरी पास कर लौटे 32 साल के उस शर्मीले युवक को रेलवे क्षेत्र से चुनाव लड़ाने का फैसला किया है। उस युवक का मुकाबला बीए (बंगाल-असम) रेलवे इंप्लाइज यूनियन के अध्यक्ष हुमायूं कबीर से है। कबीर के पीछे कांग्रेस पार्टी की ताकत और पैसा है। वह युवक जानता है कि कबीर को जिताने के लिए जम कर धांधली होगी। फिर भी उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं है। और आखिर में वह कबीर को पछाड़ कर चुनाव जीत जाता है।&lt;br /&gt;वर्ष 2000----पश्चिम बंगाल में बीते 23 वर्षों से वाममोर्चा का राज है। तब से मुख्यमंत्री भी एक ही हैं---ज्योति बसु। उनके नाम सबसे लंबे समय तक किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री रहने का रिकार्ड है। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर रहे गेगांग अपांग इस रिकार्ड को तोड़ सकते थे। लेकिन वे दो साल पहले ही सत्ता से बाहर हो गए हैं। मुख्यमंत्री की अब उम्र हो चली है। स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता। इसलिए अक्तूबर की 27 तारीख को , कभी लोरेटो स्कूल में लड़कियों के बीच पढ़ने वाला वह अकेला लड़का, नेताजी को सुनने के लिए पीठ पर लाठी खाने वाला वह किशोर और विधायक पद के चुनाव में हुमायूं कबीर जैसे दिग्गज को पछाड़ने वाला वह किशोर मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने का एलान कर देता है। अगले ही दिन वाममोर्चा की बैठक में वह इस्तीफा दे देता है जिसे देर रात फैक्स से राज्यपाल के पास भेज दिया जाता है। और लोरेटो के उस शर्मीले लड़के से बंगाल के अभिभावक तक का सफऱ तय करने वाले ज्योति बसु का मुख्यमंत्री के तौर पर पांच नवंबर, 2000 ही आखिरी दिन होता है। अगले दिन से बुद्धदेव भट्टाचार्य यह कुर्सी संभाल लेते हैं।&lt;br /&gt;बसु का जन्म आठ जुलाई, 1914 को महानगर के हैरीसन रोड (अब महात्मा गांधी रोड) स्थित एक घऱ में हुआ था। उनके पिता, चाचा और ताऊ असम के घबड़ी में रहते थे। उनके दादाजी नौकरी के सिलसिले में वहां गए थे। चाचा और ताऊ वकील थे। बसु का पैतृक घर पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में ढाका जिले के बारूदी गांव में था। मामा का घर भी वहीं था। पिता निशिकांत बसु ने असम के डिब्रूगढ़ स्थित बेरी ह्वाइट मेडिकल स्कूल (जिसका नाम अब असम मेडिकल कालेज हो गया है) से चिकित्साशास्त्र में डिग्री हासिल की। ढाका में कुछ दिनों तक प्रैक्टिस करने के बाद वे अमरीका चले गए। वहां आगे की पढ़ाई भी की और नौकरी भी। निशिकांत लगभघ छह साल तक वहां रहे। इसी दौरान वे अपने एक भाई को भी इंजीनियरिंग पढ़ाने वहां ले गए। विदेश से लौटने के बाद निशिकांत कलकत्ता में प्रैक्टिस करने लगे। तब उनका परिवार हिंदुस्तान बिल्डिंग में रहता था जहां बाद में एलीट सिनेमाहाल बना। उनके भाइयों के परिवार भी साथ ही रहते थे।&lt;br /&gt;हिंदुस्तान बिल्डिंग के मालिक नलिनी रंजन सरकार से ही निशिकांत ने हिंदुस्तान पार्क में एक बीघा जमीन खरीदी। तब वहां जंगल था। प्लाट के चारों ओर धान के खेत, नारियल के पेड़ और तालाब थे। वहीं मकान बना कर निशिकांत पूरे परिवार के साथ रहने लगे। तब तक इलाके में सड़कें बनने लगी थीं और ट्राम लाइन बिछाने का काम शुरू हो गया था। यह 1924-25 की बात है। तब ज्योति बसु महज दस साल के थे और सेंट जेवियर्स स्कूल में पढ़ रहे थे।&lt;br /&gt;वर्ष 1930-31 में बसु के सेंट जेवियर्स में पढ़ने के दौरान ही बंगाल में क्रांति का ज्वार आ चुका था। चटगांव में क्रांतिकारी हथियारों के भंडार पर कब्जा कर रहे थे तो जजों और मजिस्ट्रेटों की हत्याएं भी हो रही थी। उसी साल महात्मा गांधी ने भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ अनशन आंदोलन शुरू किया। किशोर मन पर इन घटनाओं का असर पड़ना स्वाभाविक था। बसु पर भी पड़ा। उनके किशोर मन में देश प्रेम की अनुभूति पैदा हुई और भावातिरेक में उन्होंने एलान कर दिया कि आज स्कूल नहीं जाऊंगा। पुत्र के मन का मर्म समझते हुए पिता ने भी बसु से कुछ नहीं कहा और वे उसे लेकर अपने क्लीनिक चले गए।&lt;br /&gt;बसु के ताऊ नलिनीकांत बसु कलकत्ता हाईकोर्ट में जज थे। सेवानिवृत्ति के बाद उनको महानगर के मछुआबाजार बम कांड के अभियुक्त निरंजन सेन और उनके साथियों के खिलाफ सुनवाई के लिए गठित एक विशेष प्राधिकरण का जज बनाया गया। बसु के पिता ने उनको मना भी किया था। बसु और उनके घरवालों को यह बात अच्छी नहीं लगी। ज्योति बसु निरंजन सेन के बारे में ज्यादा कुछ तो नहीं जानते थे। लेकिन उनको यह जरूर मालूम था कि वे लोग जो कुछ कर रहे हैं, देश की आजादी के लिए ही कर रहे हैं। ताऊ जी के जज रहने के दौरान पुलिस ढेर सारी प्रतिबंधित किताबें-साहित्य जब्त कर उनके घर छोड़ जाती थी। उनमें शरतचंद्र की लिखी पथेर दाबी भी थी। बसु ने चोरी-छिपे इस किताब को पढ़ लिया। वर्ष 1930 में जब चटगांव में हथियारों के भंडार पर क्रातिंकारियों का कब्जा हुआ तब यह खबर फैली कि इसमें बंगालियों का कोई हाथ नहीं है। तब किसी को भी इस बात पर यकीन नहीं था कि बंगाली ऐसा कर सकते हैं। इसका खुलासा बाद में हुआ। उस समय सेंट जेवियर्स के पादरियों ने जब इस कांड के खिलाफ परचे बांटे तो बसु ने इसका विरोध किया। उनकी दलील थी कि यह काम तो देशहित में है।&lt;br /&gt;सेंट जेवियर्स में स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद बसु ने आगे की पढ़ाई के लिए प्रेसीडेंसी कालेज में दाखिला लिया। वहां आनर्स के साथ डिग्री लेने के बाद 21 साल की उम्र में बैरिस्टरी पढ़ने के लिए वे इंग्लैंड रवाना हो गए। बसु वहां चार साल तक रहे और सच कहा जाए तो बसु के मन में वामपंथी आंदोलन के बीज इंग्लैंड में रहने के दौरान ही पड़े। यूरोप में होने वाली तत्कालीन उथल-पुथल ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई। तब हिटलर और मुसोलिनी के डंके बज रहे थे। इंग्लैंड के तमाम विश्वविद्यालय राजनीतिक विचार-विमर्श के केंद्र बन चुके थे। उस समय कृष्ण मेनन इंडिया लीग के सर्वेसर्वा थे। लीग ने विदेशों में रहने वाले भारतीयों के दिलों में देश की आजादी का अलख जगाने की दिशा में सराहनीय काम किया था। उसी समय बसु भी मेनन के संपर्क में आए और धीरे-धीरे उनमें काफी घनिष्ठता पैदा हो गई। उन्हीं दिनों भूपेश गुप्ता भी लंदन पहुंचे। उनलोगों का एक गुट बन गया।&lt;br /&gt;इन छात्रों ने इंग्लैंड के कई प्रमुख वामपंथी नेताओं के साथ मेलजोल बढ़ाया। इनमें हैरी पोलिट, रजनी पाम दत्त और वेन ब्राडले के नाम उल्लेखनीय हैं। बसु की अगुवाई में वहां भारतीय छात्रों को एकजुट करने का अभियान भी शुरू हुआ। लंदन, कैंब्रिज और आक्फोर्ड विश्वविद्यालयों में भारतीय छात्रों के गुट बन गए। गुट के सभी सदस्य वामपंथी विचारधारा के थे। इनमें रजनी पटेल, पी.एन. हक्सर, मोहन कुमार मंगलम, पार्वती मंगलम, इंद्रजीत गुप्त, रेणु चक्रवर्ती, निखिल चक्रवर्ती, अरुण बोस और एन.के.कृष्णन प्रमुख थे। भारतीय छात्रों को एकजुट कर लंदन मजलिस का गठन होने के बाद बसु ही इसके संस्थापक सचिव बने। मजलिस की बैठकों में फिरोज गांधी भी मौजूद रहते थे। वे इंडिया लीग के सक्रिय नेता थे। स्पेन के गृहयुद्ध के दौरान अलगाववादी फ्रांको के खिलाफ ब्रिटिश वामपंथी नेताओं के मौदान में उतरने की घटना ने बसु के युवा मन पर काफी असर डाला और उन्होंने धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति में उतरने का फैसला किया। उसी दौरान उनमें मार्क्सवादी साहित्य के प्रति भी रुझान बढ़ा।&lt;br /&gt;कृष्ण मेनन ने ही बसु को नेहरु से मिलवाया था। बैरिस्टरी की परीक्षा देकर बसु 1940 में भारत लौट आए। यह तो लंदन में ही तय हो गया था कि स्वदेश लौट कर पूरी तरह पार्टी का काम करना है। तब तक विश्वयुद्ध भी शुरू हो गया था। बसु ने बैरिस्टर के तौर पर कलकत्ता हाईकोर्ट में अपना नाम तो दर्ज कराया था। लेकिन उन्होंने कभी प्रैक्टिस नहीं की। बसु के पिता उनके इस पैसले से नाराज थे। वे सोचते थे कि जब देशबंधु चित्तरंजन दास बैरिस्टरी और राजनीति एक साथ कर सकते हैं तो यह लड़का (बसु) ऐसा क्यों नहीं कर सकता। इसबीच, पिता ने उनकी शादी भी करा दी। वैसे, खुद बसु विवाह के पक्ष में नहीं थे। वे जानते थे कि जीवन की लड़ाई बहुत कठिन है। विवाह के कुछ दिनों बाद ही उनकी पत्नी का निधन हो गया। बसु ने जब पूर्णकालिक कार्यकर्ता के तौर पर काम शुरू किया तब पार्टी पर प्रतिबंध लगा था। सो, सब काम गोपनीय तरीके से ही करना पड़ता था। वर्ष 1942 की अगस्त क्रांति से कुछ दिनों पहले पार्टी से प्रतिबंध हटाया गया। वामपंथियों ने उस समय भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था। उनकी दलील थी कि अभी आंदोलन का सही समय नहीं आया है। इस वजह से पार्टी को देश भर में जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा। वर्ष 1945 में पार्टी की पोलित ब्यूरो ने बसु को प्रदेश समिति का संयोजक मनोनीत कर दिया।&lt;br /&gt;इससे पहले पार्टी ने बसु को मजदूरों को संगठित करने का काम सौंपा था। जब वे बंदरगाह और डाक मजदूरों के बीच पैठ नहीं बना सके तो उनको रेलवे मजदूरों के बीच भेजा गया। बसु ने पूर्वी बंगाल से असम तक घूम कर बी.ए.(बंगाल असम) रेलवे वर्कर यूनियन का गठन किया। वे इसके पहले महासचिव बने। यूनियन के अध्यक्ष बने बंकिम मुखर्जी। रेलवे यूनियन और दूसरी ट्रेड यूनियन गतिविधियों ने ही बसु को मांज कर चमकाया। उनकी अगुवाई में ही एक दिन की ऐतिहासिक रेल हड़ताल भी हुई। नेतृत्व के उनके गुण को ध्यान में रख कर ही पार्टी ने 1946 में हुए विधानसभा चुनाव में बसु को रेलवे क्षेत्र से उम्मीदवार बनाने का फैसला किया। उस चुनाव में कम अंतर से ही, लेकिन बसु जीत गए। उनकी पार्टी के दो और लोग तब चुनाव जीते थे। दार्जिलिंग से रतनलाल ब्राह्मण और दिनाजपुर से रूप नारायण राय। उस चुनाव के बाद बंगाल में सोहरावर्दी की अगुवाई में मुस्सलिम लीग की सरकार बनी थी। बाद में बसु को कानून सभा का भी सदस्य चुना गया। बसु और दूसरे नेताओं ने 16 अगस्त, 1946 को बंगाल में होने वाले दंगों के दौरान जान हथेली पर ले कर काम किया। बसु ने माना था कि उस दंगे में कलकत्ता में 20 हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे। दंगों के बाद राहत और पुनर्वास के काम में भी पार्टी ने अहम भूमिका निभाई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री सोहरावर्दी ने इस बात के लिए नेताओं की सराहना की थी। &lt;br /&gt;वर्ष 1947 की शुरूआत में ऐतिहासिक तेभागा आंदोलन के दौरान भी बसु ने अहम भूमिका निभाई थी। किसानों की मांग थी कि फसल का दो-तिहाई हिस्सा उनको मिलना चाहिए। भू-राजस्व आयोग ने 1940 में किसानों की यह मांग मान ली थी। लेकिन उसकी सिफारिशों को ठंढे बस्ते में डाल दिया गया था। 27 मार्च, 1948 को भाकपा की राज्य समिति पर प्रतिबंध लगाकार उसके तमाम बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इनमें ज्योति बसु भी थे। यह उनकी पहली जेल यात्रा थी। उनको प्रेसीडेंसी जेल में रखा गया। तीन महीने बाद वे इस शर्त पर जेल से रिहा हुए कि पुलिस को सूचित किए बिना अपना पता नहीं बदलेंगे। उन्हीं दिनों अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस में शिरकत करने बसु बंबई गए। पुलिस ने इसे पता बदलना माना और रास्ते में ही खड़गपुर स्टेशन पर उनको गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में जमानत तो मिल गई, लेकिन साथ ही हर सप्ताह थाने में हाजिरी देने की शर्त भी जोड़ दी गई। इसबीच, पांच दिसंबर, 1948 को बसु दूसरी बार विवाह बंधन में बंधे। यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं है कि वामपंथी के अभिभावक का दर्जा हासिल करने वाले बसु की मंशा पर उसी साल पार्टी नेतृत्व ने भी सवाल उठाया था। उनको बाकायदा पत्र लिख कर कैफियत मांगी गई कि वे भूमिगत रह कर काम क्यों नहीं करते। उनकी दूसरी शादी पर भी सवाल उठाए गए। बसु ने जवाब दिया कि वे पार्टी के निर्देश और नीतियों के अनुरूप ही काम कर रहे हैं। बाद में बसु को लंबे अरसे तक भूमिगत रहना पड़ा था।&lt;br /&gt;18 जनवरी, 1952 को हुए विधानसभा चुनाव में बसु बरानगर सीट से चुनाव जीत गए। उनको 45 फीसद से भी ज्यादा वोट मिले थे। उन्होंने कांग्रेस के राय हरेंद्र नाथ चौधरी, जो डा. विधानचंद्र राय सरकार में मंत्री थे, को पराजित किया। चुनाव के बाद गठित विधानसभा में काफी हील-हुज्जत के बाद वामपंथी पार्टी को विरोधी दल और बसु को विपक्ष के नेता के तौर पर स्वीकृति मिली। इस दौरान एक ओर जहां बसु की राजनीतिक गतिविधियां बढ़ीं, वहीं उनका परिवार भी बढ़ा। सितंबर, 1952 में वे एक बच्चे के पिता बने। उसका नाम चंदन रखा गया। वही बसु की इकलौती संतान है। बसु के जेल में रहने या भूमिगत रहने पर उनकी पत्नी कमल बसु अपने पिता वीरेन बसु के घर चली जाती थी। कई बार बसु भी छिप कर वहीं रहे।&lt;br /&gt;धीरे-धीरे दिन बीतते रहे। राज्य में साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में नक्सल आंदोलन ने भी जोर पकड़ा। बसु उसी समय राज्य में बनी साझा सरकार में उपमुख्यमंत्री बने। लेकिन यह सरकार ज्यादा दिनों तक चल नहीं सकी। उसके बाद राज्य में फिर कांग्रेस सत्ता में आई। इमरजंसी खत्म हने के बाद 1977 में हुए विधानसभा चुनाव में वाममोर्चा भारी बहुमत के साथ जीत कर सत्ता में आया। ज्योति बसु उसके पहले मुख्यमंत्री बने और तमाम रिकार्ड बनाते हुए 23 साल से भी लंबे अरसे तक इस पद पर बने रहे। उन्होंने लंबे समय तक मुख्यमंत्री पद पर रहने का एक अनूठा विश्वरिकार्ड बनाया। लेकिन उनकी नजरों में इस रिकार्ड की कोई अहमियत नहीं थी। नवंबर, 2000 में यह कुर्सी छोड़ते हुए उन्होंने कहा था कि यह महत्वपूर्ण नहीं है कि मैं इतने लंबे अरसे तक पद पर बना रहा। उससे ज्यादा महत्वपूर्ण वाममोर्चे का सत्ता में बने रहना है।&lt;br /&gt;वर्ष 1991 और खासकर 1996 के विधानसभा चुनावों में वाममोर्चे को जिताने के बाद बसु की छवि मोर्चे और राज्य की राजनीति में एक मसीहा जैसी हो गई। तब तक वे इतने लंबे अरसे तक राज कर चुके थे कि नई पीढ़ी के लोगों को यह याद करने और बताने में मुश्किल होती थी कि उनके पहले राज्य का मुख्यमंत्री कौन था। उस समय तक बसु राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी एक विशिष्ट पहचान बना चुके थे। तब तक वे अस्सी पार कर चुके थे। उन पर बढ़ती उम्र का असर कहें या दबाव, पहली बार 1996 के चुनावों के समय ही नजर आया था। तब लोकसभा और विधानसभा चे चुनाव एक साथ ही हुए थे। बसु ने अपनी ढलती उम्र और गिरते स्वास्थ्य का हवाला देकर चुनाव नहीं लड़ने की इच्छा जताई थी। लेकिन पार्टी के दबाव के आगे उनको अंततः झुकना ही पड़ा। वे लड़े और लगातार पांचवीं बार जीते भी। लेकिन जीत का अंतर कम हो गया था। इसकी वजह थी इलाके के लोगों का असंतोष। जिस विधानसभा क्षेत्र से जीत कर कोई नेता लगातार पांचवीं बार मुख्यमंत्री बने, अगर उस इलाके में लोगों को ढांचागत सुविधाएं भी मुहैया नहीं हों तो असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।&lt;br /&gt;नई ऊंचाइयों को छूने के बावजूद बसु हमेशा एक अनुशासित कामरेड रहे। पार्टी का निर्देश ही उनके लिए सबसे ऊपर होता था। ऐसा नहीं होता तो वर्ष 1996 में पार्टी का निर्देश मान कर उन्होंने चुपचाप प्रधानमंत्री की कुर्सी को हाथ से नहीं निकल जाने दिया होता। वह कुर्सी उनको तश्तरी में रख कर पेश की गई थी। बस, हां कहने की देर थी और बसु राष्ट्रपति भवन में प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे होते। बसु इसके लिए तैयार थे। लेकिन पोलितब्यूरो ने मना कर दिया। तब अगर उनकी पार्टी ने रोड़ा नहीं अटकाया होता तो आज इतिहास में एक और अध्याय जुड़ गया होता। सरकार का मुखिया नहीं बन पाने का मलाल बसु को जीवन भर कटोटता रहा। इसलिए बाद में अपनी जीवनी में उन्होंने इसे एक ऐतिहासिक भूल करार दिया।&lt;br /&gt;वर्ष 2000 के पहले भी उन्होंने कई बार मुख्यमंत्री का पद छोड़ने की इच्छा जताई थी। लेकिन पार्टी के अनुरोध पर वे बने रहे। एक बार तो तत्कालीन महासचिव सुरजीत सिंह ने उको यह कह कर मना लिया कि आपके हटते ही राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो जाएगा। उन दिनों बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू होने की अटकलें तेज थीं। राज्य की कानून व व्यवस्था की स्थिति पर तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी और बसु के बीच बाकायदा पत्र युद्ध छिड़ा था। तब तो वे मान गए। लेकिन उसके कोई दो महीने बाद ही उन्होंने पार्टी से सलाह-मशविरे के बाद सरकार से संन्यास का एलान कर दिया।&lt;br /&gt;बसु ने बंगाल में लंबे अरसे तक राज किया। इसलिए उनकी बैलेंस शीट में उपलब्धियों के साथ नाकामियों का होना भी स्वाभाविक है। लेकिन अपनी तमाम खूबियों और खामियं के बावजूद ज्योति बसु अपने जीते-जी ही किंवदंती बन गए थे। वे आखिरी दम तक मार्क्सवाद के सिद्धांतों पर पूरी शिद्दत से चलते हुए सिर्फ माकपा ही नहीं, ब्लकि पूरे वाममोर्चा के मसीहा और संरक्षक बने रहे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-8642212228606860710?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/8642212228606860710/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/01/blog-post_18.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/8642212228606860710'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/8642212228606860710'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/01/blog-post_18.html' title='&lt;strong&gt;वामपंथ के एक युग का अवसान&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' 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उनकी भी कामकाज की व्यस्तताएं होंगी. अब उनमें से कुछ ही याद करते हैं. बाकी लोग संपादक या उसके बराबर हो गए हैं. बड़े शहरों में. कुछ ऐसे भी हैं जो सिर्फ काम पड़ने पर याद करते हैं. मैं चाह कर भी वैसा नहीं हो पाता. कुछ मित्र, परिचित ऐसे हैं जिनसे लगातार संपर्क में रहता हूं. इसलिए नहीं कि उनसे कोई काम पड़ सकता है. बल्कि इसलिए इतने लंबे करियर में कहीं न कहीं साथ काम किया था. कुछ अच्छी यादें जुड़ी हैं. उनको ताजा करने के लिए उनसे मेल और फोन से संपर्क रहता है. &lt;br /&gt;कई लोगों से साल में एकाध बार नए साल या दीवाली के मौके पर ही बात हो पाती है. लेकिन इस दौर में महानगरीय जीवन और पत्रकारिता के पेशे की व्यस्तताओं के बीच यही क्या कम है.&lt;br /&gt;बहरहाल, अब कोशिश करूंगा कि ब्लाग पर इतना लंबा अवकाश नहीं हो.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-5044933982817279469?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/5044933982817279469/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/01/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/5044933982817279469'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/5044933982817279469'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;इसलिए चुप थी कलम&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-496126622521871532</id><published>2009-11-06T11:32:00.006+05:30</published><updated>2009-11-06T14:48:27.223+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><title type='text'>इंतजार लेख का, खबर निधन की....</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SvPp2nLJwLI/AAAAAAAAAVQ/goEf6lH3CCk/s1600-h/22.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 164px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SvPp2nLJwLI/AAAAAAAAAVQ/goEf6lH3CCk/s200/22.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5400917502585323698" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;छह नवंबर की यह सुबह भी आम दिनों की तरह ही थी. लेकिन कल रात भारत-आस्ट्रेलिया का मैच देखने और सचिन के 17 हजार रन पूरे होने के बाद मैं सोच रहा था कि कल प्रभाष जोशी सचिन पर जरूर कोई जबरदस्त पीस लिखेंगे. कल जरूर पढ़ना है. यही सोचते हुए मैं सो गया. लेकिन तड़के ही एक मित्र ने फोन पर यह सूचना दी तो मुझे सहसा ही भरोसा नहीं हुआ. सोचा शायद नींद में कुछ गलत सुन लिया है. दोबारा पूछा और वही जवाब मिला तो भरोसा हो गया. कई पुरानी मुलाकातें आंखों के सामने सजीव हो उठीं. मैं कोई 19 साल पीछे लौट गया.&lt;br /&gt;वह अक्तूबर, 1991 की कोई तारीख थी. तब मैं गुवाहाटी से प्रकाशित हिंदी दैनिक पूर्वांचल प्रहरी में काम करता था. उन दिनों कोलकाता (तब कलकत्ता) से जनसत्ता निकालने की तैयारियां जोर-शोर से चल रही थीं. खुद मेरे अखबार के अलावा सेंटिनल के दर्जनों लोगों ने वहां अप्लाई किया था और लिखित परीक्षा दे आए थे. मेरी भी इच्छा तो थी लेकिन मैंने आवेदन नहीं भेजा था. उसी दौरान एक दिन राय साब (राम बहादुर राय) गुवाहाटी पहुंचे. उन्होंने मुझे सर्किट हाउस में आ कर मिलने का संदेश दिया. वह उनसे मेरी पहली मुलाकात थी. मिलने पर उन्होंने पहला सवाल किया कि आपने आवेदन क्यों नहीं भेजा. दरअसल, इस सवाल की वजह थी. पूर्वांचल प्रहरी में रहते हुए मैंने मई,91 में पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनावों पर जनसत्ता (दिल्ली) के लिए काफी लिखा था. शायद राय साब को मेरी रिपोर्टिंग पसंद आई थी. मैंने कहा कि कोई खास वजह नहीं है. बस यूं ही. &lt;br /&gt;राय साब मुझे गुवाहाटी में रखना चाहते थे. लेकिन मैंने कहा कि अगर सिलीगुड़ी में रहने का मौका मिले तो मुझे खुशी होगी. उन्होंने बाकी बाातें की और फिर कहा कि आप दो-तीन पेज में लिख कर दीजिए कि जनसत्ता को सिलीगुड़ी में एक कार्यालय संवाददाता क्यों रखना चाहिए. मैंने वहीं बैठे-बैठे लिख कर दे दिया. अगर कोई अखबार कलकत्ता से निकालना था तो वह सिलीगुड़ी की अनदेखी नहीं कर सकता था. सिलीगुड़ी कलकत्ता के बाद बंगाल का दूसरा सबसे बड़ा शहर तो है ही, उत्तर बंगाल की अघोषित राजधानी भी है. नेपाल, सिक्किम, भूटान, नेपाल और बांग्लादेश की सीमा से लगे इस शहर का रणनीतिक महत्व भी है. सिलीगुड़ी का गलियारा ही पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है. खैर, राय साब वह पत्र ले कर दिल्ली लौट गए. मैं भी रोजमर्रा के कामकाज में वह बात भूल गया. लेकिन एक हफ्ते बाद जब दफ्तर पहुंचा तो पता चला कि इंडियन एक्प्रेस के गुवाहाटी दफ्तर से फोन आया था मेरे लिए. तब एसएमएस बोरदोलोई वहां मैनेजर थे, जो बाद में मेरे करीबी मित्र बन गए. मैंने फोन किया तो पता चला कि दिल्ली से टेलीप्रिंटर पर संदेश आया है कि प्रभाष जी 22 अक्तूबर को कलकत्ता में मिलना चाहते हैं.&lt;br /&gt;उस समय मैं गुवाहाटी में अकेला था. दुर्गापूजा होने की वजह से पत्नी सिलीगुड़ी गई थी. मैं अगले दिन सिलीगुड़ी पहुंचा और वहां एक दिन रुक कर किसी को कुछ बताए बिना अगले दिन कोलकाता. सुबह तैयार हो कर कलकत्ता के चौरंगी स्थित इंडियन एक्सप्रेस के कार्यालय में बैठ कर हम लोग प्रभाष जी का इंतजार करने लगे. मेरे साथ अमरनाथ भी थे जो गुवाहाटी में जनसत्ता से जुड़े. एक घंटे इंतजार करने के बाद खबर मिली की प्रभाष जी की तबियत कुछ ठीक नहीं है. इसलिए हमें होटल में ही बुलाया है. हम वहीं बगल में होटल ओबराय ग्रैंड स्थित उनके कमरे तक पहुंचे. तब तक मन में काफी झिझक थी. इतने बड़े संपादक-पत्रकार से पहली मुलाकात जो थी. लेकिन उनसे मिल कर सारी झिझक एक पल में दूर हो गई. उन्होंने कहा कि आपका पत्र पढ़ने के बाद ही हमने आपको सिलीगुड़ी में रखने का फैसला किया है. उससे पहले सिलीगुड़ी के लिए एक अंशकालीन संवाददाता रखा जा चुका था. उन्होंने कामकाज के बारे में कोई सवाल नहीं पूछा. फिर वहीं होटल के पैड पर ही आफर लेटर लिख कर थमा दिया. मैं अगले दिन सिलीगुड़ी लौट आया.&lt;br /&gt;उसके बाद जनसत्ता के स्थापना दिवस पर होने वाले समारोहों में उनसे मुलाकात होती थी. बाद में वह सिलसिला खत्म हो गया.  इसबीच, जून 1997 में मेरा तबादला गुवाहाटी हो गया. कोई साल भऱ बाद प्रधानमंत्री का दौरा कवर करने के लिए मैं शिलांग गया था. वहां से घर फोन करने पर पता चला कि प्रभाष जी ने फोन किया था और मुझसे बात कराने को कहा है. उन्होंने अपना नंबर छोड़ रखा था. मैंने शिलांग से फोन किया तो प्रभाष जी ने कहा कि अरे भाई, जीएल (जीएल अग्रवाल, पूर्वांचल प्रहरी के मालिक व संपादक) से कहो कि आ जाएं. वे किसी सम्मेलन में जीएल को बुलाना चाहते थे. मैंने जीएल अग्रवाल को भी बता दिया. बाद में शायद वे गए नहीं. उसके बाद लंबे अरसे तक प्रभाष जी से कोई मुलाकात नहीं हुई. कोलकाता तबादला होने पर एक बार भाषा परिषद में मुलाकात हुई थी. मैं क्रिकेट पर लिखे उनके लेखों का मुरीद रहा शुरू से ही. शायद इसकी वजह यह रही हो कि मैं भी क्लब स्तर से क्रिकेट खेलता रहा हूं. बाद में जनसत्ता के लिए भी मैंने कई एकदिनी मैचों और आईपीएल के पहले सीजन की रिपोर्टिंग की है. मैं अपने अखबार में खेल संवाददाता नहीं हूं. लेकिन गुवाहाटी और अब कोलकाता में क्रिकेट की रिपोर्टिंग का कोई मौका नहीं चूकता. सचिन के 17 हजार रन पूरे होने के मौके पर मैं आज सुबह के अखबार में उनका लेख पढ़ने का इंतजार कर रहा था. लेकिन उसकी जगह मिली उनके जाने की दुखद सूचना.&lt;br /&gt;प्रभाष जी मेरी आखिरी मुलाकात बीते साल नवंबर में बनारस में हुई. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की ओर से पराड़कर जयंती पर बनारस में एक आयोजन था. कुलपति अच्युतानंद मिश्र जी ने कहा था कि मौका मिले तो आ जाइए. मैं वहां पहुंच गया. समारोह स्थल पर कुछ देर में प्रभाष जी नामवर सिंह के साथ पहुंचे. मैंने नमस्ते की तो कंधे पर हाथ रख कर कहा कि कैसे हो पंडित? तुम्हारा लिखा तो पढ़ता रहता हूं. समारोह के बाद वे उसी दिन दिल्ली लौट गए.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-496126622521871532?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/496126622521871532/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/11/blog-post.html#comment-form' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/496126622521871532'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/496126622521871532'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;इंतजार लेख का, खबर निधन की....&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SvPp2nLJwLI/AAAAAAAAAVQ/goEf6lH3CCk/s72-c/22.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-5374135717312645423</id><published>2009-10-24T19:56:00.001+05:30</published><updated>2009-10-24T19:59:09.628+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेट्रो रेल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कोलकाता'/><title type='text'>महज एक ट्रेन नहीं, संस्कृति भी है मेट्रो</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SuMO6SbdGwI/AAAAAAAAAU4/hqqpVHtFlXE/s1600-h/Metro-4.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 133px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SuMO6SbdGwI/AAAAAAAAAU4/hqqpVHtFlXE/s200/Metro-4.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5396173173062179586" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;देश की पहली मेट्रो रेल शनिवार यानी 24 अक्तूबर को अपने सफर के 25 साल पूरे कर लिए हैं. वर्ष 1984 में इसी दिन पहली मेट्रो ट्रेन ने कोलकाता में धर्मतल्ला से भवानीपुर तक की दूरी तय की थी. अपनी चौथाई सदी के सफर में इस भूमिगत सेवा ने महानगर के लोगों की रहन-सहन में बदलाव तो किया ही है, इसकी संस्कृति भी काफी हद तक बदल दी है. मेट्रो की शुरूआत के बाद महानगर में जो नई संस्कृति विकसित होने लगी थी, वह अब युवास्था में पहुंच गई है. अब हाल में मेट्रो के विस्तार के बाद इसके पांच स्टेशन जमीन से ऊपर बने हैं. पहले सिर्फ दमदम और टालीगंज (अब महानायक उत्तम कुमार) ही जमीन पर थे और बाकी जमीन के भीतर.&lt;br /&gt;देश में अपने किस्म की इस पहली परियोजना का शिलान्यास तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 29 दिसंबर, 1972 को किया था. इसका निर्माण कार्य 1972 में शुरू हुआ था. लेकिन महानगर के उत्तरी सिरे को दक्षिण से जोड़ने वाली इस परियोजना में जमीन अधिग्रहण जैसी बाधाओं की वजह से इस पर पहली ट्रेन 24 अक्तूबर,1984 को चली. उसके बाद इसे टालीगंज तक बढ़ाया गया. धन की कमी से से भी इसका काम प्रभावित हुआ. बाद में कोई छह बरसों तक विभिन्न वजहों से परियोजना लगभग ठप रही. आखिर में दमदम से टालीगंज तक 16.45 किमी की दूरी के बीच मेट्रो का सफर 1995 में शुरू हुआ. उस समय जमीन के लगभग सौ फीट नीचे सुरंग बना कर उसमें ट्रेन चलाना इंजीनियरिंग की सबसे बड़ी चुनौती माना गया था. अब इसी साल 22 अगस्त को टालीगंज के बाद पांच नए स्टेशन इसमें जुड़े हैं.&lt;br /&gt;अपने तय समय और लागत के मुकाबले देरी और कई गुना खर्च से पूरी होने वाली इस परियोजना ने महानगर के लोगों के लिए परिवहन का मतलब ही बदल दिया. पहले बसों के अलावा ट्रामें ही कोलकाता में परिवहन का सुलभ साधन थीं. लेकिन सड़कों पर जाम की वजह से इस सफऱ में काफी वक्त लगता था. मेट्रो ने लोगों का वक्त बचाया. जो दूरी बसों के जरिए दो घंटे में पूरी होती थी, वह अब महज आधे घंटे में हो जाती है. इस भूमिगत ट्रेन ने लोगों की आदतें भी बदल डाली. पहले बसों और ट्रामों में सफऱ के दौरान लोगों को बीड़ी-सिगरेट पीने और जहां-तहां पान की पीक फेंकने की आदत थी. लेकिन मेट्रो में शुरू से ही इन चीजों पर पाबंदी लग थी. इस ट्रेन ने यात्रियों को काफी हद तक प्रदूषण से निजात दिला दी.&lt;br /&gt;बीते 15 बरसों से मेट्रो में सफर करने वाले सरकारी कर्मचारी विमल कांति दास कहते हैं कि ‘मेट्रो ने हमारी उम्र में कई साल जोड़ दिए. पहले दफ्तर आने-जाने में ही कई घंटे लग जाते थे. अब यह कीमत समय बच जाता है.’ इसके अलावा प्रदूषण से मुक्ति भी मिल गई है. मेट्रो में सफऱ करने वाली एक महिला श्यामली कहती हैं कि ‘मेट्रो ने लोगों की आदतें बदल दी हैं. मेट्रो शुरू होने के बाद ही लोगों को समय की कीमत समझ में आई. पहले दफ्तर आने-जाने में समय तो ज्यादा लगता ही था, थकान भी बहुत होती थी. अब इन ट्रेनों में भीड़ के बावजूद लोग कुछ मिनटों के भीतर ही अपने मुकाम तक पहुंच जाते हैं.’ वे कहती हैं कि ‘मेट्रो का सफर तो टैक्सी के मुकाबले भी आरामदेह है. उससे बेहद सस्ता तो है ही.’ &lt;br /&gt;मेट्रो के पहले सफऱ के समय इसके चीफ इंजीनियर रहे अशोक सेनगुप्ता पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि ‘यह परियोजना उस समय इंजीनियरिंग की सबसे बड़ी और कठन चुनौती थी.’ वे बताते हैं कि ‘इस परियोजना की डिजाइन से लेकर इसमें इस्तेमाल तमाम उपकरण भारत में ही बने थे. इसके निर्माण के दौरान कई अप्रत्याशित चुनौतियों से जूझना पड़ा. लेकिन हमने हिम्मत नहीं हारी. धर्मतल्ला यानी एस्पलानेड से भवानीपुर (अब नेताजी भवन) के बीच जब पहली मेट्रो ट्रेन चली तो हमें लगा कि सारी मेहनत सफल हो गई.’ सेनगुप्ता भी कहते हैं कि मेट्रो ने लोगों की आदतों में बदलाव आया है. सरे राह थूकने वाले लोग मेट्रो में थूकने से परहेज करते हैं. &lt;br /&gt;यानी एक चौथाई सदी के अपने सफर में इस रेल ने सिर्फ लोगों का समय ही नहीं बचाया, बल्कि उनकी कई बुरी आदतें भी बदल दी हैं. और अब तो इस मेट्रो को देखते, इसमें सफर करते और इसकी संस्कृति में पली एक पूरी पीढ़ी जवान हो चुकी है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-5374135717312645423?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/5374135717312645423/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/10/blog-post_24.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/5374135717312645423'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/5374135717312645423'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/10/blog-post_24.html' title='&lt;strong&gt;महज एक ट्रेन नहीं, संस्कृति भी है मेट्रो&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SuMO6SbdGwI/AAAAAAAAAU4/hqqpVHtFlXE/s72-c/Metro-4.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-920856125641330344</id><published>2009-10-17T15:46:00.001+05:30</published><updated>2009-10-17T15:48:10.622+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'> उनकी ज़िंदगी से जुड़े हैं पटाखे</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/StmZ1HSXDVI/AAAAAAAAAUw/qnEIDAuxzOI/s1600-h/Nungi-Patakha.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 188px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/StmZ1HSXDVI/AAAAAAAAAUw/qnEIDAuxzOI/s200/Nungi-Patakha.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5393511166521052498" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दीवाली को खुशियों का त्योहार माना जाता है. लेकिन पश्चिम बंगाल में राजधानी कोलकाता से सटे नुंगी गांव में यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि रोजीरोटी का जरिया भी है. यानी उनके लिए यह दोहरी खुशी का मौका है. पहली तो यह कि दीवाली उनके लिए भी खुशियों का त्योहार है और दूसरी यह कि दीवाली उनके लिए पूरे साल की मेहनत का नतीजा लेकर आती है. दरअसल, इस गांव में घर-घर में खासकर महिलाओं के हाथों बनने वाले पटाखों से ही पूरे साल घर का खर्च निकलता है. दक्षिण 24-परगना जिले में स्थानीय लोगों के बीच यह गांव पटाखा गांव के तौर पर मशहूर है.गांव की सीमा के पास पहुंचते हुए हवा में बारूद की गंध आने लगती है. गांव की हर उम्र की महिलाएं दीवाली के बहुत पहले से पटाखे बनाना शुरू कर देती हैं. यहां बनने वाले पटाखों की बंगाल के अलावा पड़ोसी झारखंड और बिहार समेत देश के दूसरे शहरों में भारी मांग है. गांव का हर लगभग परिवार इस काम से जुड़ा है. यह कहना सही होगा कि पटाखा निर्माण यहां कुटीर उद्योग बन गया है. सुजाता दास कहती है कि ‘गांव में लगभग तीन हजार महिलाएं पटाखा बनाती हैं. हमारे पटाखों की पूरे देश में अच्छी मांग है. हम यहां तरह-तरह के पटाखे बनाते हैं.’ सुजाता बचपन से ही यह काम कर रही है.पटाखा बनाने के काम में जुड़ी बर्नाली कहती है कि ‘पटाखे हमारी रोजी-रोटी का जरिया हैं. हम पूरे साल दीवाली का इंतजार करते हैं और इसके लिए तरह-तरह के पटाखे बनाते हैं. वह बताती है कि हर साल पटाखों की डिजाइन बदल दी जाती है. लोग हर बार कुछ नया चाहते हैं.’ इसी गांव की सादिया कहती है कि ‘यह पटाखों का गांव है. हमारी पूरी जिंदगी ही पटाखों से जुड़ी है.’&lt;br /&gt;गांव में पटाखों के धंधे से जुड़े बासुदेव दास कहते हैं कि ‘यहां बनी चकरी और रॉकेट की दूसरे शहरों में काफी मांग है.’ वे बताते हैं कि गांव की बुजुर्ग महिलाएं पटाखे बनाने की कला युवतियों को सिखाती हैं.कुछ साल पहले राज्य में तेज आवाज वाले पटाखों पर पाबंदी लगने के बाद इस गांव को कुछ नुकसान उठाना पड़ा था. लेकिन अब इन महिलाओं ने कम आवाज और रंग-बिरंगी रोशनियों वाली फूलझड़ियां बनाना सीख लिया है. गांव के ही देवप्रिय दास कहते हैं कि यहां बनने वाले पटाखों की क्वालिटी बेहतर होने की वजह से ही इनकी काफी मांग है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-920856125641330344?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/920856125641330344/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/10/blog-post_17.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/920856125641330344'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/920856125641330344'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/10/blog-post_17.html' title='&lt;strong&gt; उनकी ज़िंदगी से जुड़े हैं पटाखे&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/StmZ1HSXDVI/AAAAAAAAAUw/qnEIDAuxzOI/s72-c/Nungi-Patakha.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-5935970485714258943</id><published>2009-10-14T10:05:00.003+05:30</published><updated>2009-10-15T12:05:16.806+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिनेमा'/><title type='text'>सात समंदर पार चला बांग्ला सिनेमा</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/StVVl19DoTI/AAAAAAAAAUQ/mJJIEEP25Pk/s1600-h/Dujone+Poster.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 118px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/StVVl19DoTI/AAAAAAAAAUQ/mJJIEEP25Pk/s200/Dujone+Poster.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5392310237472727346" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बांग्ला सिनेमा अब सात समंदर पार अमेरिका पहुंच गया है. अमेरिका और यूरोप में अब तक हिंदी और तमिल फिल्मों का ही व्यावसाइक तौर पर प्रदर्शन किया जाता था. अब बांग्ला फिल्में भी इसी राह पर चलने की तैयारी में हैं. दुर्गापूजा के दौरान सनफ्रांस्सिको में नई बांग्ला फिल्म ‘दूजने (दोनों लोग)’ व्यावसाइक तौर पर रिलीज की गई. वहां दो सिनेमाघरों में प्रदर्शन के बाद फिलहाल मियामी और वाशिंगटन जीसी में भी सप्ताहांत के दौरान यह फिल्म सिनेमाघरों में दिखाई जा रही है. इसे मिलने वाली कामयाबी से उत्साहित बांग्ला फिल्मोद्योग यानी टालीवुड ने अगले छह महीनों के दौरान अमेरिका और इंग्लैंड में कम से कम सात और बांग्ला फिल्मों के प्रदर्शन की तैयारी की है.इस पहल की अगुवाई करने वाले कोलकाता स्थित पियाली फिल्म्स के मालिक अरिजीत दत्त कहते हैं कि ‘फिल्म के प्रीमियर के दौरान इसके ज्यादातर कलाकार वहां मौजूद थे. इस काम में अमेरिका के बंगाली एसोसिएशन ने भी काफी सहायता की. हम कम से कम सात और फिल्मों की रिलीज के लिए अमेरिका और इंग्लैंड में वितरकों से बातचीत कर रहे हैं.’&lt;br /&gt;कई सुपरहिट बांग्ला फिल्में बनाने वाले निर्माता प्रभात राय कहते हैं कि ‘विदेशों में बांग्ला फिल्मों का बाजार काफी बड़ा है. अब तक इसकी चर्चा ही होती थी. लेकिन कभी किसी ने कोई पहल नहीं की. अब शुरूआत होने के बाद इसके लिए वितरक भी आगे आएंगे.’ दत्त कहते हैं कि ‘विदेशों में व्यावसाइक प्रदर्शन की वजह से हर फिल्म को 30 से 50 लाख रुपए तक की अतिरिक्त कमाई हो सकती है. इस रकम से बांग्ला फिल्मोद्योग का तेजी से विकास हो सकता है.’&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/StVVd28sY6I/AAAAAAAAAUI/8fiQh6Rcj9g/s1600-h/DUJONE+FILM+SCENE.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 118px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/StVVd28sY6I/AAAAAAAAAUI/8fiQh6Rcj9g/s200/DUJONE+FILM+SCENE.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5392310100300686242" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;‘दूजने’ के नायक देव कहते हैं कि ‘वैश्विक पहचान बनाने के लिए विदेशों में बांग्ला फिल्मों का प्रदर्शन जरूरी है. अब तक तो एक अभिनेता के तौर पर विदेश में बसे बंगालियों के बीच मेरी कोई पहचान नहीं बनी है.’ जाने-माने अभिनेता प्रसेनजित कहते हैं कि ‘अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने के बाद अब बांग्ला सिनेमा के लिए विदेशों में व्यावसाइक कामयाबी हासिल करने का समय आ गया है.’ वे कहते हैं कि बंगाल में बाक्स आफिस पर हिट होकर संतुष्ट होने की बजाय बांग्ला सिनेमा को अब अपनी वैश्विक पहचान बनाने पर ध्यान देना चाहिए. खुद प्रसेनजित भी एक अभिनेता के तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाना चाहते हैं. वे कहते हैं कि विदेशों में व्यावसाइक प्रदर्शन नहीं शुरू होने तक ऐसा संभव  नहीं है.बांग्ला फिल्में अब तक अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों या बंग सम्मेलनों में मुफ्त में ही दिखाई जाती रही हैं. विदेश में रिलीज होने वाली फिल्म के सब-टाइटल अंग्रेजी में हैं ताकि गैर-बंगाली दर्शक भी इसे समझ सकें. हाल में बांग्ला सिनेमा पर अपनी वेबसाइट बनाने वाले प्रसेनजित कहते हैं कि यह वेबसाइट बांग्ला फिल्मों को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में एक कदम है. वे मानते हैं कि अब बांग्ला फिल्में गुणवत्ता के स्तर पर एशिया और यूरोप की फिल्मों की बराबरी के लिए तैयार हैं.पहली फिल्म की कामयाबी के बाद अनिल अंबानी की बिग पिक्चर्स और महानगर की पियाली फिल्म्स समेत कई कंपनियां अब अपनी फिल्मों को सात समंदर पार दिखाने की तैयारी में जुटी हैं. पियाली फिल्म्स के दत्त कहते हैं कि यह बांग्ला सिनेमा के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-5935970485714258943?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/5935970485714258943/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/10/blog-post_5632.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/5935970485714258943'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/5935970485714258943'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/10/blog-post_5632.html' title='&lt;strong&gt;सात समंदर पार चला बांग्ला सिनेमा&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/StVVl19DoTI/AAAAAAAAAUQ/mJJIEEP25Pk/s72-c/Dujone+Poster.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-8191528852332988273</id><published>2009-10-14T10:00:00.002+05:30</published><updated>2009-10-14T10:02:34.557+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वन्यजीव'/><title type='text'>अब मॉडलिंग से अपना खर्च उठाएंगे हाथी </title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/StVUVoC7UBI/AAAAAAAAAUA/hNRUA_uK0hs/s1600-h/Hathi-2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 138px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/StVUVoC7UBI/AAAAAAAAAUA/hNRUA_uK0hs/s200/Hathi-2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5392308859349717010" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पश्चिम बंगाल के विभिन्न वन्यजीव अभयारण्यों में रहने वाले लगभग 86 पालतू हाथी अब मॉडलिंग के जरिए अपना खर्च खुद उठाएंगे. राज्य के वन विभाग ने हाथियों पर होने वाले भारी खर्च का कुछ हिस्सा जुटाने के लिए यह अनूठी योजना बनाई है. इसके तहत विभिन्न कंपनियां बैनर के तौर पर अपने विज्ञापन तैयार कर वन विभाग को सौंपेगा. उन बैनरों को हाथियों पर पीठ पर बांधा जाएगा. इससे होने वाली आय हाथियों को पालने पर खर्च होगी. इन हाथियों पर सरकार हर साल 80 लाख रुपए से भी ज्यादा की रकम खर्च करती है.वन मंत्री अनंत राय कहते हैं कि ‘हाथियों को पालना अब बेहद खर्चीला साबित हो रहा है. पालतू हाथियों की तादाद बढ़ने की वजह से अब खर्च पूरा नहीं हो रहा है. इसलिए सरकार ने हाथियों को मॉडल के तौर पर इस्तेमाल करने का फैसला किया है.’ कम से कम एक दर्जन कंपनियों ने सरकार को हाल ही में यह प्रस्ताव दिया है कि अपने विज्ञापनों के बदले वे संबंधित हाथियों का पूरे साल का खर्च उठाने को तैयार हैं.उत्तर बंगाल में वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी मनींद्रचंद्र विश्वास कहते हैं कि ‘बूढ़े हाथियों को सरकार की ओर से आजीवन भत्ता दिया जाता है. उनके महावतों को भी एक निश्चित रकम दी जाती है. इस पर काफी रकम खर्च होती है. विज्ञापन से आय होने की स्थिति में पैसों की समस्या दूर हो जाएगी.’ उत्तर बंगाल स्थित विभिन्न राष्ट्रीय पार्कों और अभयारण्यों में वन विभाग के पास 86 प्रशिक्षित हाथी हैं. इनमें से सबसे ज्यादा 52 हाथी जलदापाड़ा वन्यजीव अभयारण्य में हैं. इनका इस्तेमाल पर्यटकों को जंगल में घूमाने के लिए किया जाता है. वन मंत्री कहते हैं कि ‘जल्दी ही मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के साथ बैठक में मॉडल के तौर पर हाथियों के इस्तेमाल को हरी झंडी दिखा दी जाएगी. इसके लिए केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की अनुमति भी जरूरी है.’ वे बताते हैं कि हाथियों की पीठ पर किसी व्यावसाइक घराने के बैनर बांध दिए जाएंगे ताकि पर्यटकों की नजर उस पर पड़े. इसके बदले संबंधित घराना उस हाथी का पूरे साल का खर्च उठाएगा. राय बताते हैं कि एक हाथी पर सालाना औसतन एक लाख रुपए का खर्च आता है. हाथियों की पीठ पर बैठकर घूमने के लिए पर्यटकों से 25 से 50 रुपए की जो रकम वसूल की जाती है वह नाकाफी है. इसकी एक वजह यह है कि किसी भी राष्ट्रीय पार्क में छह महीने ही पर्यटक आते हैं. बाकी समय बरसात और प्रजनन का सीजन होने की वजह से पार्क बंद रहता है. लेकिन मॉडलिंग के एवज में हाथियों को पूरे साल का खर्च मिल जाएगा.&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-8191528852332988273?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/8191528852332988273/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/10/blog-post_14.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/8191528852332988273'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/8191528852332988273'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/10/blog-post_14.html' title='&lt;strong&gt;अब मॉडलिंग से अपना खर्च उठाएंगे हाथी &lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/StVUVoC7UBI/AAAAAAAAAUA/hNRUA_uK0hs/s72-c/Hathi-2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-615548854626965159</id><published>2009-10-06T21:38:00.002+05:30</published><updated>2009-10-06T21:43:42.515+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिंगुर'/><title type='text'>टूटे सपनों के साथ बेपहिया ज़िंदगी</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SstsC9wuMaI/AAAAAAAAATc/7oGeCQUfGOM/s1600-h/Singur+youths+near+nano+plant.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 130px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SstsC9wuMaI/AAAAAAAAATc/7oGeCQUfGOM/s200/Singur+youths+near+nano+plant.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5389520177273385378" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रभाकर मणि तिवारी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;‘एक छोटी कार के आने की सूचना ने हमारी ज़िंदगी में पंख लगा दिए थे। हम सबकी आंखों ने न जाने कितने ही सुनहरे सपने देखे थे। लेकिन बीते एक साल से तो हम अपने पैरों पर खड़े होने के काबिल भी नहीं रह गए हैं। बस, यूं समझ लीजिए कि हम टूटे सपनों के साथ अपनी बेपहिया जिंदगी को घसीट रहे हैं……।’ सिंगुर के विकास पाखिरा यह कहते हुए कहीं अतीत में खो जाते हैं। टाटा मोटर्स की नैनो कार परियोजना के लिए जमीन के अधिग्रहण और संयंत्र का काम शुरू होते ही इलाके के लोगों की जिंदगी में मानो पंख लग गए थे। राजधानी कोलकाता से सटा हुगली जिले का यह अनाम-सा कस्बा रातों-रात महानगरीय रंग में रंगने लगा था। लोगों को जमीन की कीमत के एवज में लाखों रुपए मिले थे। इलाके में बैंकों की नई शाखाओं के अलावा कारों और ब्रांडेड कपड़ों के शोरूम तक खुलने लगे थे। लेकिन बीते साल ठीक दुर्गापूजा से पहले ही रतन टाटा ने नैनो परियोजना को सिंगुर से हटा कर गुजरात में लगाने का एलान कर दिया। उनके इस एलान से सपनों के पंख लगा कर उड़ते स्थानीय लोग एक झटके में जमीन पर आ गए थे। नैनो के जाने के एक साल बीतने के बावजूद लोग अब तक छोटी कार के बड़े सदमे से उबर नहीं सके हैं। यही वजह है कि इस साल भी दुर्गापूजा में सिंगुर में खामोशी पसरी रही।&lt;br /&gt;नैनो संयंत्र परिसर अब इलाके की गाय-भैंसों का चारागह बन चुका है। खाली जमीन पर घास के जंगल पनप गए हैं। परियोजना के सहारे इलाके में होने वाले विकास के काम भी रातोंरात ठप हो गए हैं। संदीप दे भी उन्हीं लोगों में हैं जो इस संयंत्र में काम कर हर महीने दस हजार रुपए तक कमा लेते थे। लेकिन वे बेरोजगार हो गए। अब वे अपनी गाय चराते हैं। संदीप कहते हैं कि इस छोटी कार ने इलाके के तमाम लोगों को बड़े-बड़े सपने दिखाए थे। हम तो सिंगुर के आगे चल कर टाटानगर या पुणे की तर्ज पर विकसित होने की उम्मीद बांध रहे थे। लेकिन एक झटके में ही तमाम सपने मिट्टी में मिल गए।&lt;br /&gt;संदीप और उनके दोस्त विकास पाखिरा साल भर बाद भी यह नहीं समझ सके हैं कि आखिर चूक कहां हुई? विकास कहते हैं कि आंदोलन तो होते ही रहते हैं। लेकिन इस पर समझौता भी तो हो सकता था। उनलोगों को इस बात का अफसोस है कि राज्य सरकार ने टाटा को रोकने का ठोस प्रयास नहीं किया। परियोजना के लिए बालू की सप्लाई करने वाले प्रदीप दे कहते हैं कि एक झटके में सब कुछ खत्म हो गया। साल भर बाद भी सिंगुर उस छोटी कार के जाने के बड़े सदम से नहीं उबर सका है।&lt;br /&gt;इलाके के लोगों को हल्की उम्मीद थी कि टाटा ने सिंगुर की जमीन नहीं लौटाई तो शायद देर-सबेर यहां कोई परियोजना लगे। लेकिन बीते महीने कोलकाता आए रतन टाटा ने साफ कर दिया कि सिंगुर के लिए फिलहाल उनके पास कोई योजना नहीं है। उन्होंने कहा था कि सरकार अगर यहां निवेश की गई रकम का मुआवजा दे दे तो वे जमीन लौटाने को तैयार हैं। दूसरी ओर, रेल मंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी, जिनकी अगुवाई में इलाके में अधिग्रहण विरोधी आंदोलन शुरू हुआ था, ने सिंगुर की जमीन मिलने पर वहां रेल कारखाना लगाने का भरोसा दिया है। लेकिन फिलहाल कुछ भी तय नहीं है।&lt;br /&gt;टाटा के कामकाज समेटने के बाद परियोजना से जुड़े कुछ स्थानीय युवकों ने नौकरी के लिए दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में हाथ-पांव मारे थे। लेकिन मंदी के इस दौर में नौकरी भला कहां मिलती। कुछ दिनों बाद वे सब सिंगुर लौट आए। अब सिंगुर की उस खाली पड़ी जमीन और संयंत्र के ढांचे को निहारते ही उनके दिन बीतते हैं। मन में इस उम्मीद के साथ कि कभी न तो कभी तो फिर भारी-भरकम मशीनों के शोर से परियोजनास्थल पर बिखरी खामोशी टूटेगी। सुनील कहते हैं कि हमारी तो जिंदगी ही खामोश हो गई है। जनसत्ता&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-615548854626965159?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/615548854626965159/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/10/blog-post_06.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/615548854626965159'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/615548854626965159'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/10/blog-post_06.html' title='&lt;strong&gt;टूटे सपनों के साथ बेपहिया ज़िंदगी&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SstsC9wuMaI/AAAAAAAAATc/7oGeCQUfGOM/s72-c/Singur+youths+near+nano+plant.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-8421870432233064424</id><published>2009-10-06T21:36:00.002+05:30</published><updated>2010-01-08T23:00:13.987+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्म'/><title type='text'>अभी जारी है सुर का सफर</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SstrQt4fNCI/AAAAAAAAATU/r-I7poW1LP4/s1600-h/Manna.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 183px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SstrQt4fNCI/AAAAAAAAATU/r-I7poW1LP4/s200/Manna.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5389519314017530914" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;वे भले अपनी उम्र के नौवें दशक में हों, उनके सुरों का सफर अभी भी जस का तस है. आवाज में वही जादू और अपनी धुन के पक्के. जी हां, इस शख्स का नाम है प्रबोध चंद्र दे. लेकिन उनके इस नाम की जानकरी कम लोगों को ही है.  ऐ भाई जरा देख के चलो और बरसात के न तो कारवां की तलाश है--. और ऐसे ही हजारों हिट गीत देने वाले प्रबोध को पूरी दुनिया मन्ना दे के नाम से जानती है. कोई 65 साल पहले 1943 में सुरैया के साथ तमन्ना फिल्म से अपनी गायकी का आगाज करने वाले मन्ना दे ने उसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने हिंदी के अलावा बांग्ला और मराठी गीत भी गाए हैं. और वह भी बड़ी तादाद में. अब बढ़ती उम्र की वजह से सक्रियता तो पहले जैसी नहीं रही, लेकिन आवाज का जादू जस का तस है. संगीत की दुनिया में वे सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ते रहे. रास्ते में सम्मान भी खुद-ब-खुद मिलते रहे. वर्ष 2005 में उनको पद्मभूषण से नवाजा गया. बीते साल पश्चिम बंगाल सरकार ने भी संगीत के क्षेत्र में योगदान के लिए उनको सम्मानित किया था. अब उनको दादा साहेब फाल्के अवार्ड से सम्मानित किया गया है.&lt;br /&gt;दिलचस्प बात यह है कि कोलकाता में अपने कालेज के दिनों में मन्ना दे कुश्ती और फुटबाल के दीवाने थे. उसके बाद वे लंबे समय तक इस दुनिधा में रहे कि बैरिस्टर बनें या गायक. आखिर में अपने चाचा और गुरू कृष्ण चंद्र दे से प्रभावित होकर उन्होंने गायन के क्षेत्र में कदम रखा. मन्ना दे का बचपन किसी आम शरारती बच्चे की तरह ही बीता. दुकानदार की नजरें बचा कर मिठाई और पड़ोसी की नजरें बचा कर उसकी बालकनी से अचार चुराना उनकी शरारतों में शुमार था. अपने चाचा के साथ 1942 में मुंबई जाने पर उन्होंने पहले उनके और फिर सचिन देव बर्मन के साथ सहायक के तौर पर काम किया. मन्ना कहते हैं कि 'वे मुफलिसी और संघर्ष के दिन थे. शुरआत में बालीवुड में पांव टिकाने भर की जगह बनाने के लिए मुझे काफी संघर्ष करना पड़ा.' वे बताते हैं कि '1943 में सुरैया के साथ तमन्ना फिल्म में गाने का मौका मिला. लेकिन उसके बाद भी काम नहीं मिला. बाद में धीरे-धीरे काम मिलने लगा.'&lt;br /&gt;मन्ना हिंदी फिल्मों में संगीत के स्तर में आई गिरावट से बेहद दुखी हैं. वे कहते हैं कि'मौजूदा दौरा का गीत-संगीत अपनी भारतीयता खे चुका है. इसके लिए संगीत निर्देशक ही जिम्मेवार हैं.' मन्ना दे अपने जीवन में धुन के पक्के रहे हैं. किसी को जुबान दे दी तो किसी भी कीमत पर अपना वादा निभाते थे. लेकिन एक बार अगर किसी को ना कह दिया तो फिर उनको मनाना काफी मुश्किल होता था.&lt;br /&gt;अपने पुराने दिनों को याद करते हुए मन्ना दे कहते हैं कि 'मेरे माता-पिता चाहते थे मैं पढ़-लिख कर बैरिस्टर बनूं. उन दिनों इसे काफी सम्मानजनक कैरियर माना जाता था .' वे बताते हैं कि  'मैं आज जिस मुकाम पर हूं, उसमें मेरे चाचा कृष्ण चंद्र दे की अहम भूमिका रही है. वह चूंकि अपने समय के एक माने हुए संगीतकार थे इसलिए हमारे घर संगीत जगत के बड़े-बड़े लोगों का आना-जाना लगा रहता था. कम उम्र में ही चाचा की आंखों की रोशनी चली जाने की वजह अक्सर मैं उनके साथ ही रहता था.' वे बताते हैं कि'संगीत की पहली तालीम मुझे अपने चाचा से ही मिली. खयाल के अलावा मैंने रवींद्र संगीत भी सीखा। उन दिनों चाचा के साथ मैं भी न्यू थिएटर आया जाया करता था. इसी वजह से वहां उस दौर के जाने-माने गायकों को नजदीक से देखने-सुनने का मौका मिला। लेकिन तब तक संगीत को कैरियर बनाने का ख्याल भी मन में नहीं आय़ा था.'&lt;br /&gt;अपने चाचा के साथ मुंबई जाना मन्ना दे के जीवन में एक निर्णायक मोड़ बन गया. मुंबई पहुंचने के कुछ दिनों बाद संगीतकार एच.पी. दास ने अपने साथ सहायक के रूप में रख लिया. कुछ दिनों बाद कृष्ण चंद्र दे को फिल्म 'तमन्ना' में संगीत निर्देशन का मौका मिला. फिल्म में एक गीत था 'जागो आई उषा'. यह गीत एक भिखमंगे और एक छोटी लड़की पर फिल्माया जाना था। भिखमंगे वाले हिस्से को गाने के लिए मन्ना को चुना गया. छोटी लड़की के लिए गाया सुरैया ने. वैसे, मन्ना दे की पहली फिल्म थी रामराज्यजिसके संगीतकार विजय भट्ट थे. उसके बाद लंबे समय तक कोई काम नहीं मिला तो उनके मन में कई बार कोलकाता लौट जाने का ख्याल आया. नाउम्मीदी और मुफलिसी के उसी दौर में 'मशाल' फिल्म में गाया उनका गीत 'ऊपर गगन विशाल' हिट हो गया और फिर धीरे-धीरे काम मिलने लगा.&lt;br /&gt;मौजूदा दौर की गलाकाटू होड़ की तुलना उस दौर से करते हुए मन्ना याद करते हैं कि'फिल्मी दुनिया में उस समय भी काफी प्रतिद्वंद्विता थी, लेकिन वह आजकल की तरह गलाकाटू नहीं थी. उस समय टांगखिंचाई के बदले स्वस्थ प्रतिद्वंद्विंता होती थी. हम लोग दूसरे गायकों के बढ़िया गीत सुन कर खुल कर उसकी सराहना भी करते थे और उससे सीखने का प्रयास भी.' वे बताते हैं कि 'काम तो सबसे साथ और सबके लिए किया लेकिनबलराज साहनी और राज कपूर के लिए गाने की बात ही कुछ और थी. पृथ्वी राज कपूर से पहले से पहचान होने की वजह से राजकपूर से मुलाकात आसानी से हो गई. उसके बाद राज कपूर के जीने तक मेरे उनसे बहुत अच्छे संबंध रहे.'&lt;br /&gt;संगीत ने ही मन्ना दे को अपने जीवनसाथी सुलोचना कुमारन से मिलवाया था. दोनों बेटियां सुरोमा और सुमिता गायन के क्षेत्र में नहीं आईं. एक बेटी अमेरिका में बसी है. पांच दशकों तक मुंबई में रहने के बाद मन्ना दे ने बंगलूर को अपना घर बनाया. लेकिन कोलकाता आना-जाना लगा रहता है. आप अब फिल्मों में ज्यादा क्यों नहीं गाते ?  इस सवाल पर वे कहते हैं कि 'अब बहुत कुछ बदल गया है. न तो पहले जैसा माहौल रहा और न ही गायक और कद्रदान. लेकिन संगीत ने मुझे जीवन में बहुत कुछ दिया है. इसलिए मैं अपने अंतिम सांस तक इसी में डूबा रहना चाहता हूं.'&lt;br /&gt;जाने-माने शास्त्रीय गायक पंडिय अजय चक्रवर्ती कहते हैं कि 'मन्ना दा (बांग्ला में बड़े भाई के लिए संबोधन) अपने जीते-जी एक किंवदंती बन चुके हैं. अपने कालजयी गीतों से उन्होंने लाखों संगीतप्रेमियों के दिलों में अलग जगह बना ली है.'&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-8421870432233064424?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/8421870432233064424/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/10/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/8421870432233064424'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/8421870432233064424'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;अभी जारी है सुर का सफर&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SstrQt4fNCI/AAAAAAAAATU/r-I7poW1LP4/s72-c/Manna.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-3766308754467054435</id><published>2009-09-10T00:15:00.001+05:30</published><updated>2009-09-10T00:17:55.710+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्म'/><title type='text'>नष्ट हो रही है एक ‘अमानुष’ की धरोहर</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/Sqf4SM1jzfI/AAAAAAAAATM/h2wkQ0gvjfA/s1600-h/Uttam-2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 145px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/Sqf4SM1jzfI/AAAAAAAAATM/h2wkQ0gvjfA/s200/Uttam-2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5379541271484550642" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा, बर्बादी की तरफ ऐसा मोड़ा,एक भले मानुष को अमानुष बना कर छोड़ा........’ कोई 35 साल पहले बनी हिंदी फिल्म ‘अमानुष’ का यह गाना भला कौन भूल सकता है! बांग्ला फिल्मों के महानायक उत्तम कुमार की 83वीं जयंती के मौके पर केंद्र सरकार ने भले उनके सम्मान में डाक टिकट जारी करने का फैसला किया हो, उनकी ज्यादातर फिल्मों के प्रिंट अब बेहद खराब हो चुके हैं.  हाल ही में रेल मंत्री ममता बनर्जी ने टालीगंज मेट्रो रेल स्टेशन का नाम भी बदल कर महानायक उत्तम कुमार कर दिया. टालीगंज में ही बांग्ला फिल्म उद्योग बसता है. उत्तम कुमार का ज्यादातर समय भी इसी इलाके में स्थित स्टूडियो में अभिनय करते बीता था. बांग्ला फिल्मों के इस महानायक को सम्मान तो बहुत मिला और अब भी मिल रहा है. लेकिन किसी ने उनकी धरोहर के रखरखाव में दिलचस्पी नहीं ली. यही वजह है कि उन्होंने जिन 226 फिल्मों में अभिनय किया था उनमें से सौ से भी कम फिल्मों के निगेटिव ही सुरक्षित बचे हैं. उनकी ज्यादातर फिल्मों के प्रिंट इस हालत में हैं कि उनको 35 मिमी के परदे पर दिखाना संभव नहीं है. कई फिल्मों के तो प्रिंट भी नहीं मिल रहे हैं. अब ज्यादातर सिनेमाघरों में श्वेत-श्याम फिल्में नहीं दिखाई जातीं. यही वजह है कि किसी ने इनके संरक्षण और रखरखाव में दिलचस्पी नहीं दिखाई है.उत्तम कुमार ने 1968 में शिल्पी संसद नामक एक संगठन बनाया था. इसके सचिव साधन बागची बताते हैं कि ‘दुर्भाग्य से उत्तम कुमार की कई बेहतरीन फिल्मों के न तो प्रिंट उपलब्ध हैं और न ही उनके निगेटिव.’ वे कहते हैं कि ‘एक नया प्रिंट डेवलप करने पर कम से एक लाख रुपए की लागत आती है. इसलए कोई भी निर्माता या वितरक यह रकम खर्च करने के लिए तैयार नहीं है.’ उत्तम कुमार की जिन फिल्मों के प्रिंट खो गए हैं उनमें ‘शिल्पी,’ ‘अग्नि परीक्षा,’ ‘पथे होलो देरी’ और ‘नवराग’ शामिल हैं. उत्तम कुमार की ‘ओगो वधू सुंदरी’ के भी प्रिंट का कोई पता नहीं है. यह उनकी रिलीज होने वाली अंतिम फिल्म थी.शिल्पी संसद लंबे अरसे से उत्तम कुमार की फिल्मों का एक आर्काइव बनाने का प्रयास कर रहा है. लेकिन किसी ने भी इस काम में सहायता का हाथ नहीं बढ़ाया है. बागची कहते हैं कि ‘आर्काइव तो दूर की बात है. कोई इस महानायक की फिल्मों के संरक्षण में भी दिलचस्पी नहीं ले रहा है.’ वे कहते हैं कि राज्य सरकार से भी इस मामले में कोई सहायता नहीं मिली है. हमने बीते साल ही उसे उन फिल्मों की सूची सौंपी थी जिनके प्रिंट नष्ट हो रहे हैं. लेकिन सरकार की ओर से अब तक कोई जवाब नहीं आया है. &lt;br /&gt;उत्तम कुमार की लगभग पांच दर्जन फिल्में सीडी और डीवीडी पर उपलब्ध हैं. लेकिन उनकी क्वालिटी बेहद खराब है. ‘अमानुष’ और ‘आनंद आश्रम’ समेत उनकी सभी तेरह हिंदी फिल्मों के प्रिंट सुरक्षित हैं.उत्तम कुमार का जन्म कोलकाता के अहिरीटोला इलाके में हुआ था. बचपन में उनका नाम अरुण कुमार चटर्जी था. लेकिन नानी प्यार से उनको उत्तम कहती थीं. इसलिए बाद में उनका नाम उत्तम कुमार हो गया. उन्होंने कुछ दिनों तक थिएटर में भी काम किया. बाद में वे फिल्मों की ओर मुड़े और बांग्ला फिल्म ‘दृष्टिदान’ (1948) से अपना सफर शुरू किया. लेकिन अगले चार-पांच साल तक उनकी फिल्में लगातार फ्लॉप होती रहीं. फ्लॉप हीरो का ठप्पा लगने की वजह से तब वे फिल्मों से तौबा करने का मन बनाने लगे. लेकिन 1952 में बनी बसु परिवार फिल्म के हिट होते ही उनकी गाड़ी चल निकली. उसके अगले साल सुचित्रा सेन के साथ आई ‘साढ़े चौहत्तर’ फिल्म ने उनको करियर को एक नई दिशा दी. उसके बाद उत्तम कुमार ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. बाद में उन्होंने ‘अमानुष,’ ‘किताब,’ ‘आनंद आश्रम’ और ‘दूरियां’ समेत कई हिंदी फिल्मों में भी काम किया. वर्ष 1980 में एक फिल्म के सेट पर ही दिल का दौरा पड़ने की वजह से उनका निधन हो गया.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-3766308754467054435?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/3766308754467054435/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/09/blog-post_10.html#comment-form' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/3766308754467054435'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/3766308754467054435'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/09/blog-post_10.html' title='&lt;strong&gt;नष्ट हो रही है एक ‘अमानुष’ की धरोहर&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' 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alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5378731794003542834" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अगर त्योहारों के इस सीजन में आप पहाड़ियों की रानी दार्जिलिंग की सैर की योजना बना रहे हैं तो यह खबर आपके लिए है. अगर आप नवविवाहित हैं और हनीमून के लिए दार्जिलिंग की हसीन वादियों में जा रहे हैं तब तो आपको और सावधानी बरतनी चाहिए. अब इन वादियों में आप पत्नी के साथ ही सही, अपने प्यार का सार्वजनिक तौर पर इजहार नहीं कर सकते. हां, इसमें पत्नी का हाथ पकड़ कर सड़कों पर घूमना भी शामिल है. वजह--इलाके में अलग राज्य के लिए लंबे अरसे से आंदोलन करने वाले गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने अपने ताजा फरमान में इस पर पाबंदी लगा दी है. मोर्चा ने इससे पहले बीते साल इसी सीजन में इलाके के लोगों के लिए ड्रेस कोड लागू कर दिया था. तब उसने कहा था कि पूरे एक महीने इलाके के लोग पारंपरिक गोरखा ड्रेस में ही नजर आएंगे.उस समय भी मोर्चा के फरमान की काफी आलोचना हुई थी और अब भी हो रही है. गोरखा मोर्चा की युवा शाखा के प्रमुख रमेश कहते हैं कि ‘हमने समाज के भले के लिए ही यह फैसला किया है.’ वे कहते हैं कि ‘हमारे कार्यकर्ता पूरे इलाके में इस फरमान को कड़ाई से लागू कराएंगे.’ इसका असर भी नजर आने लगा है. इसी सप्ताह दार्जिलिंग के मशहूर मॉल चौरास्ता पर इन उत्साही कार्यकर्ताओं ने एक जोड़े को सार्वजनिक स्थल पर प्यार के इजहार के लिए सजा दी और माफी मांगने के बाद ही उसे छोड़ा. उस जोड़े का कसूर यह था कि पति-पत्नी एक-दूसरे का हाथ पकड़े वादियों का हसीन नजारा देख रहे थे.मोर्चा के नेता भले अपने ताजा फरमान को सही ठहराएं, आम लोग और होटल मालिक इसकी आलोचना में जुटे हैं. लेकिन मोर्चा के दबदबे को देखते हुए अब तक किसी ने खुल कर इसका विरोध नहीं किया है. मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने इस फऱमान को कड़ाई से लागू करने के फेर में कई जोड़ों के साथ बदतमीजियां की हैं. उनके खिलाफ थाने में शिकायतें भी दर्ज कराई गई हैं. लेकिन अब तक दोषियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है. बंगाल में दुर्गापूजा की छुट्टियां शुरू होते ही इन पहाड़ियों में पर्यटकों की आवाजाही बढ़ जाती है. अक्तूबर के तीसरे सप्ताह से शुरू होने वाला यह पर्यटन सीजन नववर्ष तक जारी रहता है. इस दौरान तमाम होटल पहले से बुक हो जाते हैं. इलाके की अर्थव्यवस्था भी पर्यटन पर ही आधारित है.लेकिन अबकी होटल मालिक इस फरमान से डरे हुए हैं. एक होटल मालिक नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं कि इससे लोग यहां आने से डरेंगे. वे सवाल करते हैं कि ‘अब अगर पति-पत्नी का एक-दूसरे का हाथ पकड़ना अपराध है तो यहां लोग भला घूमने क्यों आएंगे?’ होटल मालिकों का कहना है कि इस फरमान से इलाके की बदनामी तो होगी ही, पर्यटकों की आवक पर भी इसका असर पड़ेगा. महाराष्ट्र से हनीमुन के लिए दार्जिलिंग आए एक इंजीनियर अजय भारद्वाज इससे परेशान हैं. वे कहते हैं कि ‘यहां आने के बाद इसका पता चला. इतनी पाबंदी में कौन होटल से बाहर निकलेगा.’ दस दिनों के लिए दार्जिलिंग आए अजय दो दिनों बाद ही सिक्किम चले गए.बीते तीन दिनों में इस मामले में मोर्चा कार्यकर्ताओं के खिलाफ दार्जिलिंग, कालिम्पोंग और कर्सियांग थानों में छह शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं. दार्जिलिंग के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अखिलेश चतुर्वेदी कहते हैं कि ‘हम इन शिकायतों की जांच कर रहे हैं. जांच के बाद दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी.’ लेकिन पर्यटन उद्योग से जुड़े लोगों को पुलिस और प्रशासन की कार्यवाही पर भरोसा कम ही है.लोग कहते हैं कि बीते साल मोर्चा की ओर से लागू ड्रेस कोड का सबको मजबूरन पालन करना पड़ा था. इस बार भी उसके समर्थक ताजा फरमान को जबरन लागू कर रहे हैं. ऐसे में इस सीजन में यहां आने वाले जोड़ों को एक नई मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-2887266184711445525?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/2887266184711445525/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/09/blog-post_7645.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/2887266184711445525'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/2887266184711445525'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/09/blog-post_7645.html' title='&lt;em&gt;&lt;strong&gt;तो मत करें प्यार का सार्वजनिक इजहार!&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SqUYEaOuQzI/AAAAAAAAATE/RUHt5qaqdHU/s72-c/FARMAN-4.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-4662723237199130011</id><published>2009-09-07T19:49:00.002+05:30</published><updated>2009-09-07T19:54:08.375+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बंगाल'/><title type='text'>बुद्धदेव के एक सपने पर पानी फिरा</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SqUXfWVRf8I/AAAAAAAAAS8/9Ei1O40-Cyc/s1600-h/Vedic+Village+4.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 92px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SqUXfWVRf8I/AAAAAAAAAS8/9Ei1O40-Cyc/s200/Vedic+Village+4.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5378731157302116290" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; जमीन अधिग्रहण पर लगातार उभरने वाले विवादों के चलते पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की ड्रीम परियोजनाओं पर धीरे-धीरे पानी फिरने लगा है। सरकार ने सोमवार को कोलकाता से सटे राजरहाट में सूचना तकनीक (आईटी) हब बनाने की महात्वाकांक्षी परियोजना रद्द कर दी है। सौलह सौ एकड़ में बनने वाली इस परियोजना का शुमार बुद्धदेव की सबसे पसंदीदा परियोजनाओं में होता था। लेकिन अब उसी पर पानी फिर गया है।&lt;br /&gt; सरकार ने साथ ही सूचना तकनीक क्षेत्र की दो बड़ी कंपनियों- इंफोसिस और विप्रो को भी सूचित कर दिया है कि उनको इस परियोजना के लिए कोई जमीन नहीं दी जाएगी। बीते साल बंगाल सरकार ने इंफोसिस और विप्रो के साथ अलग-अलग सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। उसके तहत दोनों कंपनियों को इस हब में 90-90 एकड़ जमीन दी जानी थी।&lt;br /&gt; प्रस्तावित सूचना तकनीक उपनगरी एक लग्जरी रिसोर्ट वैदिक विलेज के पास बनने वाली थी। लेकिन 23 अगस्त को हुए विरोधा प्रदर्शन और आगजनी के बाद भू माफिया और रिसोर्ट प्रबंधन में सांठगांठ के आरोप उठने लगे थे। उसके बाद से ही आवासन, भू-राजस्व, सार्वजनिक निर्माण वित्राग और शहरी विकास मंत्रालय उक्त परियोजना को रद्द करने की बात कर रहे थे। &lt;br /&gt;सिंगुर और नंदीग्राम में हुए विरोध के बाद अब इस हब में वैदिक विलेज के भूमिका को लेकर काफी सवाल उठ रहे थें। भू-राजस्व मंत्री अब्दुर रज्जाक मोल्ला ने तो सीधे इस परियोजना को रद्द करने की मांग की थी। &lt;br /&gt;यह हालत तब है जब कोई महीने भर पहले ही राज्य के सूचना तकनीक मंत्री देवेश दास ने कहा था कि सरकार ने विप्रो और इंफोसिस के लिए प्रस्तावित टाउनशिप में जमीन का अधिग्रहण किया है।  यहां जानकारों का कहना है कि परियोजना रद्द होने के बाद संभावित निवेश और इससे पैदा होने वाली तीन लाख नौकरियों की वजह से राज्य को लगभग दस हजार करोड़ रुपए के निवेश का नुकसान उठाना पड़ सकता है। &lt;br /&gt;राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी इसकी पुष्टि करते हुए बताते हैं कि इस परियोजना के रद्द होने से बंगाल दस हजार करोड़ के निवेश और तीन लाख नौकरियों से वंचित रह सकता है। अधिकारी ने कहा कि अगर इंफोसिस और विप्रो टाउनशिप में अपनी परियोजनाएं लगाने में कामयाब रहतीं तो उसके बाद आईसीआईसीआई बैंक और आईटीसी इंफोटेक के भी यहां पहुंचने की संभावना थी।&lt;br /&gt;सोलह हजार एकड़ के टाउनशिप में आईटी और आईटी सेवाएं मुहैया कराने वाली कंपनियों को छह सौ एकड़ जमीन मुहैया कराई जानी थी। इंफोसिस और विप्रो दोनों ने ऐलान किया था कि वैदिक विलेज टाउनशिप में शुरू में दोनों कंपनियां पांच हजार लोगों को रोजगार मुहैया कराएंगी। हालांकि सूत्रों का कहना है कि दोनों कंपनियों ने सरकार को बताया था कि आगे चल कर उनके जरिये इस टाउनशिप में कम से कम 40 हजार रोजगार पैदा होंगे। लेकिन अब इस सपने पर पानी फिर गया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-4662723237199130011?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/4662723237199130011/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/09/blog-post_9929.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/4662723237199130011'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/4662723237199130011'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/09/blog-post_9929.html' title='&lt;strong&gt;बुद्धदेव के एक सपने पर पानी फिरा&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SqUXfWVRf8I/AAAAAAAAAS8/9Ei1O40-Cyc/s72-c/Vedic+Village+4.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-2280466152262964693</id><published>2009-09-07T10:38:00.001+05:30</published><updated>2009-09-07T10:40:10.136+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बंगाल'/><title type='text'>पार्टी में अकेले पड़ गए हैं बुद्धदेव!</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SqSVpqMWs3I/AAAAAAAAAS0/EL8haBgawy4/s1600-h/PIX16.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 186px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SqSVpqMWs3I/AAAAAAAAAS0/EL8haBgawy4/s200/PIX16.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5378588397920498546" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;प्रभाकर मणि तिवारी&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;कभी माकपा के शीर्ष नेतृत्व से अपने हर फैसले पर मुहर लगवा लेने वाले पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य अब अपनी ही पार्टी में अकेले पड़ गए हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब भट्टाचार्य की अगुवाई में राज्य में औद्योगिकीकरण की जबरदस्त आंधी चली थी। लेकिन सिंगुर व नंदीग्राम की घटनाओं और उनके चलते पंचायत से लेकर लोकसभा चुनाव और विधानसभा सीटों के लिए हुए उपचुनाव में पार्टी की दुर्गति के बाद मुख्यमंत्री ने खुद को काफी समेट लिया है। बीते महीने तबियत खराब होने के बहान वे कोई पंद्रह दिनों तक राइटर्स बिल्डिंग स्थित अपने दफ्तर नहीं गए। अब वे दफ्तर तो जाने लगे हैं। लेकिन पहले के मुकाबले उनके काम के समय में दो से तीन घंटों तक की कटौती हो गई है। बीमारी की आड़ में ही वे दो-दो बार माकपा की पोलितब्यूरो बैठक में शिरकत करने दिल्ली नहीं गए।&lt;br /&gt;मुख्यमंत्री की लगातार लंबी खिंचती इस बीमारी से साफ हो गया है कि पार्टी में अंदरखाने सब कुछ ठीक नहीं है। लोकसभा चुनावों के बाद भी माकपा के नेता एक के बाद एक विवादों में फंसते जा रहे हैं। ताजा मामला वैदिक विलेज का है। इसमें  माकपा के दो दिग्गज मंत्रियों ने ही जिस तरह एक-दूसरे को कटघरे में खड़ा किया, उससे बुद्धदेव परेशान हैं। बीते कुछ महीनों से पार्टी बुद्धदेव पर लगातार हावी हो रही है। सरकार के रोजमर्रा के कामकाज में पार्टी के लगातार बढ़ते हस्तक्षेप से खिन्न बुद्धदेव ने बीच में अपने इस्तीफे की भी पेशकश की थी। उनका कहना था कि पार्टी को अब मुख्यमंत्री के तौर पर किसी नए चेहरे की जरूरत है जो पार्टी और सरकार में बेहतर तालमेल बिठाते हुए 2011 में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए पूरी तैयारी कर सके।&lt;br /&gt;यहां माकपा के सूत्रों का कहना है कि बुद्धदेव की नाराजगी की कई वजहें हैं। वे लंबे अरसे से सरकार के कुछ दागी मंत्रियों को हटा कर उनकी जगह नए चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल करने का प्रयास करते रहे हैं। लेकिन पार्टी के दबाव में वे ऐसा नहीं कर सके। माकपा ने राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी के खिलाफ जिस तरह मोर्चा खोला था वह भी बुद्धदेव के गले नहीं उतरा। यह इसी से साफ है कि जब माकपा और वाममोर्चा के तमाम नेता राज्यपाल के खिलाफ जहर उगल रहे थे, मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं की।&lt;br /&gt;जानकार सूत्रों का कहना है कि 2001 के चुनाव राज्य में वाममोर्चा के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं। इसकी तैयारी के लिए सरकार के नेतृत्व परिवर्तन की सलाह के साथ बुद्धदेव ने हाल ही में माकपा के प्रदेश सचिव विमान बसु के साथ पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु के साल्टलेक स्थित आवास पर उनसे मुलाकात कर इस मामले पर विचार-विमर्श किया था। लेकिन बसु ने यह कहते हुए उनको इस्तीफा नहीं देने की सलाह दी थी कि इससे राज्य के लोगों में एक गलत संदेश जाएगा।  पहले एक दिन में उद्योगपतियों और व्यापारिक संगठनों के साथ तीन-तीन बैठकों में शिरकत करने वाले मुख्यमंत्री अब ऐसे सम्मेलनों में नहीं नजर आते। बीते दिनों वे अमेरिकन चैंबर औफ कामर्स की एक बैठक में भी शिरकत करने नहीं गए। यही नहीं, हाल में जब टाटा समूह के मुखिया रतन टाटा कोलकाता आए तो मुख्यमंत्री ने उसे भी मुलाकात नहीं की। टाटा ने मुख्यमंत्री और उद्योग मंत्री से मुलाकात के लिए समय मांगा था। लेकिन समय दिया सिर्फ उद्योग मंत्री निरुपम सेन ने। &lt;br /&gt;मुख्यमंत्री के करीबी सूत्रों का कहना है कि राज्य में लोकसभा चुनावों में दुर्गति के लिए जिस तरह अकेले उनको और उनके औद्योगिकीकरण अभियान को जिम्मेवार ठहराया गया, उससे बुद्धदेव काफी आहत हैं। लेकिन अब वे सरकार से उस तरह एक झटके में नाता नहीं तोड़ सकते, जिस तरह उन्होंने ज्योति बसु के मुख्यमंत्रित्व काल के दौरान तोड़ा था।&lt;br /&gt;राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि पार्टी और बुद्धदेव के बीच की खाई लगातार बढ़ती जा रही है। लेकिन उसके सामने भी फिलहाल मुख्यमंत्री पद लायक ऐसा कोई नेता नहीं है जो बुद्धदेव के आसपास भी हो। ऐसे में बुद्धदेव को बनाए रखना उसकी मजबूरी है। माकपा के सूत्र बताते हैं कि पार्टी में बुद्धदेव के साथ एक उपमुख्यमंत्री बनाने पर गहन विचार-विमर्श चल रहा है। इस पद के लिए उद्योग मंत्री निरुपम सेन का नाम भी चर्चा में है। सूत्रों की मानें तो उपमुख्यमंत्री का पद महज दिखावे के लिए नहीं होगा, उसके पास काफी अधिकार होंगे। पर्यवेक्षकों का कहना है कि सिंगुर, नंदीग्राम, लालगढ़, मंगलकोट और जमीन अधिग्रहण से जुड़े तमाम मुद्दों व चुनावों में हुई दुर्गति के बाद फिलहाल पुनर्गठन के दौर से गुजर रही है। यह अलग बात है कि इस वजह से पार्टी में महीनों से भीतर ही भीतर कायम असहमतियां सतह पर आने लगी हैं। जनसत्ता&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-2280466152262964693?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/2280466152262964693/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/09/blog-post_07.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/2280466152262964693'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/2280466152262964693'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/09/blog-post_07.html' title='&lt;strong&gt;पार्टी में अकेले पड़ गए हैं बुद्धदेव!&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SqSVpqMWs3I/AAAAAAAAAS0/EL8haBgawy4/s72-c/PIX16.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-2257643860732181273</id><published>2009-09-04T11:20:00.002+05:30</published><updated>2009-09-04T11:25:42.637+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेघालय'/><title type='text'>बादलों का घर है मेघालय</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SqCq7wgmouI/AAAAAAAAASs/m4dO9K_nnXw/s1600-h/NONGKREM.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 120px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SqCq7wgmouI/AAAAAAAAASs/m4dO9K_nnXw/s200/NONGKREM.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5377485898691027682" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;देश के पूर्वोत्तर में गारो, खासी और जयंतिया पहाड़ियों पर बसा मेघालय प्राकृतिक सौंदर्य का एक बेहद खूबसूरत नमूना है। इस राज्य में गारो, खासी और जयंतिया जनजाति के लोग ही रहते हैं। स्थानीय भाषा में मेघालय का मतलब है बादलों का घर। यह छोटा-सा पर्वतीय राज्य अपने नाम को पूरी तरह साकार करता है। यहां घूमते हुए कब बादलों का एक टुकड़ा आपको छूकर निकल जाता है, इसका पता तक नहीं चलता। उसके गुजर जाने के बाद भीगेपन से ही इस बात का अहसास होता है। मेघालय की राजधानी शिलांग समुद्रतल से 1496 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसको पूरब का स्काटलैंड कहा जाता है। इस राज्य का गठन 2 अप्रैल, 1970 को एक स्‍वायत्तशासी राज्‍य के रूप में किया गया। एक पूर्ण राज्‍य के रूप में मेघालय 21 जनवरी, 1972 को अस्तित्‍व में आया। मेघालय उत्तरी और पूर्वी दिशाओं में असम से घिरा है तथा इसके दक्षिण और पश्चिम में बांग्लादेश है।&lt;br /&gt;राजधानी शिलांग में एलीफेंटा फॉल, शिलांग व्‍यू पॉइंट, लेडी हैदरी पार्क, वार्ड्स लेक, गोल्‍फ कोर्स, संग्रहालय व कैथोलिक चर्च जैसे कई दर्शनीय स्थल हैं। शिलांग से कोई 56 किमी दूर चेरापूंजी अपनी बारिश के लिए मशहूर है। इसका नाम अब बदल कर सोहरा कर दिया गया है। यह खासी पहाड़ी के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक छोटा-सा कस्‍बा है। वायु सेना की पूर्वी कमान का मुख्यालय भी शिलांग में ही है।&lt;br /&gt;एलीफैंटा फाल्स शहर से 12 किमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां पर एक झरना दो पहाड़ियों के बीच से बहता है। हाथी के पांव की शक्ल का होने की वजह से ही इसे एलीफैंटा फाल्स कहा जाता है। डाकी कस्बे में हर साल नौका दौड़ की प्रतियोगिता होती है। यह उमगोट नदी पर आयोजित किया जाता है। पश्चिमी गारो पर्वतीय जिले में स्थित नोकरेक नेशनल पार्क रिजर्व तूरा से लगभग 45 किलो मीटर की दूरी पर है। यह दुनिया के सबसे दुर्लभ लाल पांडा का घर माना जाता है।&lt;br /&gt;इस राज्य में जनजातियों के त्योहारों की कोई कमी नहीं है। पांच दिनों तक मनाया जाने वाला ‘का पांबलांग-नोंगक्रेम’ खासियों का एक प्रमुख धार्मिक त्‍योहार है। यह नोंगक्रेम नृत्‍य के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह हर साल शिलांग से लगभग 11 कि.मी. दूर स्मित नाम के गांव में मनाया जाता है। शाद सुक मिनसीम भी खासियों का एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण उत्सव है। यह हर साल अप्रैल के दूसरे सप्‍ताह में शिलांग में मनाया जाता है। जयंतिया आदिवासियों के सबसे महत्‍वपूर्ण तथा खुशनुमा त्‍योहार का नाम है बेहदीनखलम। यह आमतौर पर जुलाई के महीने में जयंतिया पहाडियों के जोवई कस्‍बे में मनाया जाता है। गारो आदिवासी अपने देवता सलजोंग (सूर्य देवता) से सम्‍मान में अक्‍तूबर-नवंबर में वांगला त्‍योहार मनाते हैं। यह भी एक हफ्ते तक चलता है।&lt;br /&gt;शिलांग जाने के लिए पर्यटकों को सबसे पहले असम की राजधानी गुवाहाटी जाना होता है। वहां से सड़क मार्ग के जरिए तीन घंटे में शिलांग पहुंचा जा सकता है। गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही शिलांग के लिए बसें व टैक्सियां मिल जाती हैं। शिलांग में रहने के लिए हर तरह के होटल हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6796818521843557003-2257643860732181273?l=prabhakarmani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/feeds/2257643860732181273/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/09/blog-post_04.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/2257643860732181273'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6796818521843557003/posts/default/2257643860732181273'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prabhakarmani.blogspot.com/2009/09/blog-post_04.html' title='&lt;strong&gt;बादलों का घर है मेघालय&lt;/strong&gt;'/><author><name>प्रभाकर मणि तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08797290149323046123</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/S3-KyC63teI/AAAAAAAAAWw/DhNi_ig8pwM/S220/P.M.TEWARI.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_RLqxwrEyWCA/SqCq7wgmouI/AAAAAAAAASs/m4dO9K_nnXw/s72-c/NONGKREM.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6796818521843557003.post-4197079019917944985</id><published>2009-09-01T12:07:00.002+05:30</published><updated>2009-09-04T11:20:12.395+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सफरनामा'/><title type='text'>मैसूर में राजशाही के निशान</title><content type='html'>कर्नाटक की राजधानी बंगलूर से कोई 140 किमी दूर स्थित इस ऐतिहासिक व पौराणिक शहर में हर कदम पर राजशाही के निशान बिखरे हैं। शहर के हर कोने में या तो वाडियार राजाओं का बनवाया कोई महल है या फिर कोई मंदिर। पौराणिक मान्यता के मुताबिक, शहर से ऊपर चामुंडी पहाड़ी पर रहने वाली चामुंडेश्वरी ने इसी जगह पर महिषासुर को मारा था। पहले इस शहर का नाम महीसूर था जो बाद में धीरे-धीरे मैसूर बन गया। महाभारत के अलावा सम्राट अशोक से भी इस शहर का गहरा रिश्ता रहा है। वाडियार राजाओं के शासनकाल में फले-फूले इस मंथर गति वाले शहर का मिजाज अब भी राजसी है। मंथर इसलिए कि शहर में आम जनजीवन काफी सुस्त है। वाहनों की रफ्तार पर भी अंकुश है। शहर की चौड़ी सड़कों पर 40 किमी प्रति घंटे से ज्यादा गति से कोई वाहन चलाने पर पाबंदी है।&lt;br /&gt;शहर की गति भले सुस्त हो, लेकिन अगर लोगों व प्रशासन का उत्साह देखना हो तो यहां दशहरे में आना चाहिए। यहां का दशहरा दुनिया भर में मशहूर है। उस दौरान देश-विदेश से बारी तादाद में सैलानी यहां जुटते हैं। आम तौर पर इस शांत व सुस्त शहर को उन दिनों लगभग दो महीने पहले से ही पंख लग जाते हैं। इसके दौरान शहर मानों फिर से राजशाही के दौर में लौट जाता है। इसके लिए पूरे शहर में साफ-सफाई का काम महीनों पहले शुरू हो जाता है। मैसूर राजमहल व शहर के दूसरे महलों को भी दुल्हन की तरह सजाया जाता है। बंगलूर से शहर में घुसते ही एक विशाल स्टेडियम नजर आता है। स्थानीय निवासी मुदप्पा बताते हैं कि इस स्टेडियम में दशहरा उत्सव के दौरान कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। साल के बाकी दिनों में इस स्टोडियम का इस्तेमाल सामूहिक विवाह जैसे सामुदायिक कार्यों के लिए होता है। वे कहते हैं कि मैसूर का सौंदर्य देखना हो तो दशहरे के दौरान यहां आना चाहिए। &lt;br /&gt;शहर की अर्थव्यवस्था के दो मजबूत स्तंभ हैं। पहला सिल्क उद्योग व दूसरा पर्यटन । साथ ही चंदन की लकड़ियों से बनी वस्तुएं भी बहुतायत में मिलती हैं। दशहरा उत्सव के दौरान शहर के तमाम होटल महीनों पहले से ही बुक हो जाते हैं। दशहरा उत्सव के लिए नागरहोल नेशनल पार्क से हाथियों दस्ता भी शहर में आता है। इस उत्सव की शुरूआत चामुंडेश्वरी मंदिर में पूजा के साथ होती है। इस दौरान मैसूर राजमहल पूरे दस दिन बिजली की रोशनी में चमकता रहता है।&lt;br /&gt;वर्ष 1799 में टीपू सुल्तान की मौत के बाद यह शहर तत्कालीन मैसूर राज की राजधानी बना था। उसके बाद यह लगातार फलता-फूलता रहा। विशाल इलाके में फैले इस शहर की चौड़ी सड़कें वाडियार राजाओं की यादें ताजा करती हैं। शहर की हर प्रमुख सड़क इन राजाओं के नाम पर ही है। राजाओं के बनवाए महलों में से कुछ अब होटल में बदल गए हैं तो एक में आर्ट गैलरी बन गई है। मैसूर राजमहल से सटे एक भवन में राजा के वंशज एक संग्रहालय भी चलाते हैं।&lt;br /&gt;शहर के आसपास भी देखने लायक जगहों की कोई कमी नहीं है। कावेरी बांध के किनारे बसा विश्वप्रसिद्ध वृंदावन गार्डेन, चामुंडी हिल्स, ललित महल, चिड़ियाखाना, जगमोहन महल, टीपू सुल्तान का महल व मकबरा--यह सूची काफी लंबी है। मशहूर पर्वतीय पर्यटन स्थल ऊटी भी यहां से महज 150 किमी ही है। यही वजह है कि यहां पूरे साल देशी-विदेशी पर्यटकों की भरमार रहती है। &lt;br /&gt;बंगलूर से निकल कर मैसूर जाने के दौरान हाइवे के किनारे बने एक दक्षिण भारतीय होटल में दोपहर के खाने के दौरान ही दक्षिण भारत की पाक कला की झलक मिलती है। तमाम वेटर पारंपरिक दक्षिण भारतीय ड्रेस में। दक्षिण भारत में लंबा अरसा गुजारने के बाद इडली की विविध आकार-प्रकार इसी होटल में देखने को मिले। मैसूर पहुंच कर होटल में कुछ देर आराम करने के बाद हमारा भी पहला ठिकाना वही था जो यहां आने वाले तमाम सैलानियों का होता है। यानी वृंदावन गार्डेन। होटल के मैनेजर ने सलाह दी कि जल्दी निकल जाइए वरना गेट बंद हो जाएगा। वहां पहुंच कर कार की पार्किंग के लिए माथापच्ची और भीतर घुसने के लिए लंबी कतार। खैर, भीतर जाकर तरह-तरह के रंगीन झरनों के संगीत की धुन पर नाचते देखा। लेकिन सबसे दिलचस्प है झील के पास गार्डेन के दूसरी ओर का नजारा। न जाने कितनी ही हिंदी फिल्मों में हीरो-हीरोइन को ठीक उसी जगह गाते देख चुका था। पुरानी यादें अतीत की धूल झाड़ कर एक पल में सजीव हो उठी। &lt;br /&gt;अगले दिन पहाड़ी के ऊपर चामुंडेश्वरी मंदिर में जाकर दर्शन और पूजा से दिन की शुरूआत होती है। मंदिर के सामने ही महीषासुर की विशालकाय मूर्ति है। मन में किसी राक्षस के बारे में जैसी कल्पना हो सकती है, उससे भी विशाल और भयावह। मंदिर के करीब से पूरे मैसूर शहर का खूबसूरत नजारा नजर आता है। नीचे उतरते हुए मैसूर रेस कोर्स का फैलाव नजर आता है। हमारा अगला पड़ाव है मैसूर का राजमहल। कैमरा और बैग वगैरह मुख्यद्वार के पास ही टोकन के एवज में जमा क
